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बच्चा
- डॉ. अर्चना मेहता

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विभा बहुत ही सीधी-सादी सुघड़ गृहिणी थी। वह ससुराल में दिनभर काम में व्यस्त रहती। एक बार सास ने उसे देवरानी के सामने बेवजह जोर से झिड़क दिया- "तुम बहुत कामचोर होती जा रही हो। दिनभर बाजार में घूमती रहती हो। घर का काम क्या मैं करूँगी?" उसे बहुत आश्चर्य हुआ।

यह बात तो कहीं से उसके ऊपर फिट नहीं बैठ रही थी। उससे ऐसी क्या गलती हो गई, जो सास ने उससे ऐसे कटुशब्द कहे। वह दिनभर यह सोच-सोचकर दुःखी होती रही। बाद में जब वह सास के पास गई, तो वे बोली- "तुम मेरी बात का बुरा मत मानना। मैंने तो छोटी बहू को सुनाने के लिए तुमसे ऐसा कहा था।"

ऐसा क्यों :
क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि सामने वाले को क्रोध तो किसी और पर आ रहा हो और वह निकले आप पर? तो समझ लीजिए संसार आपको आपके सीधेपन का प्रतिसाद दे रहा है। चालाक नहीं होना अच्छी बात है।

  हो सकता है कि आप जिसके प्रति अपने मन की भड़ास निकाल रहे हों या जिसने वाकई गलती की है, उसे कोई फर्क ही न पड़े, जबकि जिसकी गलती न हो वह आहत हो जाए। इसलिए न तो करें और न ही ऐसा सहें।      
आप ईश्वर के अधिक करीब होते हैं, लेकिन जो गलती आपने की ही नहीं, उसकी सजा पाना और अनावश्यक रूप से दुःख उधार लेना क्या उचित है? यह आपके आत्म-सम्मान को कम करता है। फिर आपके साथ यह सब घटित होना आम बात हो जाती है। जैसे आपका कोई वजूद ही नहीं।

रखिए अपनी बात :
जब विभा के साथ ऐसा कई बार हुआ तो उसने अपनी एक सहेली की सलाह पर स्थिति से दो-चार होने का फैसला किया। उसने सास से और अन्य लोगों से भी नम्र किंतु स्पष्ट शब्दों में कह दिया, "यदि मेरी गलती हो तो आप मुझे बेशक कह सकते हैं, लेकिन यदि कोई और गलती हो तो आप मुझे बेशक कह सकते हैं, लेकिन यदि कोई और गलती करता है तो उसे सुनाने के लिए आप मुझे अपशब्द मत कहिए।

मेरा भी आत्मसम्मान है और वह आहत हो इसे मैं पसंद नहीं करती। उसी दिन से उन सभी लोगों का रवैया सुधर गया। विभा की तरह आपको भी हिम्मत जुटाकर स्पष्टवादी बनना होगा।

बदलिए आदत :
यदि आप उसकी सास की तरह का व्यवहार करने की आदी हैं तो तुरंत इस आदत को बदल डालिए। न्यायप्रिय बनिए। जिसकी गलती हो उसे ही सजा मिले, भले ही वह मौखिक ही क्यों न हो। सामने वाला भले ही सीधा हो, वह आपको जवाब भले ही न दे सके, लेकिन किसी के भी मन को अनावश्यक रूप से दुखाना उचित नहीं।

संयुक्त परिवारों में महिलाएँ अक्सर किसी की कोई बात बुरी लगने पर उसे सुनाते हुए अपने बच्चे को जोर-जोर से डाँटने-पीटने लगती हैं। इससे उस व्यक्ति पर उनकी बात का असर न हो, बच्चे के कोमल मन पर इसका बहुत बुरा असर होता है।

बच्चा समझ नहीं पाता कि यह उसे किस बात की सजा मिली। बार-बार उसके साथ ऐसा होने पर वह जिद्दी और चिड़चिड़ा हो जाता है। कई बार बड़े होने तक बचपन के ये शूल उसके व्यक्तित्व में झलकते हैं।

ईश्वर ने हमें वाणी दी है तो हमारी सुविधा के लिए, एक-दूसरे के साथ अच्छे संप्रेषण के लिए, न कि कुटिल उपयोग के लिए। तीर से बना घाव भर जाता है, किंतु जबान के तीर से बना घाव कभी नहीं भरता। फिर यह भी हो सकता है कि आप जिसके प्रति अपने मन की भड़ास निकाल रहे हों या जिसने वाकई गलती की है, उसे कोई फर्क ही न पड़े, जबकि जिसकी गलती न हो वह आहत हो जाए। इसलिए न तो करें और न ही ऐसा सहें।

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