मेरी भाभीजी की एक चिट्ठी गत दिनों मेरे नाम आई, जिसे में जस का तस यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। संभव है यह चिट्ठी पढ़कर किसी को नई राह मिल जाए।
प्रिय देवरजी,
आशीर्वाद। मैं पहले एक संयुक्त परिवार में रहती थी, अब अलग रह रही हूँ। यह मेरी अपनी ही जिद थी कि- अपना एक अलग घर हो। ताकि हम सुख-चैन से 'स्वतंत्र' रह सकें।
मुझे अलग होकर अब दो साल होने को हैं। जब संयुक्त परिवार में रहती थी तब, सुबह का नाश्ता मैं बनाती थी, जबकि 'खाना' मेरी 'देवरानी' बनाती थी। घर में साफ-सफाई का काम मेरी 'ननद' करती थी। सब्जी लेने छोटे देवरजी जाते थे और ससुरजी गेहूँ पिसा कर लाते थे। इस प्रकार घर का हर एक काम बराबरी से हमारे बीच बँटा हुआ था।
मेरी पहली 'डिलेवरी' हुई। मेरे मायके में केवल 'माँ' है, बाबूजी को गुजरे चार साल हो गई। माँ अक्सर बीमार रहती है। भाई-भाभी अलग रहते हैं और दोनों नौकरी करते हैं। भाभी ने डिलेवरी के समय कहा- 'मैं अपनी नौकरी संभालूँ या आपकी डिलेवरी?' परिणामतः मुझे सिर झुकाकर ससुराल आना पड़ा।
मेरी सासूजी और देवरानी ने मेरी बेटी को हथेलियों पर रखा और एक फूल की तरह सहेजा। देखते ही देखते वह दस माह की हो गई और मुझे कुछ भी पता नहीं चला। मैं पलंग पर लेटी रहती आराम करती लेकिन बच्चे को नहलाना, उसे खिलाना-पिलाना आदि...सारे काम मेरी सासूजी बड़े प्यार से करती।
इसके अलावा मेरे खाने, नहाने और सोने का भी वे दोनों बहुत ध्यान रखतीं। रात को जब मेरी बिटिया जुही रोती तो सासूजी रात-रात भर उसे अपनी गोद में लेकर बैठती। वह बीमार होती तो दवा-पानी भी ऐसे देती मानो उनकी अपनी जा-ई हो।
भैय्या, आज जुही दो बरस की हो गई है। मैंने स्वयं ने घर में तमाशा कर-करके अपने पति को अलग होने और अलग घर लेने के लिए मजबूर किया। मेरी जिद के कारण ही सास-ससुर और देवर-देवरानी ने मेरे पति से कहा था- 'देखो अतुल ये रोज-रोज के झगड़े, किटकिट अच्छी नहीं। अच्छा यही होगा कि- तुम 'उसकी' बात मानकर अपना अलग घर बसा लो। तुमको वहाँ खुश देखकर, भी हम यहाँ खुश हो लेंगे।
अब जबकि मैं अलग रह रही हूँ तो घर के सुबह से देर रात तक के सारे काम मुझे ही करने पड़ते हैं। अब मुझे एहसास हो रहा है कि मैंने मात्र थोड़ी-सी खुशी के लिए ढेर सारी तकलीफें मोल ले ली हैं।
अब यदाकदा, जुही जब आधी रात को रोती है तो मुझे 'सासूजी' की याद आ जाती है। घर के सभी लोग मुझ से तो अच्छे ही हैं जो मुझे और जुही को अपने हथेलियों पर सहेज के रखते थे।
मैं उनके प्यार का मोल समझ नहीं पाई। अब दोपहर में अकेली बैठकर कुढ़ती रहती हूँ। क्या करूँ? मेरी गलतियों की सजा तो मुझे भी भुगतनी है न? जो घरवालों के प्यार को न समझ सके वह मेरे जैसा 'मूर्ख' ही होगा।