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डॉ. सुरभि प्रपन्न
दीपा और सीमा सगी बहनें हैं। उम्र में भी अधिक अंतर नहीं है और एक-दूसरे से स्नेह भी काफी है, पर कुछ आदतों का अंतर इनके आपसी प्यार पर अक्सर भारी पड़ जाता है। मसलन दीपा "फिटनेस" पर ध्यान देने वाली, सुबह जल्दी उठने वाली, सोच-समझकर "डाइट" का निर्धारण करने वाली है, वहीं सीमा अपनी मर्जी की मालकिन। खाने-पीने की हर समय की रोक-टोक उसे पसंद नहीं।
उधर सीमा पढ़ाई में अव्वल, हर समय करियर को ऊँचाई पर ले जाती महत्वाकांक्षी स्टूडेंट तो दूसरी ओर दीपा को अपने करियर और शिक्षा में कोई विशेष रुचि नहीं। उसे अपना फिटनेस रूटीन ही प्यारा लगता है। यही व्यक्तिगत विभिन्नताएँ कई बार दोनों में बहस-तकरार और कभी-कभार बड़े विवाद की वजह बन जाती हैं। दोनों एक-दूसरे को उनकी कमियों का अहसास कराती और अपनी तरह बनने पर जोर देतीं।
हालाँकि इसका आंतरिक मकसद भी नेक ही होता था कि सीमा फिटनेस और दीपा करियर के महत्व को जानें। पर जाने-अनजाने इन्हीं बातों की समझाइश कब तानों और विवादों का रूप ले लेती, दोनों को पता ही नहीं चलता। "तुम क्या जानो, पढ़ाई और आगे बढ़ने का महत्व" और "मोटापा, बीमारियाँ तुम्हें कब घेर लेंगे तुम्हें पता भी नहीं चलेगा" जैसी छोटी बातें बड़ी बनती चली गईं और आपसी प्यार की जगह अहम् और गलतफहमियों ने ले ली।
यह समस्या सिर्फ सीमा और दीपा की नहीं हैं, बल्कि हर दूसरे परिवार और रिश्ते की है। पिता-पुत्र, सास-बहू और कभी-कभार पति-पत्नी भी इसी समस्या के शिकार होते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति मूलतः आपसी प्यार और देखभाल की संस्कृति है जिसमें हर नाजुक रिश्ते में बँधा व्यक्ति अपने करीबी का भला चाहता है और यही भला चाहने की इच्छा कब अति रोक-टोक और आपसी तनाव का कारण बन जाती है, पता ही नहीं चलता।
तो संभलिए, यदि आप भी अपने किसी करीबी के साथ इसी तरह की स्थिति का सामना कर रहे हैं। ध्यान रखिए कुछ बातों का ताकि छोटी-छोटी गलतियाँ भविष्य में रिश्ता टूटने का कारण न बन जाएँ। कहते हैं, "कोई रिश्ता परफेक्ट नहीं होता। उसे आपसी समझ और प्यार से निभाना होता है।" इसलिए किसी भी रिलेशन में पहले प्यार, समझदारी और सामंजस्य को महत्व दें, फिर छोटी-मोटी बातों को।
* यदि आपके करीबी की किसी बात या आदत को आप पसंद नहीं करते या आपको लगता है कि वह उसके लिए हानिकारक है, तो उतावले होकर अपना ज्ञान या "अपनी केअर" दिखाकर उसे लगातार समझाइश न देते रहें।
* ऐसा व्यवहार उसे आपसे दूर ले जा सकता है और गलतफहमियाँ भी पैदा कर सकता है। इससे बेहतर होगा कि सही समय और सही मौका देखकर उसकी राय लेकर धैर्य और संयम से अपनी बात रखें और अंतिम निर्णय उसी पर छोड़ें। ऐसा कर आप अपना फर्ज भी निभाएँ और रिश्ते का नाजुक बंधन भी बँधा रहेगा।
* यदि आप अपने दोस्तों या रिश्तेदारों को सुझाव देने या उनकी किसी बुरी आदतों को बदलने की सलाह देने की चाहत रखते हैं, तो अपना दिल भी बड़ा रखिए। हो सकता है, आपकी भी कोई आदत बुरी हो और जब सामने वाला आपको उससे अवगत कराए तो आप "लकीर के फकीर" बनकर अपनी गलतियों को भी अपनी अच्छाइयाँ बताएँ। इस तरह की प्रवृत्ति भी रिश्तों के लिए खतरनाक होती हैं।
* वैसे तो हर इंसान को अपनी कमियाँ सुनना बुरा लगता है, पर यदि आप अपने करीबी से इस तरह की उम्मीद रखते हैं कि वह अपनी आदतों में बदलाव करे तो उसे समय दीजिए। धैर्य से समझाने के बाद यदि वह आपकी बात मानता है, तो उसे व्यवहार में उतारने के लिए भी समय की जरूरत होगी। आपके द्वारा की गई जल्दबाजी उसे जबर्दस्ती भी लग सकती है।
* छोटी-छोटी बातों को टालने की प्रवृत्ति बनाइए। "तौलिया यहाँ क्यों रखा है?" या "जूते पॉलिश क्यों नहीं किए" जैसी बातों पर हर रोज की गई तकरार आपसी तनाव व घृणा की वजह हो जाती है। इसलिए छोटी-मोटी बातों को हर वक्त बहस का विषय मत बनाइए।
* यदि आपका करीबी किसी बुरी आदत जैसे जुआ या धूम्रपान का शिकार हो रहा है और आपको डर है कि आपके द्वारा दी गई समझाइश आपसी रिश्ते में कड़वाहट ला सकती है, तो आप किसी तीसरे व्यक्ति जैसे कोई डॉक्टर दोस्त या अन्य नजदीकी रिश्तेदार की भी मदद ले सकते हैं और उसकी मदद कर सकते हैं।
तो अपनाइए इन छोटी और महत्वपूर्ण बातों को और महकाते रहिए जीवन की बगिया को रिश्तों के खूबसूरत फूलों से।