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जहाँ छल वो रिश्ता नहीं

रिश्तों में ईमानदारी जरूरी

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रिश्ते
- कुमुद अजय मारू

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ये बदलते दौर का एक कड़वा सच है। जहाँ रिश्तों के नाम पर व्यक्ति न केवल समाज से बल्कि खुद से भी छल कर रहा है। रिश्तों की पवित्रता तथा सौजन्यता को भ्रष्ट करने की मानसिकता यदि यूँ ही हम पर हावी होती रही, तो हम एक दिन इंसान भी कहाँ रह पाएँगे? जरा सोचिए किसी पवित्र रिश्ते का नाम लेकर उसके पीछे अपना स्वार्थ साधने से पहले।

उस दिन मेरी परिचिता राशी अपनी शादी का न्योता देने आई। मेरे पूछने पर कि कहाँ शादी तय हुई है वह बड़ी ढिठाई से बोली- "अरे दीदी वहीं पास में रहने वाला रोमेश..." "पर राशी तुम तो उसे..."। "तो क्या हुआ दीदी! राखी बाँधने से हर कोई भाई थोड़े हो जाता है। मैंने तो यूँ ही पापा के डर से इस रिश्ते को नाम दे दिया था ताकि हम दोनों की शादी हो जाए।" राशी तो अपनी बात पूरी कर तथा शादी का न्योता देकर चली गई, मगर मैं अवाक थी राशी के किए उस पवित्र बंधन के मजाक पर।

ऐसे ही साक्षी ने अपनी पड़ोसी (जिनके पति का देहांत हो गया था) को हर वक्त सहारा दिया। दुःख में संबल बँधाया। दोस्ती को रिश्तों का नाम देकर वे उससे बहन तुल्य व्यवहार करने लगी। मगर ये क्या, जिस बहन को तुलसी का पौधा समझ रोपा था, वहीं बहन अमरबेल बन उनका सुख ही लील गई। बड़ी बहन का-सा सम्मान देने वाली पड़ोसी बहन उनकी ही सौतन बन बैठी।

मेरी कॉलोनी में एक लड़की अक्सर एक अधेड़ व्यक्ति के साथ दिखाई देती है। बाद में पता चला वे अधेड़ महोदय लड़की के मुँह बोले चाचा हैं। वे इसलिए उसके साथ रहते हैं ताकि लड़की के माता-पिता को शक न हो और लड़की अपने बॉय फ्रेंड के साथ आसानी से घूम-फिर सके। इधर वे भी उसकी सहेलियों से घुल-मिल सकें।

संबंधों में हो ईमानदारी :

ये महज उदाहरण नहीं। हम अपने आसपास ऐसी कितनी ही घटनाएँ होते देखते हैं, सुनते हैं जो रिश्तों को बदनाम करती हैं। कई बार ये रिश्ते हदें पार कर अपनी गंदी मानसिकता का परिचय दे जाते हैं।

दोस्ती को रिश्तों का नाम न दें :

हमें इस बात में जरा भी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए और अगर दोस्ती को रिश्तों का नाम दे भी दिया है तो ऐसी कोई असामाजिकता पैदा न करें, जिससे उस रिश्ते की गरिमा का मजाक बने।

रिश्ते मनुष्यता की जीवटता के साक्षी हैं :

दोस्ती या किसी पड़ोसी के एहसान में बने रिश्ते को अपने स्वार्थी रिश्ते का जामा पहनाने से पूर्व ये जरूर सोचें कि रिश्ते मनुष्यता को जीवित रखने का नाम है, न कि स्वार्थ पूर्ति का जरिया।

कोई अराजकता तो नहीं पनप रही?:

इस बात पर घर-परिवार और समाज को जरूर ध्यान देना चाहिए कि रिश्तों की आड़ में कहीं अराजकता तो नहीं पनप रही है। कहीं ऐसा न हो कि समाज के बनाए रिश्ते और हमारे स्नेह से सींचे रिश्तों में दाग लग जाए।

समझें राखी की गरिमा :

राखी की नाजुक किंतु मजबूत और पवित्रतापूर्ण डोर की महत्ता को समझें। उसके बँधन को पवित्र ही रहने दें। अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए भाई-बहन जैसे पवित्र रिश्ते की बलि न चढ़ाएँ।

जरूरी है कुछ दूरी और गोपनीयता :

रिश्ता पड़ोसी चाचा का हो या दोस्त के भाई-बहन का, एक सही दूरी जरूर मेंटेन करें। इससे दोस्ती को रिश्ते में बदलने की जरूरत ही नहीं होगी। फिर रिश्ता और दोस्ती अपनी-अपनी जगह पल्लवित होंगे।

रिश्ते भारतीयता के ठोस आधार :

रिश्ते हमारी भारतीय संस्कृति के मूर्त रूप हैं, नए मिट्टी का लोंदा जिसने जब जैसा चाहा अपनी मतलबपरस्ती के नाम से गढ़ लिया। इसलिए अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए रिश्तों का गठन न करें। ये सामाजिक अराजकता पैदा करते हैं अपने तय रिश्तों की गरिमा न मिटाएँ। इससे विश्वास दरकते हैं।

बहन-भाई, पिता-पुत्री, गुरु-शिष्या, चाचा-भतीजी के रिश्तों में एक आदर का भाव है। इन्हें कलुषित न करें, वरना चंद लोगों की गंदी मानसिकता तले, जिंदगी से रिश्तों की खुशबू व गरमाहट ही मिट जाएगी और विश्वास की मजबूत डोर टूट जाएगी। आज चंद लोगों की रिश्तों के पीछे खिलवाड़ करने की मानसिकता से रिश्तों के प्रति मन में सम्मान घटता जा रहा है।

ऐसी कुछ घटनाओं से आज हर रिश्ता शक के तराजू पर तुलने लगा है। जो विश्वास हमारी भारतीय मानसिकता और संस्कार में था वह लगभग मिटने लगा है। बहुत डरा-सा पाते हैं हम अपने सहज रिश्तों के बीच भी कि न जाने कब, कौन-सा रिश्ता मजाक बन जाए।

पहले हमारी मानसिकता गढ़ लिया करती थी, मान लेती थी, किसी पड़ोसी के भाई को भाई, चाचा को पिता-सा, बहन-भाभी को बहन-सा अपनापन व भोलापन लिए हमारी मानसिकता पवित्रता का बोध कराती थी, हर रिश्ते के प्रति।

तो फिर यह अपवित्रता का बोध कराती गाँठ क्यों बँध गई हमारे मन में? जरूरी है कि ये गाँठ कसकर टूटे, इसके पहले ही हम इसे बँधने से रोकने के प्रयास करें। वरना रिश्तों के नाम पर हमारे पास महज धोखा, अविश्वास तथा अराजकता ही रह जाएँगे।

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