व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा और सिमटते परिवारों के इस दौर में बहुत कुछ बदलता और पीछे छूटता जा रहा है लेकिन इस दौर में दादी और नानी की जरूरत ज्यादा महसूस होने लगी है क्योंकि बच्चों के भविष्य के निर्माण में उनकी खास भूमिका होती है।
बीपीओ एग्जीक्यूटिव अरूण फड़ताले और उनकी पत्नी की राय है कि अगर बच्चों का बेहतर भविष्य चाहिए तो पति और पत्नी दोनों के लिए काम करना जरूरी होता है। ऐसे में बच्चों की देखभाल बड़ी समस्या हो जाती है। अरूण की पत्नी एक ट्रैवल कंपनी में काम करती हैं।
अरूण बताते हैं कि उनकी माँ अपने पोते और पोती की देखभाल बखूबी करती हैं। वह कहते हैं 'बच्चों को समय पर स्कूल भेजना, उनको लेने जाना, उनके खाने, पीने, सोने, खेलने से लेकर हर बात का ध्यान मेरी माँ ही रखती है। बच्चों को खेल खेल में ही वह बड़े काम की बातें सिखा देती हैं। मेरे बच्चों को पता है कि रावण कौन था, उसे किसने मारा और दीपावली का पर्व क्यों मनाया जाता है। मेरी माँ ने उन्हें बताया है।'
पूर्वा बक्शी अपना बुटीक चलाती हैं। वह कहती हैं 'मुझे काम के लिए ज्यादा समय देना पड़ता है इसलिए बेटी की जवाबदारी पूरी तरह मेरी माँ ने संभाल रखी है। उसे होमवर्क कराना है, उसे खाने में क्या पसंद है, उसे अपनी सहेली के घर जाना है। यहाँ तक कि उसकी सहेलियों के जन्मदिन पर उनके लिए उपहार खरीदने के लिए भी मेरी माँ ही मेरी बेटी की मदद करती हैं।'
कुछ पश्चिमी देशों में बच्चों के विकास में दादी और नानी की भूमिका को रेखांकित करने के लिए 11 फरवरी को 'ग्रैंडमदर अचीवमेंट डे' मनाया जाता है। पूर्वा कहती हैं 'कई बार लगता है कि मेरी माँ अपने अनुभव के आधार मेरी बेटी को मुझसे कहीं ज्यादा समझती हैं। यह अच्छा भी है। कम से कम मेरी बच्ची को आज भले बुरे की जानकारी तो वह दे रही हैं। उसका ध्यान तो रख रही हैं। नौकरों पर मुझे कभी विश्वास नहीं रहा। मेरी बेटी अपनी दादी की छत्रछाया में बड़ी हो रही है, इससे ज्यादा तसल्ली की बात और क्या होगी।'
अरूण कहते हैं 'मुझे खुशी होती है यह देख कर कि बच्चे सब्जी का हिसाब लिखते हैं। माँ उनसे ऐसा करने के लिए कहती हैं। माँ मंदिर जाती हैं या शाम को आसपास घूमने जाती हैं तो बच्चे भी जाते हैं। माँ उन्हें बताती हैं कि सड़क के बायीं ओर ही चलना चाहिए और आगे पीछे अच्छी तरह देख कर ही सड़क पार करनी चाहिए।'
पूर्वा कहती हैं 'भारत जैसे देश में सबंधों को अधिक तरजीह दी जाती है लेकिन अब देखा जा रहा है कि यहाँ भी रिश्ते सिमट रहे हैं। बच्चे भूमंडलीकरण के इस दौर में अपने माँ बाप तक ही सिमट कर रह जाते हैं। यह सही नहीं है क्योंकि बच्चों के चरित्र निर्माण से लेकर सामाजिक व्यवस्था, सभ्यता, मूल्यों और परंपरागत रीति रिवाजों के प्रचार प्रसार में जो भूमिका दादी नानी की है वह किसी की नहीं है।'