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साधना सुनील विवरेकर
क्या आपके अहम अब आपके बीच आने लगे हैं? छोटी-छोटी बातों पर अब आप दोनों एक-दूसरे पर खीजने लगे हैं? आखिर वो कौन-सी उलझनें हैं, जो धीरे-धीरे आप दोनों के बीच दीवार-सी बनाती जा रही हैं? आखिर क्या कारण है कि एक-दूसरे के बिना न रह पाने वाले आप अब तलाक के बारे में भी सोचने लगे हैं?
विवाह का पवित्र बंधन दो शरीरों को ही नहीं दो आत्माओं को बाँधने में सक्षम होता है एवं विवाह के सात फेरे सात जन्मों तक समर्पण तथा सान्निध्य चाहते हैं, लेकिन कई बार शुरुआती अगाध प्रेम के बावजूद विवाह के कुछ वर्षों बाद ही संबंधों में इतनी कटुता आ जाती है कि साथ रहना दुश्वार लगने लगता है। तलाक देकर एक-दूसरे से विघटित हो संबंधों की इतिश्री करना ही श्रेयकर लगने लगता है। ऐसे प्रकरण गत दस वर्षों में अधिक दृष्टिगोचर हो रहे हैं, अतः उन बिंदुओं पर विचार करना आवश्यक लगता है, जो शायद ऐसी परिस्थिति निर्मित करते हैं।
प्यार पर अहं का हावी होना
हर रिश्ते की प्रथम जरूरत प्यार है। प्यार है तो हर समझौता सहज होता है, पर जब प्यार की उदात्त भावना पर 'अहं' का संकुचित आवरण हावी होने लगता है तो प्रेम मात खा जाता है। प्रेम के अभाव में विवाह का बंधन, दिलों का न रहकर मात्र औपचारिकता रह जाता है।
कमिटमेंट की कमतरता
विवाह दिलों के बीच का ऐसा कमिटमेंट होता है, जिसमें कागज पर बिना एक शब्द लिखे बहुत कुछ लिखा होता है। इसे आपसी समझ से आत्मसात करना होता है। एक-दूसरे के सुख के लिए, पसंद के लिए, पूर्ण समर्पित भाव, परिवार के लिए त्याग इत्यादि एक नहीं, अनेक बातें होती हैं। इस कमिटमेंट की खूबसूरती यह है कि वह अपने आपसे करना होता है। इसकी कमतरता भी संबंधों के बिखराव का प्रमुख कारण बनती है।
स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भूल
हर रिश्ते में बराबरी का व्यवहार एवं माँग जायज है, लेकिन पति-पत्नी के बीच श्रेष्ठ होने की सुई कभी इधर तो कभी उधर झूलती है, जिसे दोनों को सहजता से स्वीकारना चाहिए। कुछ मामलों में पति की समझ श्रेष्ठ हो सकती है तो कुछ में पत्नी की। स्वयं को हर मामले मेंश्रेष्ठ समझने की भूल कर सदा हावी होने की कोशिश कोई भी करे तो रिश्ते में दरार आना स्वाभाविक है।
आत्मावलोकन का अभाव
हर युगल विवाह के पूर्व स्वयं का श्रेष्ठपक्ष ही दूसरे के सामने प्रस्तुत करता है, लेकिन विवाह के पश्चात सच्चा एवं वास्तविक स्वभाव सामने आता है। तब समझौता ही एकमात्र उपाय रह जाता है। ऐसे में आत्मावलोकन कर स्वयं की गलतियों व व्यवहार का विश्लेषण करने से टकराव की स्थितियाँ टल सकती हैं।
आदतों व स्वभाव से तालमेल न करना
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आदतें एवं स्वभाव होता है। उसमें आमूल परिवर्तन, परिपक्वता आने पर असंभव न सही मुश्किल होता है, अतः आपसी चर्चा व वार्तालाप से कुछ हद तक समझौता करके सुधार की संभावना हो सकती है। किसी से तुलना कर झगड़े बढ़ेंगे ही, अतः तुलना व्यर्थहै।
उमंग एवं उल्लास का ह्रास
विवाह के बाद किसी चमत्कारिक खुशी या बहुत सारी इच्छा आकांक्षाओं के पूर्वाग्रह के साथ संबंध बनें तो बिखराव निश्चित है। आपसी संबंधों में उमंग, उल्लास बनाए रखना प्रयत्नों से संभव है, साथ ही धीरे-धीरे जो भी खुशियाँ मिलें, जो भी सुख सुविधाएँ मिलें, उनका आदर करखुश रहना सीखें।
परिवार से जुड़ाव हो
विवाह दो परिवारों का भी मिलन है। अतः एक-दूसरे के परिवार वालों को अपना बनाने की मानसिकता से ही एक-दूसरे के दिलों को जोड़ा जा सकता है।
दोष ढूँढने की बजाय गुणों की प्रशंसा करें
सकारात्मक सोच रखते हुए अपने जीवन साथी के प्लस प्वॉइंट ढूँढें तथा दोषों को नजरअंदाज करें तो जीना आसान होता है।
समस्याओं का हल खोजें
संबंधों में परिवार में जो भी समस्याएँ हैं, उनका रोना रोने की बजाय तथा उसकी चर्चा में घंटों गँवाने की बजाय उनका समाधान ढूँढने का प्रयास करने की कोशिश करें।
माफी माँगकर झगड़ों को खत्म करें
हर झगड़े के प्रारंभ होते ही तुरंत जल्द से जल्द अपनी गलती मानने का बड़प्पन दिखाएँ, झगड़े की उम्र लंबी न होने दें।
विवाह में प्रेम, स्नेह, समर्पण, सान्निध्य की महत्ता को समझ एक-दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम (अच्छा समय, सुखद समय) गुजारने का मन बनाएँ। रफ्तार से दौड़ती जिंदगी में जब प्रेम के लिए ही समय कम है तो कटुता, क्लेश एवं कठोरता से उत्पन्न झगड़ा कर संबंधों की मधुरता क्यों खत्म की जाए? सात फेरों से शुरू हुआ सफर सात जन्मों तक साथ चल पूरा करना है तो प्रतिबद्धता भी बनाए रखें।