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ज्योति जैन
घर में यूँ ही किसी छोटी सी बात पर बहस हो गई। मेरा मूड खराब था। उसी दौरान छोटे दादा का फोन आया। मेरी भर्राई आवाज से उसे अंदाजा हुआ कि कुछ बात है। उसने पूछा तो जैसे किसी स्नेहभरे शब्द सुनकर रुलाई फूट पड़ती है, मैं भी रो पड़ी और कुछ न कह पाई। उसने भी फोन रख दिया। करीब घंटे भर बाद फिर फोन किया, तब तक मैं सहज हो चुकी थी। उसने फिर पूछा, 'घर पर किसी ने कुछ कहा?' मैंने टालने की कोशिश की 'कुछ खास नहीं, छोटी-छोटी बातें तो चलती रहती हैं।' इस पर उसने भीगे स्वर में कहा - 'यदि छोटी बात है तो मुझे यकीन है कि तू इतनी समझदार है कि संभाल लेगी, लेकिन अगर मेरी जरूरत पड़े, तो बेझिझक कहना या मैं आता हूँ। ये मत समझना कि तू अकेली है। मैं तेरे साथ हूँ।' ये सुनते ही सारे तटबंध तोड़ आंसू बह निकले। महसूस हुआ कि भाई का सांत्वना भरा स्पर्श मेरी पीठ थपथपा रहा है। उसी भाई का, जिसकी जगह मैंने हमेशा बहन की ही कामना की थी। माँ बताती थी, जब मेरा जन्म हुआ तो तीनों भाई बहन पाकर बेहद प्रसन्न थे। तीनों ने मुझे सिर आँखों पर बैठाया। लेकिन गुजरते वक्त के साथ बड़े व मंझले दादा के बनिस्बत छोटे दादा के मैं ज्यादा करीब रही। कारण तो मुझे पता नहीं पर अपने बचपन की जितनी बातें मुझे याद हैं, उनमें ज्यादातर छोटे दादा ही शामिल हैं। काकी साब के बगीचे में भरी दोपहर में खजूर, जामुन बीनने जाते थे, तो छोटे दादा मुझे 'कंधे की बोरी' करके ले जाते ताकि मेरे पैर न जलें। तब मेरे बालमन में ये बात कभी नहीं आई कि पैर तो उनके भी जलते होंगे। कभी पाँच पैसे मिलते तो संतरे की गोली दिलाने ले जाते। |
| घर में यूँ ही किसी छोटी सी बात पर बहस हो गई। मेरा मूड खराब था। उसी दौरान छोटे दादा का फोन आया। मेरी भर्राई आवाज से उसे अंदाजा हुआ कि कुछ बात है। उसने पूछा तो जैसे किसी स्नेहभरे शब्द सुनकर रुलाई फूट पड़ती है, मैं भी रो पड़ी और कुछ न कह पाई। |
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कुछ बड़ी हुई तो फटे मोजे में रद्दी चिंदिया भरकर गेंद बनाते और मुझे खिलाते। फिर भी कभी-कभी मुझे लगता काश! उनकी जगह मेरी बहन होती, तो मैं उसके साथ कपड़े की गुड़िया से खेलती। तीनों भाई शिवना नदी में नहाने जाते तो मुझे भी ले जाते, तैरना सिखाते, खासकर छोटे दादा। वो हर वक्त मुझे अपने साथ रखते थे। जब खेत में टिटहरी के पीछे दौड़ते, घोंसले में उसके अंडों को देखने जाते, तब भी मैं उनके साथ होती थी। माँ-बाबूजी दोनों ही नौकरी करते थे। एक तरह से मैं उनकी ही जिम्मेदारी थी। यहाँ तक कि घर के कार्य भी मुझे छोटे दादा ने ही सिखाए।
किशोरावस्था में आते-आते मुझे अपनी सहेलियों व मौसी/काका की लड़कियों का साथ अच्छा लगने लगा। और यही हाल युवावस्था में भी रहा। मैं मन में कहीं बहन की कमी महसूस करती रही और छोटे दादा इस बात से अनभिज्ञ सदा मेरा साथ देते रहे। यहाँ तक कि मेरे विजातीय विवाह के मामले में भी जब उन्हें मैंने अपनी पसंद के बारे में बताया, तो उन्होंने ही परिजनों को इस विवाह के लिए राजी किया। विवाह के पश्चात भी उन्होंने मुझसे कहा कि कभी कोई तकलीफ हो, तो ये मत सोचना 'अपनी मर्जी से शादी की है, तो तू हमें कुछ नहीं कह पाएगी, हम सदा तेरे साथ हैं।'
और वो सचमुच ही हमेशा मेरे साथ रहे। लेकिन मैं बावरी ससुराल में भी अपनी ननदों के बीच बढ़िया तालमेल देखती, अपनी बेटियाँ होने के बाद उन दोनों का आपस में लगाव देखती, तो हमेशा ही बहन का खालीपन महसूस करती। जो हमें हासिल नहीं होता, उसके लिए दुखी होते रहते हैं और जो हमारे पास है उसका महत्व नहीं समझते।
इसी वजह से शायद मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि जितनी बढ़िया 'ट्यूनिंग' मेरे अपने भाइयों से रही है, विशेषकर छोटे दादा से, उतनी मेरे पति व ननदों के बीच नहीं थी। परंतु मुझे तो बस बहन की कमी ही नजर आती थी। लेकिन आज छोटे दादा के एक वाक्य ने मेरा नजरिया बदल दिया।
यूँ तो जीवन के हर मोड़ पर पति ने मुझे संबल दिया, लेकिन छोटे दादा ने भी समय-समय पर माता, भाई-बहन, सखा की जिम्मेदारियाँ भली-भाँति निभाईं। आज गम के छोटे से पल में उसकी बात ने मुझे इतना संबल दिया कि गम के सारे बादल छँट गए। आँसुओं से धुलकर स्वच्छ हो चुके मानस पटल पर छोटे दादा की निभाई सारी भूमिकाएँ स्पष्ट नजर आने लगीं। मन में कहीं कोई खालीपन नहीं था।