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बिखरने न दें युवा ऊर्जा को

युवाओं को जरूरत है आपकी

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युवा
- शोभना कांकरिया

NDND
भव्य इमारतों वाले महँगे स्कूल, बड़े पैकेज वाली नौकरियाँ, घरों में पालकों व बच्चों के बीच पनपती दूरियाँ, परिवारों और भावनाओं को घेरे में लेता मशीनीकरण क्या युवाओं के पथभ्रष्ट होने के पीछे इनका भी हाथ नहीं?

क्या कारण है कि बड़ी तादाद में मौजूद युवा ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग नहीं हो पा रहा? विकास एक मूल्यवान प्रक्रिया है, लेकिन कहीं हम इसकी आड़ में अपनी युवा ऊर्जा को नजरअंदाज तो नहीं कर रहे?

इन दिनों की युवा पीढ़ी एक ओर जहाँ अविश्वसनीय राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय सफलताएँ दर्ज कर रही है, वहीं आतंक व अपराध के क्षेत्र में भी उसकी भयानक उपस्थिति दिखाई दे रही है। युवा पीढ़ी की लालसा, जिज्ञासा व स्वप्न इन दोनों विरोधाभासी स्थितियों के लिए फौरी तौर पर जिम्मेदार हैं, परंतु केवल इसे ही संपूर्ण उत्तर या संपूर्ण सच मानना भयानक गलती होगी।

  अभिनव बिंद्रा की स्वर्णिम सफलता में अगर उनके पालकों का हाथ है तो कसाब जैसे युवा आतंकी भी पारिवारिक माहौल या पालकों के कारण ही तैयार हुए। एक में अगर पालकों की पूर्ण लिप्तता है तो एक में पूर्ण निर्लिप्तता।      
युवा अवस्था के निर्माण में बाल्यावस्था की भूमिका निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण होती है। इस बाल्यावस्था की निर्माण डोर मुख्य रूप से तीन हाथों में होती है- पालक, शिक्षक व परिवेश के मित्रगण। थोड़ी-सी गहराई से विश्लेषण करें तो हम पाएँगे कि इन तीनों ही समुदाय में जिम्मेदारी व समझ के स्तर पर काफी अंतर मौजूद है।

बिखरने न दीजिए युवा ऊर्जा :

शिक्षक व शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ तेजी से व्यावसायिकता प्रवेश कर रही है, वहीं इक्का-दुक्का परंपरागत जिम्मेदारी के साथ शिक्षा देने वाले शिक्षक भी सामने आते हैं। छात्र व शिक्षक के बीच भयमुक्त व मित्रता आधारित रिश्ते अब अगर सामान्य बात हो गई है तो छात्रों के साथ महज औपचारिक व व्यावसायिक हितों वाले संबंध भी मौजूद हैं।

इस तरह देखें तो युवा पीढ़ी के निर्माण की दो टकसाल एक साथ दिखाई देती हैं। दोनों एक-दूसरे के विपरीत स्वभाव वाली। इन शिक्षा संस्थाओं से निकली युवा पीढ़ी जब उद्यम के क्षेत्र में आती है तो व्यवसाय या पैसा उपार्जन की मानसिकता साथ में लेकर आती है। यही लालसा उसे उत्प्रेरणा भी देती है।

शैक्षणिक संस्थाओं से बिदाई के साथ ही शिक्षक व छात्र के बीच में निर्लिप्तता आ जाती है जबकि ताजे-ताजे इतिहास को ही देखें तो प्रायः ऐसा नहीं होता था। शिक्षक निर्णायक मौकों पर अपने पूर्व ही सही, लेकिन अतीत के विद्यार्थियों को शिद्दत व प्रामाणिकता के साथ जीवन का मार्गदर्शन भी देते थे। ऐसे अनेक प्रेरणास्पद वाकिए हैं जिनमें पूर्व शिक्षकों की बदौलत ही युवा वर्ग न केवल भटकने से बच गया अपितु खासी सफल जिंदगी का रास्ता भी तय किया।

पालकों के स्तर पर भी यही विरोधाभास दिखाई देता है। अभिनव बिंद्रा की स्वर्णिम सफलता में अगर उनके पालकों का हाथ है तो कसाब जैसे युवा आतंकी भी पारिवारिक माहौल या पालकों के कारण ही तैयार हुए। एक में अगर पालकों की पूर्ण लिप्तता है तो एक में पूर्ण निर्लिप्तता। बच्चों को उनके हाल पर छोड़कर हम अच्छी युवा पीढ़ी की अपेक्षा नहीं कर सकते। बचपन के साथ की जाती यह कठोरता ही युवा पीढ़ी को नकारात्मक रास्तों की ओर ले जाती है, यह मनोवैज्ञानिक सच है।

कई पालक अपने युवा होते बच्चों से भारी आर्थिक आमदनी, उच्चतम सफलता की स्थायी अपेक्षा पाल लेते हैं, जबकि वह उनकी क्षमता के साथ ज्यादती जैसा होता है। यह कठोरता भी अगर गलत है तो युवा पीढ़ी को जीवन-यापन तक के लिए उसके हाल पर छोड़ देने की निर्लिप्तता भी उतनी ही गलत है। ये दोनों ही रास्ते कहीं न कहीं युवा पीढ़ी को भटका देते हैं।

परिवेश के मित्रों में भी यही विरोधाभास मिलता है। कई मित्र एक दौर विशेष के बाद कन्नी काट जाते हैं तो कई मित्र अपनी मित्रता का बेवजह फायदा भी उठाने से नहीं चूकते। इन विशेष स्थितियों से हटकर अगर देखें तो जिन युवकों के जीवन में जिम्मेदार व संतुलित शिक्षक, पालक व मित्र होते हैं वे अपने जीवन में तनाव के क्षणों में भी सकारात्मक व सही निर्णय ले पाते हैं। जबकि कई युवा ऐसे भी होते हैं जिनके जीवन में शिक्षक, पालक व मित्रों की उपस्थिति केवल औपचारिक स्वार्थ से भरी या गैर जिम्मेदार होती है, ये युवक जीवन की सामान्य-सी घटना में भी अपना रास्ता भटक जाते हैं।

21 वीं सदी को तीसरी दुनिया के देशों के लिए ज्ञान की सदी भी कहा जाता है, वहीं यह समय आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी वेदनादायी त्रासदी का दौर भी है। आने वाला समय बेरोजगारी की समस्या को और बढ़ा भी सकता है। ऐसे में युवाओं को समझ देने वाले, उनकी संभाल करने वाले व उन्हें सलाह देने वालों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। जरूरत है इस पर ध्यान देने की।

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