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माँ-बाप का संबल होती हैं बेटियाँ

माँ-बाप का संबल होती हैं बेटियाँ

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बेटियाँ
- कारूलाल जमड़ा

NDND
मैं जो लिखने जा रहा हूँ, वह केवल मेरी कहानी या आपबीती नहीं है अपितु आज के अत्यधिक आधुनिक कहे जाने वाले समाज की कड़वी सचाई है। गत दिनों मेरी धर्मपत्नी ने एक निजी नर्सिंग होम में दूसरी संतान को जन्म दिया। मेरे पूरे परिवार सहित मैं भी यह जानकर खुश था कि जच्चा-बच्चा पूर्णतः स्वस्थ थे।

मुझे इस बात का कतई मलाल नहीं था कि मेरी दूसरी संतान भी बेटी है, किंतु इसी दौरान मैंने जितने भी लोगों से प्रत्यक्ष अथवा फोन से बात की बधाइयों के बीच उनका एक वाक्य मेरे दिमाग पर लगातार प्रहार करता रहा "काश! बेटा हो जाता।"

मैंने जहाँ भी मिठाइयाँ बाँटी, गाहे-बगाहे यह वाक्य मेरे कानों में पड़ता ही रहा। यहाँ तक कि मुझसे जुड़े मेरे निकट के कई लोगों ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से यह बात कह डाली। मैं इन सब शुभचिंतकों से यह पूछना चाहता हूँ कि आखिर ऐसा क्या है जो बेटे ही कर सकते हैं, बेटियाँ नहीं?

  मैं बहुत खुश हूँ कि मेरी दो बेटियाँ हैं, जिन्हें पाकर मैं गर्व महसूस कर रहा हूँ। लेकिन तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले एवं प्रतिष्ठित माने जाने वाले ऐसे कई चेहरे मेरे सामने आते जा रहे हैं, जो मेरी ओर ऐसी कातर एवं करुणापूर्ण दृष्टि से देखते हैं।      
जहाँ तक कुल या वंश चलाने की परंपरा है तो कितने ऐसे लोग हैं जो अपने परदादा का नाम भी भलिभाँति जानते हों? आज की स्थिति में विभिन्न उत्तरदायित्वों के चलते जब हम अपने माता-पिता की ही उचित देखभाल नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें पूरा सुख नहीं दे पा रहे हैं तो वंश एवं परंपरा को कितना निर्वहन कर पाएँगे?

जहाँ चार-चार बेटे हैं, वहाँ माता-पिता वृद्धाश्रम में शरण लिए हुए हैं। जमीन-जायदाद व धन के पीछे बेटे माता-पिता की हत्या करने से भी नहीं चूकते। जहाँ बेटे अपनी भूमिका से न्याय नहीं कर पा रहे हैं वहीं बेटियाँ विवाह के पहले और बाद में हर कदम पर माँ-बाप का साथ देती-सी लगती हैं।

मैं बहुत खुश हूँ कि मेरी दो बेटियाँ हैं, जिन्हें पाकर मैं गर्व महसूस कर रहा हूँ। लेकिन तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले एवं प्रतिष्ठित माने जाने वाले ऐसे कई चेहरे मेरे सामने आते जा रहे हैं, जो मेरी ओर ऐसी कातर एवं करुणापूर्ण दृष्टि से देखते हैं जैसे मेरे यहाँ बेटी होने से उनका बहुत बड़ा नुकसान हो गया हो।

ये चेहरे वे सफेदपोश चेहरे हैं जो पैसे, पद व प्रतिष्ठा के दम पर अत्यंत सम्माननीय एवं बेटियों के हिमायती होने का दम भरते हैं, किंतु गर्भावस्था के दौरान ये मेरी पत्नी को व मुझे भ्रूण के लिंग की जाँच, यहाँ तक कि लिंग के बेटी होने पर गर्भपात तक की गलत सलाह देने से भी नहीं चूके। मुझे लज्जा आती है ऐसे तथाकथित सभ्य एवं संभ्रांत माने जाने वाले अपने शुभचिंतकों को अपना रिश्तेदार अथवा मित्र कहते हुए।

हो सकता है मेरा यह आलेख पढ़ने के पश्चात मेरे इन हमदर्दों को मुझ पर गुस्सा आए, क्योंकि कुछ लोगों ने मेरी वर्तमान आर्थिक दशा को देखते हुए इस प्रकार की कामना की हो, परंतु मैं उन्हें यह कहना चाहता हूँ कि बेटे पर अपने जीवनभर का परिश्रम व पसीना बहाने की बजाय मैं अपनी बेटियों को अपना सर्वस्व समर्पित करना पसंद करूँगा।

यह सब मैं इसलिए भी कहना चाहता हूँ क्योंकि मैं अपने माता-पिता का एकमात्र बेटा हूँ, परंतु अपनी विभिन्न जिम्मेदारियों व परिस्थितियों के चलते अपने माता-पिता की मनचाही सेवा नहीं कर पा रहा हूँ।

किंतु जब तक हमारी कथनी-करनी में समानता नहीं आएगी न तो बेटियों को बचाया जा सकता है, न ही उन्हें उनका हक दिलाया जा सकता है। और अंत में बात उन परिचारिकाओं की जो नर्सिंग होम में मेरी धर्मपत्नी की सेवा हेतु संलग्न थीं।

मेरे द्वारा बार-बार पूछने के बावजूद उन्होंने मुझे यह बताना उचित नहीं समझा कि मेरी संतान एक "बेटी" है। क्या उनमें से कोई एक भी ऐसी थी जो "बेटा" होने पर अपने भाव छुपा पाती और मुझे बधाई नहीं देती? क्या उन्होंने वे पंक्तियाँ नहीं पढ़ी थीं जो अस्पताल के रिसेप्शन हॉल के टेबल पर रखी एक तस्वीर के पास लिखी हुई थीं :-

बेटे या बेटियाँ?
माँ-बाप का संबल होती हैं बेटियाँ
खाद-पानी बेटों में
और लहलहाती हैं बेटियाँ।
एवरेस्ट की ऊँचाई पर ठेले जाते हैं बेटे
और चढ़ जाती हैं बेटियाँ।
कई तरह से गिरते और गिराते हैं बेटे
और थाम लेती हैं बेटियाँ।
रुलाते हैं बेटे
और रोती हैं बेटियाँ
सपने देखे जाते हैं बेटों में
और साकार करती हैं बेटियाँ
जीवन तो बेटों का है
और मारी जाती हैं बेटियाँ।

मुझे अफसोस है कि एक "बेटी" होते हुए भी परिचारिकाएँ इस गूढ़ अर्थ को समझ नहीं पाईं। क्या आप समझ पाएँगे? और क्या समझ पाएँगे मेरे शुभचिंतक? आखिर कब करेंगे हम बेटियों का इस दुनिया में स्वागत?

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