Relationship %e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82 %e0%a4%86%e0%a4%9c%e0%a4%95%e0%a4%b2 %e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be %e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%a8%e0%a4%be %e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%96 %e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be %e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81 110021000024_1.htm

Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

मैं आजकल पिता बनना सीख रहा हूँ!

Advertiesment
रिश्ता
- ऋतुराजसिंह धतरावदा

ND
ND
सोना मुझसे बोलती है, देखना बेटा ही होगा। आँखें मेरे जैसी और ओठ तुम्हारे जैसे। मैंने कहा- नहीं, बेटी ही होगी और वो अपने पापा का बहुत ख्याल रखेगी, लेकिन मेरी पत्नी जिद पर अड़ गई कि बेटा ही होगा। मैं भी कहाँ मानने वाला था, मेरी सुई भी बेटी पर अटक गई।

थोड़ी देर हम दोनों एक-दूसरे से नाराज रहे, फिर सुलह हुई तो नाम क्या होगा, इस पर आकर बात पुनः घूम-फिरकर वहीं बेटा-बेटी पर आ गई। फिर दोनों नाराज। ऐसा पाँच महीने से चल रहा है और हम दोनों यह तय नहीं कर पा रहे कि आने वाली या आने वाले बच्चे का नाम क्या रखें?

अब तो अंदर नन्ही जान हिलने-डुलने भी लगी है। मुझे और मेरी पत्नी को लगता है कि वह मेरे बोलने पर ही हिलती है और जब वह हिलती है तो मेरा रोम-रोम उल्लास और गर्व से भर जाता है। फिर बात शुरू हो जाती है- देखना बाल तो मेरे जैसे ही होंगे- एकदम घुंघराले। पत्नी फिर अपनी टाँग अड़ा देती है और बोलने लगती है- बाल तो मेरे जैसे ही होंगे।

हाँ, तुम्हारे जैसा रंग होना चाहिए। अब भी उसे बेटा ही चाहिए। उस पर भी रंग गोरा चाहिए। मुझे चाहिए बेटी बस! इस सारी बहस के बीच हमारी नन्ही जान भी शायद समझ जाती है कि बात उसकी चल रही है। वह अपनी माँ की छोटी-सी खोल में हिलने लगती है।

मैं घंटों अपनी पत्नी के पेट को निहारता रहता हूँ, एक हलचल के लिए। मुझे लगता है कि उस एक हलचल को महसूस करने के लिए ही शायद मैं इस दुनिया में हूँ। कैसी होगी वह नन्ही जान? क्या सोचती होगी? क्या अंदर भी उसे ठंड और गर्मी का अहसास होता होगा? खाने में क्या पसंद होगा? क्या पीना चाहती होगी? क्या वो वाकई मेरी आवाज को पहचान जाती है?

अंदर उसे क्या दिखाई देता होगा? वह उस छोटी-सी खोल में परेशान तो नहीं हो जाती होगी? ऐसे न जाने कितने सवाल मेरे दिमाग में इन दिनों रात-दिन उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। कई बार मैं इन्हीं विचारों में खोया रहता हूँ और सोना पूछती है बाप बनने की चिंता सता रही है? अब तो तुम्हारी आजादी को छीनने के लिए एक और आने वाला है।

मैं जब बैचलर था, तब लगता था कि शादी कर बच्चे पैदा कर लेना वाकई अपनी आजादी का सत्यानाश अपने हाथों से कर देना है, लेकिन अब वे बातें निहायत ही बचकानी लगती हैं। अब मुझमें एक अलग ही जिम्मेदारी का अहसास है। या यूँ कहें पिता-सा अहसास।

मुझे सोना की चिंता रहती है। ऑफिस में रहता हूँ तब भी और घर में रहता हूँ तब भी। सोना आँखों के सामने रहती है तो सोचता हूँ अब हम तीन लोग हैं इस कमरे में। नन्ही जान ने अब सोना के काम करने की गति धीमी कर दी है। कई बार उसकी हलचल से सोना की नींद टूट जाती है और वह मुझे जगाकर कहती है लो बात कर लो अपनी बेटी से। मैंने उसकी और सोना की सेहत की चिंता में इंटरनेट पर तमाम साइटें खंगाल डालीं। कैसे वह अपनी खोल में पल-बढ़ रही है, यह अब इंटरनेट पर मेरा पसंदीदा विषय है।

मैं दिन में कई बार फोन लगाकर सोना से यही पूछता हूँ कि तुम दोनों कैसे हो? जवाब में सोना के मुँह से "बढ़िया" सुनकर एक परम सुख की अनुभूति होती है। डॉक्टर ने नन्ही जान के आने का समय 6-7 अप्रैल तय किया है। अब लगता है काश मेरे पास टाइम मशीन होती तो मैं तुरंत वहाँ पहुँचकर अपनी खोल से बाहर आती परी को देखता।

वैसे 7 अप्रैल मेरा भी जन्मदिन है और मुझे अब यह पक्का यकीन है कि मेरे जीवन की खुशियों को दुगुना करने के लिए ही शायद ईश्वर ने मेरे पास इसे भेजने का फैसला किया है। अप्रैल तक का समय कई बार काटना मुश्किल लगता है। मैं यह भी सोचता हूँ कि काश इंसानों के बच्चे भी कंगारुओं की तरह ही बड़े होते। ऐसे में जब भी लगे कि अंदर बच्चे को परेशानी है, तुरंत झाँककर देख लिया।

मैंने एक बार अपनी माँ से पूछा था कि मम्मा मैं जब आपके पेट में था तो क्या-क्या करता था? उस समय माँ भी उस चिरस्थायी अनुभूति में खो गई, जो शायद एक स्त्री ही अनुभव कर सकती है। भगवान ने ऐसी किस्मत पुरुषों को कहाँ बख्शी। मैं अब पापा को जब देखता हूँ तो उन पर और अधिक लाड़ आता है, क्योंकि इन दिनों मैं जिस स्थिति में हूँ, उसमें वे भी कभी रहे होंगे। मेरे लिए माँ और पापा ने भी अनगिनत सपने बुने होंगे।

अब मुझे उनके वे सारे त्याग नजर आते हैं, जो शायद सोना और मुझे भी करना होंगे। क्या वाकई हम इतने बड़े और समझदार हो गए हैं कि कई-कई त्याग कर पाएँ? शायद हाँ, क्योंकि इस नन्ही जान से ही अब हमारा वजूद जुड़ा नजर आता है। सारी दुनिया इसके ही आसपास सिमटी हुई हमें दिखाई देती है। अब मुझे बच्चे को ले जाती हर माँ प्यारी लगती। लगता है खुशियों ने इनके घर डेरा जमा रखा है। कल सोना भी कुछ यूँ ही कहीं अपने नन्हे बच्चे के साथ जा रही होगी। हमारे घर भी खुशियों का डेरा होगा।

जैसे-जैसे दिन नजदीक आते जा रहे हैं, सोना की परेशानियाँ भी कुछ बढ़ने लगी हैं। कभी पैरों, कभी कमर तो कभी सारे शरीर में दर्द होने लगता है। तब लगता है काश थोड़ी देर के लिए ही सही, नन्ही जान से लिपटी खोल मेरे पेट पर आ जाए। मैं भी तो उस पल को जी सकूँ, जिसकी हलचल के अहसास के लिए इन दिनों मैं जिए चले जा रहा हूँ।

मुझे भी तो उस नन्ही जान की धमनियों में दौड़ते रक्त में ऊर्जा भरने का मौका मिले। मुझे भी तो हर समय अपने अंदर धक-धक करती उसके दिल की धड़कनें गिनने, सुनने और महसूस करने की कभी न बुझने वाली प्यास से होकर गुजरने का मौका मिले, लेकिन मैं यह जानता हूँ कि अभी मुझे सोना के साथ ही उस अहसास को जीते चले जाना है।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi