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उत्पन्न कर लेते हैं व शारीरिक-मानसिक रूप से स्वयं को कमजोर बना लेते हैं। सौ फीसदी सच है कि रिश्तों में खटास आने पर हममें से किसी को भी अच्छा नहीं लगता, बात कहने वाला यह सोचकर दुःखी रहता है कि मेरा कहने का यह मतलब नहीं था व जिसके लिए बात कही जाती है या जो सुनता है वो यह जानकर परेशान होता है कि उसने मेरे बारे में ऐसा क्यों कहा? परंतु यदि आपस में प्यार है, संबंधों की डोर में स्नेह व विश्वास की गाँठ है तो निश्चित ही इस स्थिति को नकारा जा सकता है तथा अलगाव के पलों को भी रोका जा सकता है।
हर रिश्ते की अपनी अहमियत होती है, कोई भी रिश्ता छोटा-बड़ा या फिर कम या ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता, इसलिए कभी इस तरह का अहसास भर भी हो कि आपकी किसी बात से दूसरे व्यक्ति को दुःख या पीड़ा पहुँची है तो बिना किसी विचार-विमर्श के सीधे ही अपनी बातको सही मायने में समझाने की कोशिश करें कि आपका ऐसा मतलब कतई नहीं नहीं था। ताकि आपस में माधुर्य बना रहे। ऐसा ही प्रयत्न सामने वाले व्यक्ति की ओर से भी होना चाहिए कि वह दूसरे के स्नेह व भावनाओं की कद्र करते हुए बात को बढ़ने से रोकें और बिना किसी जल्दबाजी के सोच समझकर रिश्तों को टूटने से बचाएँ। क्योंकि जुड़ने की अवधि बड़ी होती है, जबकि अलग होने की सिर्फ एक क्षण।
इस दुनिया में हर किसी को साथ व सहारे की जरूरत है और मिल-जुलकर रहने में ही हम सब की भलाई है। छोटी-छोटी बातों को तूल या बढ़ावा देने से सिर्फ अहं की ही तुष्टि होती है और कुछ भी हासिल नहीं होता।यदि हर बात को नाप-तौलकर परखने की मूल्यांकनकरने की हमारी आदत बनी रहेगी, तो जो समय हम आपस में हँस-बोलकर, मिल-बाँटकर साथ-साथ बिता सकते थे उसको यूँ ही व्यर्थ में गँवा देंगे और सिर्फ क्षोभ व निराशा ही हमारे हाथ लगेगी। एक बात और जरूरी है कि कभी भी सुनी सुनाई बातों पर विश्वास ना करें, कभी किसी कारणवश या अनजाने में किसी की बातों से आपके मन में ठेस भी लगी हो तब भी उसकी मनःस्थिति को जानते हुए शब्दों को भूलने की हरसंभव कोशिश करें। यकीन मानिए इनका कोई अर्थ नहीं होता है और ध्यान से देखा जाए तो कहीं ना कहीं इसमें भी आपके लिए प्यारही छुपा रहता है, अतः थोड़ी-सी समझदारी व बदलाव से एक होकर रहें व बिना किसी तनाव के भरपूर जिएँ।