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शादीशुदा जिंदगी खुशियों का खजाना

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शादी
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विवाहित जीवन अपने साथ लाता है ढेर सारी खुशियाँ। ये खुशियाँ न केवल आत्मिक प्रफुल्लता उत्पन्न करती हैं बल्कि एक जादुई संसार की भी रचना करती हैं।

भले ही कुँआरे अपनी-अपनी धमा-चौकड़ी और घूमंतू जीवन को 'खुशियों' का नाम कहकर पुकारें, लेकिन सच यही है कि खुशियों की 'जादुई पुड़िया' तो विवाहितों के पास सुरक्षित है। एक शोध में पाया गया है कि भले ही कम या ज्यादा मात्रा में हो, शादी के बाद व्यक्ति की संतुष्टि के दायरे में इजाफा हो जाता है।

हालाँकि शोधकर्ता अभी इस बात से एकमत नहीं हैं कि उमंग का यह दायरा कुछ सालों के लिए होता है या लंबे सालों के लिए। इन बातों का खुलासा अमेरिका से छपने वाली पत्रिका 'जर्नल ऑफ पर्सनाल्टी एंड सोशल साइकोलॉजी' में किया गया है। शोध में 24 हजार लोगों का 15 साल का अध्ययन किया गया है। इसमें देखा गया कि उनकी शादीशुदा जिंदगी और प्रसन्नता के बीच क्या संबंध है?

शादी के दो साल पूरे हो जाने के बाद औसतन लोग यह भी मानते हैं कि उनकी गैरशादीशुदा जिंदगी कहीं बेहतर थी। पर इस विषय में भी जानकार कहते हैं कि यह भी एक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति 'संतुष्टि' को धीरे-धीरे आत्मसात कर रहा होता है।

जी हाँ, शोधकर्ता मानते हैं कि यह बात सच है कि शादी के बाद ज्यादा खुशी होने के बाद व्यक्ति उसका संतुलन बनाए रखना चाहता है। मनोवैज्ञानिक इसको इस रूप में देखते हैं कि यदि व्यक्ति एकाएक धनाढ्य हो भी जाए तो कुछ समय बाद उसकी खुशी का स्तर कम होने लगता है।

इसी तरह यदि किसी के साथ कोई दुखभरी घटना हो भी जाए तो वह बहुत दिनों तक विषाद से ही घिरा नहीं रहता बल्कि सामान्य स्तर की ओर लौटने लगता है। शोधकर्ता मानते हैं कि मनुष्य के अंदर एक प्राकृतिक चक्र होता है, जो उसे खुशी के औसत स्तर की ओर मोड़े रखता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जो लोग शादी के दो साल बाद कहते हैं कि उनका कुँआरापन कहीं बेहतर था तो इसका एक ही कारण होता है- यानी वे होते तो हैं खुशहाल, लेकिन उस खुशी के धीरे-धीरे आदी हो चुके होते हैं।

शादी के कुछ साल बाद संतुष्टि के स्तर में आई गिरावट के और भी कई कारण हो सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि लोग शादी करके पछता रहे हैं। एक ऑस्ट्रेलियाई विशेषज्ञ मानते हैं कि 30 से 50 साल के बीच लोगों की संतुष्टि के स्तर में गिरावट आ ही जाती है, भले ही वह शादीशुदा हो या नहीं।

इसके अतिरिक्त बढ़ती जिम्मेदारी भी गंभीरता का लबादा ओढ़ने को मजबूर करती है। इनका मानना है कि शादी की खुशी नई कार खरीदने जैसी है। खुशी तो है और रहती भी है, पर व्यक्ति दो साल बाद उसे यूँ ही छू-छूकर नहीं देखता।

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