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समय क्यूँ नहीं ठहरा?

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समय गोपाल तिवारी
- गोपाल तिवारी

वो जो मेरा भविष्य थे, उनमें से एक पत्नी को लेकर व एक को पत्नी लेकर कहीं चले गए थे। मुझे पता ही नहीं चल सका और उम्मीद की वह किरण इस वक्त मेरे साथ थी। बस इसी बात से मैं अपने मन में राहत महसूस कर रहा था व अब भी उससे वफा की उम्मीद में जी रहा था।

अब मैं सिर्फ एक जिंदा लाश बनकर रह गया हूँ। जहाँ कल तक मेरे बिना पत्ता भी नहीं हिलता था, वहाँ मैं और मेरा अस्तित्व अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है। मुझे भी शायद यह महसूस होने लगा कि मेरे होने की अब मेरी पत्नी की जिंदगी में भी केवल इतनी-सी अहमियत बची है कि मैं उसके जीने के सहारे के बजाए उसके मुख की सुंदरता व उसके माथे पर चमकने वाली एक बिंदी मात्र रह गया हूँ और उसकी सिंदूर से भरी माँग मुझे 'मैं हूँ' इस बात का अहसास कराती रहती है।

कब सुबह हुई, कब शाम और कब दिन ढल गया, मेरी जिंदगी में अब इसका कोई मायना नहीं है क्योंकि समय ने मेरे वजूद को ऐसे झकझोर दिया कि मेरे जीने का अब कोई मतलब ही नहीं रह गया है। दिन तो फिर भी जैसे-तैसे काट लेता हूँ पर रात होते-होते तो जैसे मेरा मन भारी हो जाता है।

जो पत्नी मेरे बिना रात को ठीक से सो भी नहीं पाती थी, आज वह मेरी तरफ पीठ करके सोती है और वह भी इतनी बेफिक्र होकर कि उसे सारी रात मेरे बार-बार उठने का, बाथरूम जाने का, बार-बार पानी पीने का, मेरे सिर व पैरों में होने वाले दर्द व अन्य किसी भी तकलीफ का अहसास भी नहीं होता है।

मैं अभी तक भी यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि क्या मैं वह ही हूँ, जिसके कदम यदि रात्रि 10 बजे तक घर की चौखट पर न पड़ जाते तो उन कदमों को तलाशने के लिए वह क्या जतन नहीं करती थी, परेशान-सी होकर कभी घर की चौखट पर तो कभी बालकनी से खड़े होकर मुझे सड़क पर तलाशती रहती थी।

कभी फोन से मेरे ऑफिस में, मेरे दोस्तों के यहाँ मेरे बारे में पूछती और तलाश किया करती थी, जहाँ-जहाँ उसे मेरे मिलने की उम्मीद होती थी। जब मेरे कदम घर की चौखट पर पड़ते तो ऐसी हो जाती कि यदि आज मैं घर नहीं आता तो शायद...। लेकिन आज हालात बदल गए हैं, अब मैं कहीं बाहर जा ही नहीं पाता हूँ तो मेरे घर आने का इंतजार भी किसी को नहीं होता है। अब मैं घर में हूँ या नहीं, इस बात से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है।

मेरे बसे-बसाए साधनों के इस्तेमाल में ये जरा भी कंजूसी नहीं करते हैं। रात 8 से 11.30 बजे तक टी.वी. देखना तो इनके नियम में है। मुझे कितनी ही तकलीफ क्यों न हो पर ये जरा भी समझौता करना नहीं चाहते। ये तो मेरा भाग्य है, जिन्हें मैंने कभी अपना बोझ नहीं समझा उन सबके लिए मैं एक बोझ बन गया।

मैंने कभी अपने जीवन में उनका वजन न मापा और न ही उस वजन से मैं कराहा परंतु उन सबने मिलकर मुझे कितना भारी बना दिया, यह मैं बहुत अच्छे से समझ रहा था। मैंने कभी भी नहीं चाहा था कि मेरी जिंदगी भी मेरे पिता की तरह छोटी हो लेकिन अब जो जिंदगी बची है, उसे कैसे काटूँ, यह सोच-सोचकर हैरान हो रहा हूँ, न जी पा रहा हूँ और न ही मर पा रहा हूँ।

किसी ने बहुत ही ठीक कहा है कि यदि यह जानना चाहते हो कि वाकई जिंदगी में हमने क्या खोया व क्या पाया है तो सबसे पहले इसकी शुरुआत खुद से करो। आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उम्र के एक पड़ाव पर आकर जिंदगी जो अब तक जीने में हसीन लग रही थी, वही जिंदगी अब एक पल और जीने के लिए भी तैयार नहीं है। शायद यह पता होता कि जिंदगी कितने दिनों की है तो यह जो बेवफाई हो रही थी, उसे भी शायद हँसते-हँसते सह लेता। जब पीछे मुड़कर देखा तो मुझे मेरा एक लंबा-सा वजूद नजर आ रहा था, जहाँ मैं एक माँ का बेटा था, एक बहन का भाई, एक का छोटा तो दो का बड़ा भाई था।

एक वो पत्नी थी जिसके दिल की मैं धड़कन था और उसी से मैंने चाँद-सूरज जैसे दो बेटे पाए थे। मुझे लगा कि वे ही मेरा सुनहरा भविष्य होंगे, मेरा कल होंगे। जिनके लिए मैंने अपनी आज तक की जिंदगी को जिया। वक्त की बात है जिनके लिए मैंने अपना सारा जीवन जिया, उनके पास आज मेरे लिए वक्त का एक लम्हा भी नहीं है।

मैं अब भी इस झूठी उम्मीद में जी रहा हूँ कि शायद भूल से ही सही पर मेरी जिंदगी में वह वक्त फिर से लौटेगा। मेरी सारी उम्मीदों पर मुझे पानी फिरता नजर आ रहा है, जैसे-जैसे मेरी उम्र का कदम आगे बढ़ता है, मेरा वजूद उतना ही पीछे खिसकता जा रहा है। इन परिवर्तनों को मैं महसूस भी कर रहा था। मैं था कि तिल-तिल मरता जा रहा था और मेरी पत्नी अब भी मेरे दीर्घायु होने के लिए कभी चतुर्थी तो कभी करवा चौथ का व्रत रख रही थी। अब मैं यह सब कुछ कैसे बयाँ करूँ कि जब मेरे जीने का ही कोई मतलब नहीं रह गया तो फिर ये व्रत व उपवास क्यों और किस लिए?

मान-अपमान, यश-अपयश अब ये सब मेरे सामने मेरा पिछला समय बनकर मुझे चिढ़ा रहे थे या शायद मुझे कुछ याद दिला रहे थे। एक वक्त था जब खाने में यदि जरा-सा नमक भी ज्यादा हो जाता तो मैं वह खाना पूरा का पूरा जैसा का तैसा छोड़ दिया करता था। तब ये ही सब मुझे इस तरह मनाते थे कि शायद मैं यदि खाना नहीं खाऊँगा तो उन पर पहाड़ जैसा कुछ टूट पड़ेगा... और आज सारा का सारा खाना ही खारा हो गया है लेकिन डरता हूँ कि यदि आज यह खाना छोड़ दिया तो इनमें से कोई भी शायद ही पूछेगा कि मैंने खाना खाया भी है या नहीं। वाह रे समय...।

वैसे तो कहानियों में अक्सर पढ़ा करता था पर शायद चुभन इतनी धारदार नहीं थी क्योंकि वे किसी और की बीती हुई बातें थीं, लेकिन आज महसूस हुआ कि अपना ही बनाया हुआ बाग बूढ़े पेड़ को अपने आँगन में शायद जगह देना नहीं चाहता है, यह जरूरी नहीं है कि सभी के साथ ऐसा ही होता हो, लेकिन अधिकांश के साथ तो शायद...।

आज मैं परेशान इसलिए ज्यादा हो रहा हूँ कि मुझे लगता है समय ठहर-सा गया है जबकि जब मैं चाहता था कि समय ठहर जाए तब वह बेवफा ठहरा नहीं और ऐसे निकल गया कि मुझे पता भी नहीं चला। मैं जिंदगी का कितना लंबा सफर तय कर चुका था, पर क्या मैं आज इस बात से संतुष्ट हूँ, क्या मैं यह महसूस कर रहा हूँ कि जिंदगी के इतने लंबे सफर में मैंने अपने लिए कितना जिया। पलटकर देखा तो मुझे लगा कि मैं अपने लिए तो जी ही नहीं सका था।

कभी पत्नी की तकलीफें तो कभी बच्चों की जरूरतें, शायद उन्हें पूरा करना ही मेरी जिंदगी का मकसद था। मेरा दुःख-दर्द तो जैसे मैं भूल ही गया था, कभी वक्त मिला भी और यार-दोस्तों या रिश्तेदारों के यहाँ जाकर चंद सुकून भरे लम्हे गुजारने का मन हुआ तो वहाँ मैंने उन्हीं सारे हादसों के बीच उन्हें भी जीता हुआ पाया था, जिस दौर में मैं जी रहा था। मुझे लगा शायद पूरा सिस्टम ही ऐसा हो गया है। धीरे-धीरे समय गुजरता गया। समय अपने नियम से ही चल रहा था परंतु समय की गति का अनुमान मैं अपने अनुभव से लगा रहा था।

शायद अनुमान की गणना में ही कहीं कोई गलती हो गई थी मुझसे। मैंने भी यदि अपना बैंक बैलेंस बनाकर रखा होता, शायद कोई ब़ड़ी प्रॉपर्टी बनाई होती, अपने नाम पर दो चार प्लाट किसी प्राइम लोकेशन पर ले रखे होते तो शायद यह जो मैं देख रहा था या जो जिंदगी में भोग रहा था, उससे तो बहुत अच्छा ही होता, कम से कम खाने में नमक कैसा है, यह पूछने वाला कोई न कोई तो होता ही, परंतु अब तो समय के हाथों बहुत मजबूर हो गया हूँ।

बुरे वक्त का एक पल भी काटना अंगारों पर चलने जैसा ही होता है। अब जब कि मैं तिल-तिल मर ही रहा हूँ तो मेरे मन में यह मलाल मरते दम तक रहेगा कि वह बेवफा समय वैसा ही क्यूँ न ठहरा जैसा मैं चाहता था, और वह पल मेरे सामने आया ही क्यों जिसकी मैंने कभी चाहत ही न की थी।

इतना होने के बावजूद एक उम्मीद की किरण अभी भी मन में जिंदा है कि मेरी पत्नी मेरी जिंदगी में वह दिन एक बार फिर से लाए जो मैंने उसके साथ अपनी जिंदगी शुरू करते समय बिताए थे ताकि मरते समय मेरे मन में यह मलाल नहीं रहे कि पूरी जिंदगी में कोई तो एक था, जो बेवफा नहीं था। फिर समय के नहीं ठहरने का मुझे कोई गम नहीं होगा। क्योंकि वे जो मेरा भविष्य थे, उनमें से एक पत्नी को लेकर व एक को पत्नी लेकर कहीं चले गए थे। मुझे पता ही नहीं चल सका और उम्मीद की वह किरण इस वक्त मेरे साथ थी। बस इसी बात से मैं अपने मन में राहत महसूस कर रहा था व अब भी उससे वफा की उम्मीद में जी रहा था।

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