रिश्तों को सहेजना बहुत मुश्किल नहीं अगर हम अपनों के बीच प्रेम व स्नेह का सेतु बाँधने का प्रयत्न करें व अपने अहं व गलतफहमियों की दीवार अपनों के बीच कभी न बनने दें।
समाज में रहते हुए हर इंसान जन्मजात रिश्तों से बँधा होता है व कुछ रिश्ते सान्निध्य व प्रेम से जीवन में जुड़ते जाते हैं। जन्मजात रिश्तों में उन्हें निभाने का बंधन होता है, परंपराओं का निर्वाह करना होता है, कुछ अपेक्षाएँ होती हैं, कुछ अधिकार होते हैं, तो कुछ कर्तव्य भी। रिश्ते काँच की तरह नाजुक होते हैं, जिन पर जरा सी चोट पहुँचते ही उनके टूटने का डर होता है। फिर टूटे रिश्तों की चुभन आजीवन दर्द देती है।
अपने निकट संबंधियों में अपेक्षाएँ कभी-कभी हद से ज्यादा होती हैं, तो कभी-कभी रिश्ते सामान्य अपेक्षाओं व आवश्यकताओं को भी पूर्ण नहीं कर पाने से बिखरने लगते हैं। इंसान कितना भी अमीर क्यों न हो जाए, प्रगति के कितने भी आयाम क्यों न स्थापित कर ले, सुख-दुःख के क्षणों में अपनों का साथ न हो तो वह अधूरा है। सुख को द्विगुणित करने, प्रसन्नता का सही सुख महसूस करने व उसका आत्मिक आनंद प्राप्त करने के लिए अपनों का साथ अति आवश्यक है। दुःख में भी, संकट की घड़ी में भी अपनों से ही दिल का दर्द बाँटा जा सकता है। अतः रिश्तों का मोल करना, उनका महत्व समझना व उन्हें बिखरने न देने की एहतियात बरतना अत्यंत आवश्यक है।
हम निर्मल सहज व्यवहार रखते हुए, सचाई व ईमानदारी रखें, बातों को खुली चर्चा द्वारा सुलझाएँ, आपस में सतत संवाद बनाए रखें, स्वयं फोन कर विशेष अवसरों पर बधाई देने की पहल करें, अपनी हैसियत व अमीरी का दिखावा कर दूसरों को नीचा न दिखाएँ व सबसे बढ़कर दूसरों से अपेक्षा रखने की बजाए स्वयं झुककर आगे बढ़कर संबंधों को सदृढ़ करने की पहल करके देखें, बदले में स्नेह व आत्मीयता दुगनी-चौगुनी ही नहीं सौ गुनी मिलेगी।
मन में आई गलतफहमियों को यथाशीघ्र दूर करना ही रिश्तों की दृढ़ता के लिए अति आवश्यक है। कभी-कभी अनजाने ही हम एक-दूसरे के व्यवहार से आहत हो उठते हैं व दूसरे को इसकी खबर ही नहीं होती। अतः स्पष्ट बात करना मन में बात को रखकर कटुता बढ़ाने से कहीं बेहतर है। हो सकता है स्पष्ट कहने से थोड़ी देर संघर्ष या वाद-विवाद हो, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम सुखद होंगे, क्योंकि मनमुटाव जन्म नहीं लेगा।
हमारे भाई-भाभी, बहन-जीजा, माता-पिता, देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी व सबके बच्चे हम सबके बीच एक पवित्र रिश्ता है। इसे सर्वोपरि मानें, एक-दूसरे की मदद माँगें, मदद करें व एक-दूसरे के सुख-दुःख में दौड़कर जाएँ। सतत एक-दूसरे को अपनेपन का, अपने साथ होने का एहसास दिलाएँ तो दूर रहकर भी नजदीकियाँ व घनिष्ठता बनी रहेगी।