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संघ महासचिव भैयाजी ने कहा, सभी संप्रदायों का सम्मान जरूरी

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अंतरराष्ट्रीय धर्म धम्म सम्मेलन
इंदौर। भारत में सांप्रदायिक असहिष्णुता को लेकर जारी जोरदार बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) सुरेश भैयाजी जोशी ने शनिवार को कहा कि विश्व कल्याण के लिए सभी संप्रदायों का सम्मान करते हुए इन्हें समान निगाह से देखा जाना जरूरी है।
जोशी ने यहां अंतरराष्ट्रीय धर्म-धम्म सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में ‘मानव कल्याण के लिए धर्म’ विषय पर केंद्रित विषय पर कहा, ‘संप्रदायों में विविधता तो रहेगी ही। हर व्यक्ति को अपनी सोच के आधार पर यह चुनने की स्वतंत्रता है कि वह किस संप्रदाय और उपासना पद्धति को माने। लेकिन हमें सभी संप्रदायों का सम्मान करने वाला बनना चाहिए।’
 
उन्होंने कहा, ‘भारतीय मनीषियों ने भी कहा है कि ईश्वर तक पहुंचने के कई मार्ग हैं। लिहाजा हमें ऐसे सभी मार्गों के प्रति समान दृष्टिकोण और इनके लिए सम्मान की भावना रखनी चाहिए। इस तरह के चिंतन से ही विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। इस बात को पूरी ताकत से दुनिया के सामने रखे जाने की जरूरत है।’
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जोशी ने इस बात पर भी बल दिया कि धर्म और संप्रदाय को अलग-अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘दुनिया में धर्म और संप्रदाय की संकल्पना को लेकर बड़ी भ्रांति है। धर्म और संप्रदाय अलग-अलग अवधारणाएं हैं। धर्म हमें सिखाता है कि कर्तव्यों के पालन में ही अधिकारों की रक्षा निहित है।’ उन्होंने कहा, ‘जब मनुष्य संप्रदायों के बीच भेद करते हैं, तो धर्म को भुला दिया जाता है और इससे संप्रदायों की ताकत बढ़ जाती है।’ 
 
संघ महासचिव ने अहिंसा को आचरण में अपनाने पर जोर देते हुए कहा, ‘हमें इस बात को समझकर अपने व्यवहार में उतारने की जरूरत है कि हमारे कृत्यों और शब्दों से किसी को भी चोट नहीं पहुंचनी चाहिए।’ जोशी ने कहा कि इस धारणा को बदले जाने की जरूरत है कि ‘हिंदू चिंतन’ किसी संप्रदाय विशेष से नहीं जुड़ा है।
 
उन्होंने कहा, ‘हिंदू चिंतन किसी संप्रदाय या पंथ का चिंतन नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय मनीषियों और विचारकों का व्यापक चिंतन है। हिंदू चिंतन को स्वीकार करने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए। हमें संकुचित मानसिकता से मुक्त होकर अंत:करण की विशालता को अपनाना चाहिए।’
 
जोशी ने कहा कि अगर मनुष्यों के बीच आपसी विश्वास, सहयोग, सहमति और स्वावलंबन की भावना होती है, तो संघर्ष और विवाद के कारण समाप्त हो जाते हैं।
 
उन्होंने कहा, ‘हो सकता है कि कुछ बातों पर मनुष्यों में असहमति हो। लेकिन मानव कल्याण के लिए यह जरूरी सूत्र है कि हमें सहमति के मुद्दों पर बल देते हुए साथ-साथ चलने की बात करनी चाहिए।’

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