हुआ पांडुरंग का जयघोष
ममत्व छोड़ समत्व सिखाता है अध्यात्म
सिर पर सफेद टोपी, माथे पर बुक्का व हाथों में केशरिया पताकाओं के साथ पांडुरंग की पालकी के उठते ही टाळ, झांझ, ढपली और मृदंग की ताल पर 'पांडुरंग हरि जय जय वासुदेव हरि' के जयघोष के साथ परिसर गूँज उठा। शाम ढलते-ढलते पांडुरंग भक्तों के साथ आती दिंडियों का उत्साह देखते ही बनता था। जहाँ केशरिया साड़ियों में नाचती, फुगड़ी खेलती महिलाएँ दिंडी की शोभा बढ़ा रही थीं, वही युवाओं के पांडुरंग की जयघोष के स्वर नगरवासियों को आषाढ़ी की महत्ता से अवगत करा रहे थे। वर्तमान समय में स्वधर्म आचरण द्वारा सामाजिक विषमता दूर की जा सकती है। जरूरत है तो सिर्फ धर्म को जस का तस आचरण में लाने की। धर्म की बुनियाद त्याग है, जो विवाद नहीं वरन समन्वय का प्रतीक है। दिंडी यात्रा में विशेष रूप से भाग लेने आए श्रीक्षेत्र कोल्हापुर के शंकराचार्य विद्यानृसिंह भारती ने चर्चा के दौरान उक्त विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि सनातन वैदिक धर्म कर्तव्य पालन पर जोर देता है जबकि लोकशाही में विवाद हक का है। आज परिवार में बाप-बेटे और सास-बहू के बीच का झग़ड़ा तो हक का है। यदि वे सही समय पर अपना अधिकार बजाना खत्म कर दें तो सारे झग़ड़े ही खत्म हो जाएँ। धर्म का तात्पर्य सद्गुणों से है। सद्कर्मो का फल हमेशा श्रेष्ठ होता है। आषाढ़ी एकादशी की दिंडी पर आपका कहना है कि भागवत धर्म की ध्वजा हाथ में लिए दिंडी के वारकरी पंढरी और पांडुरंग इन दो जीवन निष्ठाओं को महत्व देते हैं।
दिंडी अध्यात्म के साथ स्वयं को जीवन आनंद के संस्कार से जोड़ने वाला प्रवाह है जो अहंकार को भूल जनमानस में एकरूप होना सिखाता है। ममत्व को छोड़ समत्व पर बल देते विनम्र बनाता है। दिंडी नैतिक मूल्यों की पाठशाला है इसमें युवाओं का भाग लेना अच्छा संकेत है। हमारी नौजवान पी़ढ़ी को चाहिए कि वह सनातन वैदिक धर्म के व्यावहारिक नजरिए की कसौटी पर सोच परख का पश्चिम के अंधानुकरण से बचते आध्यात्मिक उन्नति करे, तभी व्यक्ति, परिवार, समाज, देश एवं विश्व का कल्याण होगा।