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ईश्वर : एक कल्पना या हकीकत?

हमें फॉलो करें ईश्वर : एक कल्पना या हकीकत?
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अनिरुद्ध जोशी

भारत में अनीश्वरवाद की शुरुआत जैन और चार्वाक मत से मानी गई है और ईश्वरवाद की शुरुआत वेद से। यूरोप में अनीश्वरवादी दर्शन की शुरुआत सोफिस्ट समुदाय और सुकरात से मानी जा सकती है। स्टोइक दर्शन भी अनीश्वरवाद को फैलाने में कामयाब रहा।
 
हालाँकि यह बहस बहुत ही प्राचीन रही है, लेकिन हर काल में यह नए रूप में सामने आती है। इस बहस का कोई अंत नहीं। यह हमारे संदेह को जितना पुख्ता करती है उतना ही हमारे विश्वास को भी। आस्तिकता और नास्तिकता को कुछ लोग अब एक ही सिक्के के दो पहलू मानने लगे हैं।
 
कार्ल मार्क्स, फ्रेड्रिक नीत्शे, इमानुएल कांट, हेगेल, जे. कृष्णमूर्ति, ओशो के अलावा ऐसे बहुत से प्रसिद्ध लोग हैं जिन्हें ईश्वर के होने पर संदेह रहा है या जिन्होंने ईश्वर के होने को नकार दिया है या यह मान लिया गया कि जीवन में ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं, चाहे वह हो या नहीं हो, जीवन ही है महत्वपूर्ण। अभी खबरों में ही कहीं पढ़ने में आया था कि मदर टेरेसा भी इस मामले में संदेह से भरी थी।
 
 
जो लोग वेद, कुरान, बाइबिल और गुरुग्रंथ साहिब को परम प्रमाण नहीं मानते उन्हें नास्तिक या अनीश्वरवादी कहा जाता है। भारत में न्याय और वेदांत दर्शनों को छोड़कर चार्वाक, सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध और जैन को नास्तिक या अनीश्वरवादी मत का माना जाता है, क्योंकि इनमें ईश्वर को रचयिता, पालक और विनाशक नहीं माना गया है।
 
 
जिसने सभी तरह के धर्म, विज्ञान, धर्मशास्त्र और समाजशास्त्र का अध्ययन किया है या जिसमें थोड़ी-बहुत तार्किक बुद्धि का विकास हो गया है वह प्रत्येक मामले में 'शायद' शब्द का इस्तेमाल करेगा और ईश्वर के मामले में या तो संशयपूर्ण स्थिति में रहेगा या पूर्णत: कहेगा कि ईश्वर का होना एक भ्रम है, छलावा है। इस छल के आधार पर ही दुनिया के तमाम संगठित धर्म को अब तक जिंदा बनाए रखा है, जो एक-दूसरे के खिलाफ है।
 
 
हाल ही के एक सर्वे से यह खुलासा हुआ कि 93 फीसदी ब्रितानी क्रिसमस पर चर्च जाने से बचते हैं। ओपिनियन मेटर्स द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक केवल 11 फीसदी लोग क्रिसमस की प्रार्थना में भाग लेते हैं। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ ही चर्च में जाती है। वैसे महिलाओं में भी यह प्रवृत्ति अब कम होती जा रही है।
 
2008 में लंदन में बहुत-सी बसों पर ईश्वर के नहीं होने का प्रचार किया गया था जिसे नास्तिकों की बस कहा जाता था। दूसरी ओर इस बस के खिलाफ ईश्‍वरवादियों ने ईश्वर के होने का भी प्रचार जोर-शोर से किया।
 
 
कहते हैं कि संकट के समय लोगों को भगवान ही याद आते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका में आर्थिक संकट शुरू होने के बाद गिरजाघरों में श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ गई थी। पश्चिमी देशों में आर्थिक मंदी के दौर में नौकरियाँ बचाने के लिए लोग प्रत्येक वह उपक्रम कर रहे थे जिसके लिए शायद वे तैयार नहीं थे। जैसे कि बॉस या भगवान की चापलूसी करना, ज्योतिष से सलाह लेना या फिर खुद का कोई व्यापार शुरू करने के बारे में सोचना।
 
 
उपरोक्त सर्वे इस्लाम को छोड़कर सभी धर्म के लोगों पर लागू किया जा सकता है, क्योंकि मस्जिद में महिलाएँ नहीं जाती। हालाँकि मस्जिदों में नमाज के लिए बढ़ती तादाद से लगता है कि मुस्लिम जनता पहले की अपेक्षा इस्लाम के ज्यादा नजदीक हो चली है। इस्लाम में नास्तिक लोगों को काफीर कहा जाता है।
 
हालाँकि मंदिर या मस्जिदों में बढ़ती तादाद को धार्मिकता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। लोग संकट के चलते, कट्टरता के चलते या सामाजिक दबाव के चलते धार्मिक स्थल, उत्सव या आयोजनों में जाने लगे हैं दूसरी ओर चूँकि धर्म भी आज के युग में व्यापार का बहुत बड़ा जरिया है इस कारण भी लोग उससे जुड़े हुए हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि धर्म पूर्णत: निजी मामला है। प्रार्थना में माँग है तो फिर धर्म उसमें कहाँ रहा।
 
 
आधुनिक माइंड : वैज्ञानिक और बौद्धिक युग में तो नास्तिक या अनीश्वरवादियों की संख्या कुछ कम नहीं है। अनीश्वरवादी लोग सभी देशों और कालों में पाए जाते हैं। कार्ल मार्क्स के बाद अनीश्वरवादियों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है, लेकिन अनीश्वरवाद के मायने सभी जगह अलग-अलग रहे हैं।
 
 
एक दौर था जबकि लोग या तो ईश्वर को मानते या नहीं मानते थे, लेकिन आधुनिक मनुष्य को समझ में नहीं आ रहा है कि ईश्वर है या नहीं। सारे तर्क, सारे तथ्य और विज्ञान की बातें तो ईश्‍वर के नहीं होने की सूचना देते हैं, लेकिन जीवन के दुख और संताप से बचना है तो ईश्वर को मानने में कोई बुराई नहीं है। यदि हमने कहा कि ईश्वर नहीं है तो फिर समाज, धर्म और शायद राष्ट्र से भी हमें बहिष्कृत कर दिया जाए। तो चुप रहो।
 
 
जैन और बौद्ध धर्म को नास्तिकों का धर्म माना जाता है। कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग भी नास्तिक माने जाते हैं। विज्ञान ने अभी तय नहीं किया है कि ईश्वर है या नहीं है। विज्ञान का मानना है कि ईश्वर को जानने से कहीं ज्यादा जरूरी है ब्रह्मांड के रहस्य को जानना। ब्रह्मांड का परम तत्व कौन-सा है उसे जानना। वेद ने जिसे ब्रह्माणु कहा है विज्ञान ने अभी उसकी खोज जारी रखी हुई है।
 
तार्किक युद्ध :
अनीश्वरवादियों का तर्क : यदि आप यह कहते हैं कि ईश्वर, अल्लाह या गॉड ने संसार को छह दिन में बनाकर सातवें दिन विश्राम किया तो फिर तर्क करने वाले कहेंगे कि ईश्वर को किसने बनाया और क्या ईश्वर को भी आराम करने की आवश्यकता होती है। सृष्टी बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या आत्मा भी बनाई गई है? यदि बनाई है तो कौन से तत्व से बनाई। क्या ईश्वर को भी शैतान से डर लगता है। दुनिया में लोगों के साथ इतना अन्याय होता है न्याय तो होता कहीं दिखता ही नहीं। देर भी है और अंधेर भी।
 
अनीश्वरवादी लोग मानते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व का कोई सबूत नहीं है। ब्रह्मांड या प्रकृति के सारे नियमों को विज्ञान से समझा जा सकता है। जगत और जीवन की उत्पत्ति, पालन और विनाश के नियम को भी विज्ञान समझा सकता है। धर्मग्रंथों में जो भी लिखा है वह कपोलकल्पित और मानव को भ्रमित करने वाला है।
 
उनकी परीकथाएँ मनुष्य के दिमाग में इस कदर घुस गई है कि अब वे उसे किसी भी तरह से असत्य मानने को तैयार नहीं है, जबकि उनके कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। स्वर्ग और नर्क की कल्पनाएँ, प्रलय या कयामत के दिन के फैसले की बातें या फिर भयभीत करने वाला ईश्वर। ईश्वर भी ऐसा कि दूसरे धर्म के ईश्‍वर से श्रेष्ठ और लड़ाने वाला ईश्वर। पाप और पुण्य का डर बिठाने वाला ईश्‍वर। धर्मग्रंथों की बकवास और झूठी बातों ने एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग कर उनमें नफरत के बीज बो दिए हैं।
 
ईश्‍वरवादियों का तर्क : इस ब्रह्मांड को सृजित करने वाला कोई तो होगा। मनुष्य की ताकत नहीं है कि वह ब्रह्मांड रच दे या मनुष्य बना दें। नास्तिक या अनीश्वरवादी लोग देखी, सुनी, महसूस की हुई या तार्किक बातों को ही सत्य मानते हैं जबकि सत्य को जानना इतना आसान नहीं।
 
ईश्वर रहस्यपूर्ण और अनंत है उसे तर्क या विज्ञान के द्वारा नहीं जाना जा सकता। कोई तो है ‍जो हम सभी को जिंदा और इस ब्रह्मांड को चलायमान रखे हुए है। ईश्‍वर के कारण ही हम नियमों से बंधे रहकर सत्य और न्याय की राह पर चलते हैं। न्याय का राज्य ईश्वर से ही कायम रहता है। हम इस ब्रह्मांड में रेत के एक कण पर खड़े हैं। विशालकाय ब्रह्मांड का और हमारा होना ही उसके होने की सूचना देता है। इससे बड़ा और दूसरा कोई सबूत नहीं।

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