इतिहास बना महाकुंभ 2010

देश भर में छोड़ी अपनी अमिट छाप

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पूरी दुनिया में तीर्थ नगरी के नाम से विख्यात हरिद्वार में इस साल संपन्न हुए विश्व के विशालतम महाकुंभ के दौरान एक हजार करोड़ रुपए का कारोबार हुआ और करोड़ों के जेहन में अमिट छाप छोड़कर हिंदू आस्थाओं और परंपराओं के समागम का यह महामेला इतिहास में दर्ज हो गया।

उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद पहली बार लगे महाकुंभ से जुडे़ आँकडों के अनुसार वर्ष 2010 में संपन्न यह विशाल मेला कुल 107 दिन तक लगातार चला और इस दौरान आठ करोड़ 27 लाख 71 हजार लोगों ने गंगा में स्नान किया। यह आँकड़े उपग्रह से एकत्रित किए गए थे।

गुजरे साल में महाकुंभ न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ऐतिहासिक साबित हुआ, बल्कि वाणिज्यिक दृष्टि से भी काफी लाभप्रद रहा। इस दौरान एक हजार करोड़ से भी अधिक का कारोबार हुआ।

मेले से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि गुजरे साल के महाकुंभ ने अपने पीछे कई इतिहास बनाएँ, जो कभी किसी भी महाकुंभ में नहीं हुए थे। इतिहास बताते हैं कि पिछले 100 वर्षों में कभी भी सभी 13 अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने एकसाथ स्नान नहीं किया था लेकिन इस महाकुंभ में सभी अखाड़ों ने पूरी सद्भावना और एकजुट होकर स्नान किया जिससे वर्ष 2010 ने नया इतिहास रचा।

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गुजरे साल में संपन्न हुए महाकुंभ के दौरान दूसरी ऐतिहासिक उपलब्धि यह रही कि आधिकारिक तौर पर तीन शाही स्नान की जगह चार शाही स्नान संपन्न हुए। शाही स्नानों को महाकुंभ की आत्मा माना जाता है और लाखों की संख्या में लोग स्नान के साथ ही शाही जुलूस में शामिल संतों और महात्माओं की चरण रज अपने माथे पर लगाकर पुण्य कमाने के लिए ही आते हैं। जब शाही जुलूस गुजर जाता है तो लोग बड़ी श्रद्धा से उस रास्त की धूल को अपने माथे पर लगाते हैं।

वर्ष 2010 के महाकुंभ में तीसरी ऐतिहासिक उपलब्धि के तौर पर दुनिया के 140 देशों के 67 भाषाएँ बोलने वाले लोगों ने इसमें न केवल हिस्सा लिया बल्कि इस आयोजन पर शोध, फिल्मांकन, वृत्तचित्र निर्माण और लेखन का काम किया।

गुजरे साल के महाकुंभ की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह रही कि 130 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले महाकुंभ के दौरान एक भी व्यक्ति डूबकर नहीं मरा। हालाँकि स्नान करने के दौरान असंख्य लोग तेज धारा में बह गए, लेकिन सभी को समय रहते बचा लिया गया।

गुजरे साल में दुनिया के किसी भी कोने में इतना विशाल स्नान समागम नहीं संपन्न हुआ, जिसमें एक ही दिन में एक करोड़ 66 लाख लोगों ने स्नान किया और इनकी गिनती विशेषज्ञों द्वारा सेटेलाइट के माध्यम से की गई।

जाते साल के इस महाकुंभ को कई बरसों तक याद रखा जाएगा। इतने विशालतम मेले में पूरे 107 दिन तक एक भी आपराधिक घटना नहीं हुई और न ही कोई बड़ी वारदात हुई। इस दौरान पुलिस और सुरक्षाकर्मियों ने दस हजार से भी अधिक खोए हुए लोगों को उनके परिजनों से मिलवाया तथा हजारों भटके बुर्जुगों को उनके गंतव्य तक पहुँचाया।

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इस कुंभ के दौरान 25 हजार से भी अधिक पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था तथा उन्हें किसी प्रकार का हथियार नहीं दिया गया था। उनके पास पशुओं को हटाने के लिए केवल एक डंडा था।

वर्ष 2010 में संपन्न हुए इस महाकुंभ के दौरान सफाई व्यवस्था के लिए 10 हजार से भी अधिक सफाईकर्मी लगाए गए थे। रात दिन सफाई के चलते इतने लोगों के आने और रहने के बावजूद किसी प्रकार की बीमारी फैलने नहीं पाई।

इस महाकुंभ के दौरान करीब पाँच अरब रूपए खर्च किए गए। यह भी अपने में एक इतिहास रहा। कुंभ के दौरान 75 प्रतिशत कार्य स्थायी प्रकृति के थे, जबकि मात्र 25 प्रतिशत कार्य ही अस्थायी प्रकृति के थे जिनके सामान का भी बाद में उपयोग किया गया।

उत्तराखंड के चार जिलों देहरादून, पौड़ी, टिहरी और हरिद्वार को जोड़कर महाकुंभ के लिए एक अलग जिला बनाया गया था। यह भी अपने में एक इतिहास था। अन्य कुंभों में एक ही जिले में इस मेले को संपन्न कराया जाता है। (भाषा)

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