भगवान विष्णु के ये 6 अवतार नहीं थे मनुष्य

भगवान विष्णु ने सिर्फ मनुष्‍य रूप में ही अवतार नहीं लिया था। उन्होंने समय और परिस्थिति अनुसार अन्य रूप में अवतार भी लिया था। ऐसे ही 5 अवतारों की संक्षिप्त जानकारी।
 
 
2- वराह अवतार : भगवान विष्णु ने वराह नाम से तीन अवतार लिए थे। पहला आदि वराह, दूसरा नील वराह और तीसरा श्वेतवराह। आदि वराह अवतार लेकर उन्होंने असुर हिरण्याक्ष का वध किया था और धरती को अपने दांतों से जल के बाहर निकाला था। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। सुअर को वराह कहते हैं।

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2.मत्स्य अवतार : पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। मत्स्य अर्थात मछली। कहते हैं इस अवतार में उन्होंने वैवस्वत मनु को एक विशाल नाव बनाकर उसमें सभी पशु, पक्षी, नर नारी, ऋषि मुनियों को रखने का आदेश निया था ताकि जल प्रलय के समय अधिकतर प्रजातियां बची रहे।
 
 
3.कच्छप अवतार : इस कूर्म अवतार भी कहते हैं। समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ।

 
4.नृसिंह अवतार : इस अवतार में भगवान विष्णु का शरीर आधे मनुष्य और आधे सिंह के समान था। भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध कर अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी।

 
5.हयग्रीव अवतार : धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षस ब्रह्माजी से वेदों का हरण कर रसातल में पहुंच गए। वेदों का हरण हो जाने से ब्रह्माजी बहुत दु:खी हुए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के समान थी। तब भगवान हयग्रीव रसातल में पहुंचे और मधु-कैटभ का वध कर वेद पुन: भगवान ब्रह्मा को दे दिए।

 
6. हंस अवतार : एक बार भगवान ब्रह्मा अपनी सभा में बैठे थे। तभी वहां उनके मानस पुत्र सनकादि पहुंचे और भगवान ब्रह्मा से मनुष्यों के मोक्ष के संबंध में चर्चा करने लगे। तभी वहां भगवान विष्णु महाहंस के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सनकादि मुनियों के संदेह का निवारण किया। इसके बाद सभी ने भगवान हंस की पूजा की। इसके बाद महाहंसरूपधारी श्रीभगवान अदृश्य होकर अपने पवित्र धाम चले गए।
 

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