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महाभारत के ये उलझे हुए रिश्ते...

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Mahabharata relationship
महाभारत में भारत का प्राचीन इतिहास दर्ज है। महाभारत का हर पात्र ऐसा है जिसके ऊपर अलग से एक ग्रंथ लिखा जा सकता है। महाभारत में एक ओर जहां सामाजिक नियमों का उल्लेख मिलता हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक नियमों के उल्लंघन की अनेक घटनाएं ‍भी मिलती है।
mahabharat
महाभारत में एक ओर जहां धर्म और नीति की बाते हैं वहीं अधर्म और अनीति के कई कांड मिल जाएंगे। महाभारत कालीन रिश्ते और उनके द्वंद्व, जिसमें छल, ईर्ष्या, विश्वासघात और बदले की भावना का बाहुल्य है, लेकिन इसी में प्रेम-प्यार, अकेलापन और बलिदान भी है।
 
इसी तरह हमने खोजे हैं कुछ ऐसे रिश्ते जिनको महाभारत काल में ही नहीं आज के काल में भी मान्यता नहीं दी जा सकती। आओ जानते हैं कि ऐसे ही रिश्तों के बारे में।
 
अगले पन्ने पर पहला रिश्ता...
 

पांडु का अपनी पत्नियों से रिश्ता : 
महाभारत के आदिपर्व के अनुसार एक दिन राजा पांडु आखेट के लिए निकलते हैं। जंगल में दूर से देखने पर उनको एक हिरण दिखाई देता है। वे उसे एक तीर से मार देते हैं। वह हिरण एक ऋषि निकलते हैं तो अपनी पत्नी के साथ मैथुनरत थे। वे ऋषि मरते वक्त पांडु को शाप देते हैं कि तुम भी मेरी तरह मरोगे, जब तुम मैथुनरत रहोगे। इस शाप के भय से पांडु अपना राज्य अपने भाई धृतराष्ट्र को सौंपकर अपनी पत्नियों कुंती और माद्री के साथ जंगल चले जाते हैं।
 
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जंगल में वे संन्यासियों का जीवन जीने लगते हैं, लेकिन पांडु इस बात से दुखी रहते हैं कि उनकी कोई संतान नहीं है और वे कुंती को समझाने का प्रयत्न करते हैं कि उसे किसी ऋषि के साथ समागम करके संतान उत्पन्न करनी चाहिए। कुंती पर-पुरुष के साथ नहीं सोना चाहती तो पांडु उसे यह कथा सुनाते हैं।
 
प्राचीनकाल में स्त्रियां स्वतंत्र थीं और वे जिसके साथ चाहें उसके साथ समागम कर सकती थीं, जैसे पशु-पक्षी करते हैं। केवल ऋतुकाल में पत्नी केवल पति के साथ समागम कर सकती है अन्यथा वह स्वतंत्र है। यही धर्म था, जो नारियों का पक्ष करता था और सभी इसका पालन करते थे।
 
एक उद्दालक नाम के प्रसिद्ध मुनि थे जिनका श्वेतकेतु नाम का एक पुत्र था। एक बार जब श्वेतकेतु अपने माता-पिता के साथ बैठे थे, एक ब्राह्मण आया और श्वेतकेतु की मां का हाथ पकड़कर बोला, 'आओ चलें।' अपनी मां को इस तरह जाते हुए देख कर श्वेतकेतु बहुत क्रुद्ध हुए किंतु पिता ने उनको समझाया कि नियम के अनुसार स्त्रियां गायों की तरह स्वतंत्र हैं जिस किसी के भी साथ समागम करने के लिए। इन्हीं श्वेतकेतु के द्वारा फिर यह नियम बनाया गया कि स्त्रियों को पति के प्रति वफादार होना चाहिए और पर-पुरुष के साथ समागम करने का पाप भ्रूणहत्या की तरह होगा।
 
पांडु और भी कथाएं सुनाते हैं और कुंती को विश्वास दिला देते हैं कि पर-पुरुष के साथ संतान पैदा करने से उन्हें पाप नहीं लगेगा।
 
इसके बाद कुंती और माद्री को जब यह विश्वास हो जाता है कि पति पराए पुरुष से हमारे संबंधों पर ऐतराज नहीं है, तब कुंति मंत्र शक्ति के बल पर एक-एक कर 3 देवताओं का आह्वान कर 3 पुत्रों को जन्म देती है। धर्मराज से युधिष्टिर, इंद्र से अर्जुन, पवनदेव से भीम को जन्म देती है वहीं इसी मंत्र शक्ति के बदल पर माद्री ने भी अश्विन कुमारों का आह्वान कर नकुल और सहदेव को जन्म दिया।
 
इसका मतलब यह कि पांडु पुत्र असल में पांडु पुत्र नहीं थे। उसी तरह कुंति अपनी कुंवारी अवस्था में सूर्यदेव का आह्‍वान कर कर्ण को जन्म देती है इस तरह कुंति के 4 और माद्री के 2 पुत्र मिलाकर कुल 6 पु‍त्र होते हैं। यदि ये सभी पांडु पुत्र नहीं थे तो क्या इन्हें फिर भी हस्तिनापुर की गद्दी पर अधिकार था?
 
अगले पन्ने पर दूसरा रिश्ता...
 

धृतराष्ट्र का गांधारी से रिश्ता:-
कहते हैं कि गांधारी ने धृतराष्‍ट्र से मजबूरीवश विवाह किया था। इसका कारण भीष्म थे। गांधारी के पुत्रों को कौरव पुत्र कहा गया लेकिन उनमें से एक भी कौरववंशी नहीं था। धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था।
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सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थी, तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए। युयुत्सु एन वक्त पर कौरवों की सेना को छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल हो गया था।
 
गांधारी ने वेदव्यास से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर किया। गर्भ धारण कर लेने के पश्चात भी दो वर्ष व्यतीत हो गए, किंतु गांधारी के कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई। इस पर क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट पर जोर से मुक्के का प्रहार किया जिससे उसका गर्भ गिर गया।
 
वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल ही जान लिया। वे गांधारी के पास आकर बोले- 'गांधारी! तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र ही सौ कुंड तैयार करवाओ और उनमें घृत (घी) भरवा दो।'
 
वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गए। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए हुए सौ कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश देकर अपने आश्रम चले गए। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। फिर उन कुंडों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दु:शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ।
 
कौरव क्यों नहीं थे कौरव? : शांतनु और गंगा से उत्नन्न पुत्र को देवव्रत कहा जाता है इस देवव्रत ने जब आजीवन ब्रह्मचर्य रहने की प्रतिज्ञा ले ली तब उन्हें भीष्म कहा जाने लगा। यह तो सभी जानते हैं कि इस प्रतीज्ञा के पीछे शांतनु की दूसरी पत्नी निषाद कन्या सत्यवती का हाथ था। सत्यवती चाहती थी कि उसके ही पुत्र राजगद्दी पर बैठे। सत्यवती जब कुंवारी थी तब उसको एक पुत्र हुआ था जिसका नाम वेद व्यास था। फिर शांतनु से सत्यवती को दो पुत्र प्राप्त हुए। पहला पुत्र तो रोगवश मारा गया लेकिन दूसरा पुत्र विचित्रवीर्य जरूर कुछ समय तक जिंदा रहा।
 
विचित्रवीर्य की 2 पत्नियां अम्बिका और अम्बालिका थीं। दोनों को कोई पुत्र नहीं हो रहा था तो सत्यवती के पुत्र वेदव्यास माता की आज्ञा मानकर बोले, 'माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिए कि वे मेरे सामने से निर्वस्त्र होकर गुजरें जिससे कि उनको गर्भ धारण होगा।'
 
सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका और फिर छोटी रानी अम्बालिका गई, पर अम्बिका ने उनके तेज से डरकर अपने नेत्र बंद कर लिए जबकि अम्बालिका वेदव्यास को देखकर भय से पीली पड़ गई। वेदव्यास  लौटकर माता से बोले, 'माता अम्बिका को बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किंतु नेत्र बंद करने के दोष के कारण वह अंधा होगा जबकि अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र पैदा होगा।'
 
यह जानकर के माता सत्यवती ने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जाकर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी बिना किसी संकोच के वेदव्यास के सामने से गुजरी। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आकर कहा, 'माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदांत में पारंगत अत्यंत नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।' इतना कहकर वेदव्यास तपस्या करने चले गए।
 
अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और दासी से विदुर का जन्म हुआ। तीनों ही ऋषि वेदव्यास की संतान थी। अब आप सोचिए इन्हीं 2 पुत्रों में से एक धृतराष्ट्र के यहां जब कोई पुत्र नहीं हुआ तो वेदव्यास की कृपा से ही 99 पुत्र और 1 पुत्री का जन्म हुआ।
 
अगले पन्ने पर चौथा रिश्ता...
 

द्रौपदी का अपने पतियों से रिश्ता : एक स्त्री पांच पुरुषों से कैस विवाह कर सकती है, जबकि एक पुरुष पांच स्त्रियों से विवाह कर सकता है। प्राचीन काल से ही स्त्रियों का ऐसा करना वर्जित माना गया है।
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कहते हैं कि द्रौपदी का जन्म महाराज द्रुपद के यहां यज्ञकुण्ड से हुआ था इसीलिए उनका नाम यज्ञसेनी था। श्याम वर्ण होने के कारण उन्हें कृष्णा, अज्ञातकाल में इत्र बेचने के कारण सैरंध्री कहा जाने लगा। पांचाल नरेश की पुत्री होने के कारण उनको पांचाली भी कहते थे। महाभारत में द्रौपदी ही एकमात्र ऐसी स्त्री थीं जिसने पांच पुरुषों को अपना पति बनाया था।
 
पांडवों द्वारा इनसे जन्मे पांच पुत्र (क्रमशः प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ती, शतानीक व श्रुतकर्मा) उप-पांडव नाम से विख्यात थे।
 
एक कथा अनुसार जब द्रोणाचार्य ने बदले की भावना से गुरुदक्षिणा में पांडवों से द्रुपद राजा को बंदी बनाकर लाने का कहा तो पांडवों ने ऐसा ही किया। राजा द्रुपद को अपमानित महसूस करना पड़ा जिसके चलते वे जंगल चले गए जहां उनकी भेंट दो मुनिकुमारों याज और उपयाज से हुई। उन्होंने उनसे पूछा की द्रोणाचार्य को मारने का कोई उपाय है तो मुनिकुमारों ने कहा कि आप यज्ञ का आयोजन कीजिए।
 
द्रुपद ने ऐसा ही किया और उनके यज्ञ से अग्निदेव प्रकट हुए जिन्होंने एक शक्तिशाली पुत्र दिया जो संपूर्ण आयुध और कवच युक्त था। फिर उन्होंने एक पुत्री दी जो श्यामला रंग की थी। उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के संहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है। बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया। यही कृष्णा द्रुपद पुत्री होने के कारण द्रौपदी कहलाई।
 
अगले पन्ने पर पांचवां रिश्ता...
 

श्रीकृष्ण और अर्जुन का रिश्ता : महाभार में भगवान श्रीकृष्ण के सखा थे अर्जुन। लेकिन अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण की बहिन से विवाह किया तो वे उनके जीजा भी बन गए थे।
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लेकिन भगवान श्रीकृष्ण का अर्जुन से ही नहीं बल्कि दुर्योधन से भी करीबी रिश्ता था। श्री कृष्ण की आठ पत्नियां थीं जिसमें से एक का नाम जामवंती था जो रामायण काल के जामवंतजी की पुत्री थी। इसी जामवंती से श्रीकृष्ण को एक पुत्र मिला जिसका नाम साम्ब था। इस साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से विवाह किया था। इस तरह दुर्योधन और श्रीकृष्ण दोनों एक दूसरे के समधी थे।

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