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संस्कृत आधारित होंगे नई पीढ़ी के कप्यूटर

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वृजेन्द्रसिंह झाला

देश के प्रसिद्ध द दून स्कूल, देहरादून के संस्कृत और हिन्दी विभाग के प्रमुख मनोज पांडेय का मानना है कि जब तक संस्कृत को रोजगार और बाजार से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक इसे जनसामान्य की भाषा नहीं बनाया जा सकता। हालांकि संस्कृत को वर्ग विशेष की भाषा माना जाता है, लेकिन आज भी कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां संस्कृत में करियर बनाया जा सकता है।
 
मनोज पांडेय ने वेबदुनिया से बातचीत में कहा कि विद्यालयों में संस्कृत के पठन और पाठन पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है। शिक्षकों को इसको रटाना नहीं चाहिए बल्कि रुचिपूर्वक तरीके से पढ़ाना चाहिए ताकि विद्यार्थी इसे आसानी से और खेल-खेल में समझ और सीख सकें। वे कहते हैं कि जब लोग जर्मन और फ्रेंच भाषा सीख सकते हैं, तो संस्कृत क्यों नहीं। दुर्भाग्य से हम अपनी इस प्राचीन भाषा से दूर भाग रहे हैं, दूसरी ओर विदेशी हमारी संस्कृति और ज्ञान को समझने के लिए इस भाषा को सीख रहे हैं। 
 
पांडेय कहते हैं कि मैंने एक आलेख पढ़ा था जिसके अनुसार नासा पिछले 20 वर्षों से संस्कृत पर काम कर रहा है। इस पर करोड़ों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। वे संस्कृत आधारित अगली पीढ़ी का कंप्यूटर तैयार करने के लिए काम कर रहे हैं। कह सकते हैं कि अगली पीढ़ी का कंप्यूटर संस्कृत आधारित ही होगा। हम सभी जानते हैं कि संस्कृत अथवा देवनागरी में हम जो लिखते हैं, वही बोलते हैं। यहां कोई अक्षर लुप्त (साइलेंट) नहीं होता, जबकि अंग्रेजी में लिखा कुछ जाता है और बोला कुछ जाता है। अत: बोलने वाले कंप्यूटर के लिए संस्कृत जरूरी भाषा होगी।
मेडिकल साइंस में भी संस्कृत का काफी प्रयोग हो रहा है। विदेशों में इस पर काफी काम हो रहा है। शल्य चिकित्सा के जनक सुश्रुत का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि शल्य चिकित्सा पर विदेशों में काफी बात हो रही है। अमेरिका में एक सर्जरी विभाग के बाहर लिखा हुआ है कि सर्जरी का आविष्कारक देश भारत है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत स्पीच थैरपी के लिए भी सबसे उपयुक्त भाषा है। जिन लोगों का उच्चारण सही नहीं है अथवा जो बच्चे बोलने में हकलाते हैं, उन्हें संस्कृत श्लोक बोलने का अभ्यास कराना चाहिए। इससे वे धीरे-धीरे स्पष्ट बोलना शुरू कर देंगे। वे कहते हैं कि शिक्षक बनने के अलावा भी संस्कृत जानने वालों को कई क्षेत्रों में रोजगार की अच्छी संभावनाएं हैं। संस्कृत विषय के साथ व्यक्ति आईएएस और राज्य सेवा परीक्षाओं में भी सम्मिलित हो सकता है साथ ही सेना में धार्मिक शिक्षक भी बन सकता है। पुरातत्व के क्षेत्र में शिलालेख आदि पढ़ने के लिए संस्कृत जानने वाले की काफी जरूरत होती है। ज्योतिष, वास्तु जैसे परंपरागत क्षेत्र तो हैं ही। 
इतना सब कुछ होने के बाद भी संस्कृत पर मृत भाषा का ठप्पा क्यों लगा हुआ? इस सवाल के जवाब में पांडेय कहते हैं कि इस तरह की धारणा गलत है। संस्कृत मृत भाषा नहीं है। सुबह से लेकर शाम तक हम अपने दैनिक जीवन में संस्कृत के सैकड़ो शब्दों का उपयोग करते हैं।
हालांकि वे इस बात से जरूर इत्तेफाक रखते हैं कि संस्कृत के लेखक परंपरागत विषयों- आयुर्वेद, योग, दर्शन आदि पर ही ज्यादा लिखते हैं, लेकिन अब उन्हें पर्यावरण, जल प्रबंधन, गरीबी आदि वैश्विक विषयों समस्याओं पर लिखना चाहिए। वे सरल संस्कृत में आधुनिक संदर्भ में पुस्तकें और लेख लिखें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उसे समझ सकें और इस प्राचीन भाषा से जुड़ सकें। प्रबंधन की दृष्टि से गीता बहुत ही श्रेष्ठ ग्रंथ है, इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए। पंचतंत्र आज भी इसलिए लोकप्रिय है क्योंकि उसे सरल भाषा में लिखा गया है। 
 

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