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Shri Krishna 9 June Episode 38 : श्रीकृष्णा ने जब तोड़ दिया शिव का धनुष, आकाश में गुंजा नाद

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अनिरुद्ध जोशी

मंगलवार, 9 जून 2020 (22:11 IST)
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 9 जून के 38वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 38 ) में... वह सुंदरी कहती हैं आज नहीं तो कोई बात नहीं प्रभु। जब मैंने इतने जन्मों तक प्रतीक्षा की है तब इस जनम में भी मैं अपनी कुटिया में बैठी आपके चरणों की प्रतीक्षा करूंगी। यह कहने के बाद वह सुंदरी प्रभु के चरणों में अंगराग लगा देती है। फिर वह उनके चरणों में अपना सिर रख देती हैं। प्रभु वहां से चले जाते हैं।
 
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 
 
वहां के बाद प्रभु रंगशाला में रखे शिव के धनुष को देखने जाते हैं। धनुष पर कड़ा प्रहरा होता है। सभी लोग दूर से ही शिव के धनुष के दर्शन कर रहे होते हैं। एक पंडितजी शिव धनुष की पूजा और देख-रेख कर रहे होते हैं और दूसरा उनका एक सेवक लोगों को धनुष के पास पत्ते पर रखे प्रसाद को लाकर दे ररहा था और पुन: धनुष के पास जाकर लौट रहा था। श्रीकृष्ण और बलराम पहले उस सेवक को नमस्कार करते हैं और फिर मौका देखकर उस सेवक के पीछे हाथ जोड़े-जोड़े चल देते हैं। सैनिक समझते हैं कि यह पंडितों के ही सेवक हैं। वे धनुष के पास पहुंच जाते हैं और नमस्कार मुद्रा में दोनों खड़े हो जाते हैं।
 
वह सेवक जब प्रसाद का दूसरा पत्ता पंडितजी से लेकर पलटता है तो वह दोनों को वहां खड़ा देखकर कहता है, अरे! तुम लोग यहां क्या कर रहे हो? श्रीकृष्ण कहते हैं कि हम लोग भगवान शिव के दर्शन कर रहे हैं।.. सेवक कहता है चलो चलो, बाहर से दर्शन करो। अंदर आने की अनुमति नहीं है। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं अब अंदर आ ही गए हैं तो भगवान के चरण तो छू लेने दीजिये। फिर श्रीकृष्ण दूसरे पंडित की ओर देखकर कहते हैं, अब आप ही कहिये ना पंडितजी हम भी शिवजी के परम भक्त हैं। पंडितजी कहते हैं ठीक है।
 
भगवान शिव भी यह दृश्य आसमान से देख रहे होते हैं।
 
श्रीकृष्ण धनुष के पास रखी भगवान शंकर की प्रतिमा के पैर छूते हैं और फिर कहते हैं आह आह कैसा भव्य धनुष हैं। फिर वे पंडितजी से पूछते हैं क्या कल इसी का यज्ञ होगा? पंडितजी कहते हैं हां। ये भगवान शिव का ही धनुष है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं तनिक इसे छूकर देख लें? प‍ंडितजी हां में गर्दन हिला देते हैं।
 
फिर वे धनुष को छूकर प्रणाम कहते हैं और कहते हैं तनिक इसे उठाकर देखें? यह सुनकर पंडितजी आश्चर्य से कहते हैं बालक इसे उठाना कोई खेल नहीं। आज संसार में कोई ऐसा नहीं जो इसे उठाकर इस पर प्रत्यंचा चढ़ा सके। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि आप आज्ञा दें तो मैं इसे उठाकर दिखा सकता हूं। यह सुनकर पंडितजी हंस देते हैं और कहते हैं अच्‍छा प्रयास करो।
 
तब वहां खड़ा एक सुरक्षा प्रधान कहता है ये बालक शिव धनुष उठाएगा? ऐसा कहकर वह हंसने लगता है। उसके साथ सभी सैनिक भी हंसने लगते हैं। चारों और ठहाके गुंजने लगते हैं। श्रीकृष्ण भगवान शंकर की मूर्ति की ओर देखते हैं फिर आंखें बंद करके वे भगवान शिव से आज्ञा मांगते हैं। भगवान शंकर हाथ जोड़कर उन्हें आज्ञा देते हैं। 
 
फिर श्रीकृष्ण तुरंत ही अपने दोनों हाथ धनुष पर रखते हैं और उसे किसी पत्ते की तरह उठा लेते हैं। यह देखकर वहां खड़े सभी लोग दंग और भयभीत हो जाते हैं। बलरामजी हाथ जोड़े श्रीकृष्ण के पास खड़े रहते हैं तुरंत ही श्रीकृष्ण उस धनुष की एक भुजा को भूमि पर रखकर दूसरी भुजा पर लटकी डोरी को पकड़ लेते हैं। वहां खड़े सभी की आंखें फटी की फटी रह जाती है किसी को समझ में नहीं आता है कि क्या करें।
 
तभी श्रीकृष्ण भगवान शिवजी की ओर देखते हुए डोरी को खींचकर धनुष को तोड़ देते हैं। उस धनुष के टूटने का भयंकर नाद हो होता है। वहां हाहाकार मच जाता है। अफरा-तफरी मच जाती है। दूर अपने महल में बैठे कंस का मुकुट गिर जाता है। शिव की पूजा कर रहे यज्ञकर्ता पुरोहित सत्यक के हाथों से दूध का लौटा छूट जाता है। यह भयंकर नाद आकाश में गुंज जाता है।
 
कारागार में देवकी और वसुदेव भी इस नाद को सुनकर घबरा जाते हैं। दूसरी ओर ऋषि गर्ग प्रसन्न हो जाते हैं। कुटिया में बंद उग्रसेन इस भयंकर नाद को सुनकर आश्चर्य और प्रसन्नता से भर जाते हैं। आकाश में देवता खड़े होकर श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हैं।
 
फिर कृष्ण उस टूटे धनुष के एक टूकड़े को बलराम को सौंप देते हैं और दूसरा खुद उठा लेते हैं। वहां खड़ी जनता में से एक कहता है सचमुच यही तारणहार है। यह देखकर सुरक्षा प्रधान कहता है पकड़ लो इन दोनों को, भागने न पाएं। सभी सैनिक दोनों को घेर लेते हैं। फिर श्रीकृष्ण और बलराम सभी सैनिकों पर टूट पड़ते हैं। देखते ही देखते सैनिकों की लाशों के ढेर लग जाते हैं बाकी भाग जाते हैं। फिर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों टूटे धनुष को उसके स्थान पर रखकर वहां से चले जाते हैं।
 
उधर, कंस के समक्ष वह पंडित और सुरक्षा प्राधान उपस्थित होकर सारा वाकया बताते हैं तो कंस भड़क जाता है। सैन्य प्रधान कहता है कि हम तो समझ रहे थे कि वह फूल चढ़ाने आया है। कोई ये सोच भी नहीं सकता था कि जिस धनुष को उठाने के लिए 10-10 लोग लग रहे हैं उसे वह सुकुमार बालक एक ही झटके में उठा लेगा। कंस यह सुनकर भड़कते हुए कहता है, सुकुमार बालक! वही सुकुमार बालक हमारा परम शत्रु है क्या तुम ये नहीं जानते थे? यह सुनकर सुरक्षा प्रधान और भी भयभीत हो जाता है। वह कहता है महाराज मेरे सारे सैनिकों ने उस पर आक्रमण किया लेकिन मेरे सारे सैनिक मारे गए। तब कंस कहता है और तुम अपने प्राण बचाकर कायरों की तरह भाग आए। अब इस अपराध का एक ही दंड है मृत्युदंड। फिर चाणूर कंस को समझता है कि इन परिस्थिति में 
मृत्युदंड देना ठीक नहीं, वर्ना सेना में विद्रोह हो जाएगा, क्योंकि शिव धनुष टूटने के बाद तो मथुरा में उन बालकों का प्रभाव और भी बड़ गया होगा।
 
कंस को चाणूर की बात समझ में आ जाती है। फिर वह कहता हैं कि हम चाहते हैं कि रंगशाला में महाराज जरासंध के सैनिकों का प्रहरा हो ताकि कृष्‍ण की हत्या के बाद जनता में विद्रोह भड़के तो उसे कुचल दिया जाए। तभी पीछे खड़े यज्ञपुरोहित सत्यक कहते हैं कि यदि कृष्ण की हत्या हो सकेगी तभी ना। यह सुनकर कंस कहता है, आप कहना क्या चाहते हैं? क्या आपको कृष्ण की हत्या में कोई संदेह है? यह सुनकर पुरोहित कहता है कि संदेह नहीं, मुझे पूर्ण विश्वास है कि कृष्ण की हत्या हो ही नहीं सकती।
 
कंस क्रोधित होकर कहता है, राज पुरोहित सत्यक तुम भी इतनी जल्दी बदल जाओगे ये हम नहीं जानते थे। कृष्ण की हत्या के लिए ये तुम्हारी ही योजना थी कि धनुष उत्सव का बहाना करके उसे मथुरा बुलाया जाए। यहां उसका वध सरलता से हो सकता है। फिर आज पासा पलट कैसे गया? सच सच बताओ कि तुम हमारे आदमी हो या शत्रु के?
 
यह सुनकर सत्यक कहता है मैं आपका ही सेवक हूं महाराज। इसलिए मैंने उस दिन ये योजना बनाई थी और आज ये कह रहा हूं कि यदि आप अपना मंगल चाहते हैं तो कृष्ण की हत्या का विचार अपने मन से निकाल दीजिये और उसके समक्ष समर्पण कर दीजिये। मैंने उस दिन कहा था कि मेरे गुरुदेव ने मुझे बताया था कि धनुषयज्ञ पूर्ण होने के पूर्व यदि धनुष टूट गया तो यजमान की मृत्यु हो जाएगी और जो उस धनुष को तोड़ेगा वो और कोई नहीं होगा स्वयं नारायण ही होगा। इसलिए आज यह निश्चित हो गया है कि ये बालक कृष्ण स्वयं नारायण ही है। तब आप तो क्या सारी सृष्टि में ऐसा कोई नहीं है जिसमें उनका वध करने की शक्ति हो। इसलिए कहता हूं अभी समय है शत्रुता छोड़कर उनकी शरण में चले जाइये। इसी में आपका कल्याण है। वह परम दयालु है आपको क्षमा कर देंगे।
 
यह सुनकर कंस और भी भयभीत हो भड़क जाता है। फिर कंस कहता है उस दिन तुम हमें अजर-अमर बना रहे थे और आज हमसे दया भी भीख मांगने का कह रहे हो। तब सत्यक कहता है कि यदि यह धनुषयज्ञ पूर्ण हो जाता तो आप अजर-अमर हो जाते परंतु आप इस धनुष की रक्षा नहीं कर सके। इसलिए अब अपने प्राणों की रक्षा कीजिये। मेरी राजभक्ति पर संदेह ना करें।
 
यह सुनकर कंस सत्यक को एक लात मारकर कहता है धिक्कार है तुम पर और तुम्हारी राजभक्ति पर। जिस कंस ने इंद्र को परास्त कर उसकी अमरावती पर अपना झंडा लहरा दिया था। तीनों लोकों में जिस कंस को कोई परास्त नहीं कर पाया। उस महाबली कंस को तुम अपने ही हाथों उसकी हार स्वीकार करने को कह रहे हो। याद रखो कंस मर सकता है, हार नहीं सकता। फिर कंस उस राजपुरोहित को भी कारागार में डालने का आदेश दे देता है।
 
उधर, 
गोकुल में ग्रामीण लोग मशाल लेकर नंदबाबा के यहां पहुंचकर उन्हें आवाज लगाते हैं। गैलरी में माता यशोदा और नंद बाबा आकर पूछते हैं क्या हुआ? एक ग्रमीण कहता है कि सुना है कि कल उत्सव की सभा में कृष्ण के प्राण संकट में है। यह सुनकर नंद और यशोदा घबरा जाते हैं। नंदबाबा पूछते हैं किसने कहा तुमसे? तब वह कहता है इस तोषक ने। इसका कहना है कि महाराज कंस ने अपने पूर्वजों का जो धनुष पूजा के लिए रखा था कृष्ण ने उसे तोड़ दिया है और कंस के बहुत से सैनिकों को भी मार डाला है। यह सुनकर दोनों घबरा जाते हैं। यशोदा मैया पूछती हैं, फिर? तब वह तोषक कहता है फिर क्या, सुना है कि महाराज कंस बहुत क्रोधित हैं। कल भरी सभा में कृष्ण की हत्या कर दी जाएगी। 
 
यशोदा मैया रोते हुए कहती हैं कि कृष्ण की भरी सभा में कृष्ण की हत्या हो जाएगी तो क्या मथुरा की जनता खड़े-खड़े तमाशा देखती रहेगी? उन्होंने तो कृष्‍ण का बड़ा स्वागत किया था। तब तोषक कहता है कि यह शहरी लोग ऐसे ही होते हैं बलिदान का समय आएगा तो घर जाकर सो जाएंगे। गोकुल वालों और मथुरा वालों में यही अंतर है। इसलिए हम आज्ञा लेने आए हैं कि आज रात हम मथुरा पहुंच जाएं और कृष्ण के अंगरक्षक बन उसके साथ-साथ घुमें। उसे अकेला ना घुमने दें। यह सुनकर यशोदा मैया कहती हैं क्या वह अकेला ही घूमता है? और वो अक्रूरजी जो बड़ी-बड़ी बातें बनाते थे कि हम कान्हा का बाल भी बांका नहीं होने देंगे, उनके आदमी कहां थे? तब तोषक कहता हैं कि वहां तो न अक्रूर थे और उनका न कोई साथी देखा मैंने। यह सुनकर यशोदा मैया कहती हैं इसका अर्थ ये है कि वो सब अक्रूरजी की एक चाल थी, ताकि मैं अपने कान्हा को उनके साथ भेज दूं। मुझे तो संदेह है कहीं वो कंस से तो नहीं मिले हुए हैं? फिर सभी ग्वालें और नंदबाबा श्रीकृष्‍ण की रक्षा के लिए निकल पड़ते हैं।
 
उधर, कारागार में तीन सैनिक देवकी और वसुदेवजी को बताता है कि अभी-अभी सूचना मिली है कि आपके पुत्र कृष्ण ने रंगशाला में रखे शिवधनुष को तोड़ दिया है। यह सुनकर देवकी और वसुदेव प्रसन्न हो जाते हैं। देवकी कहती है शिव धनुष को तोड़ दिया? सैनिक कहता है, हां और उसकी रक्षा में जितने भी सैनिक थे उन सबका भी उन्होंने संहार कर दिया है। सारे नगर में कृष्ण की जय-जयकार हो रही है। सबको विश्वास हो गया है कि यही हमारा तारणहार है। जिसकी सबको प्रतीक्षा थी वो आ गया है।
 
यह सुनकर वसुदेवजी प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन देवकी घबराकर पूछती है इस बात का महाराज को पता चला? सैनिक कहता है कि अवश्य पता चला होगा। परंतु आप चिंता मत करो। अब महाराज कुछ नहीं कर सकते। सारी जनता कृष्ण के साथ है। महाराज ने यदि उन्हें हाथ भी लगाया तो सारे नगर में बलवा हो जाएगा। मैया हम आपसे क्षमा मांगने आए हैं अब तक हम कंस की आज्ञा का पालन करने के लिए विवश थे। 
 
तभी वहां सुरक्षा प्रधान अन्य सैनिकों के साथ आ धमकता है और वह उन तीनों सैनिकों को राजद्रोह के आरोप में काल कोठरी में बंद करने का आदेश दे देता है। वह भी वहां से चला जाता है।
 
उधर, चाणूर, कवंलियापीड़ नामक हाथी को मदिरापान करवाता है। फिर चाणूर पहलवानों को देखने के लिए अखाड़े में जाता है। कई पहलवान वर्जिस कर रहे होते हैं। चाणूर कहता है बस एक रात और उसे चैन से सो लेने दो।
 
दूसरी ओर श्रीकृष्ण अतिथिगृह में अपने पलंग पर बढ़े चैन से सोये रहते हैं। गर्ग मुनि अपनी योग शक्ति से कृष्ण के पास पहुंचकर उन्हें प्रणाम करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं महर्षि मर्यादा अनुसार तो ये मेरा कर्तव्य था कि गुरु चरणों में प्रणाम करने के लिए मैं स्वयं आपके आश्रम आता। परंतु आपने स्वयं पधारकर मुझे इस सेवा से वंचित कर दिया। तब गर्ग मुनि कहते हैं क्षमा करें प्रभु, मैं अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकता था। आपके श्री चरण मथुरा में पधारे और मैं अपने आश्रम में बैठा हुआ प्रतीक्षा करता रहूं। यह मर्यादा बाहरी जगत की होगी। परंतु एक भक्त का हृदय इस मर्यादा को नहीं मानता। एक दिन की प्रतीक्षा भी मैं नहीं कर पाया। फिर गर्ग मुनि उनके चरणों की वंदना करते हैं। 
 
उधर, कंस को सपना आता है कि वह गधे पर बैठा है और राक्षसों ने उसे मारने के लिए घेर रखा है। तलवार लहराते हुए राक्षस उसे डरा रहे हैं। दो राक्षस उसे खून से नहला देते हैं। फिर वह खुद को सिंहासन पर बैठा हुआ पाता है। एक राक्षस आकर उसकी गर्दन काट देता है। तभी कंस की नींद खुल जाती है। जय श्रीकृष्ण।
 
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 

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