भारत में खेलों में करियर बनाना आज भी मुश्किल : दीपांकर भट्‍टाचार्य

चीन में आप खेलों में करियर बना सकते हैं लेकिन भारत में ऐसा वातावरण नहीं है। यहां खेलों में करियर बनाना बहुत मुश्किल है। मैंने संघर्ष को बहुत करीब से देखा है। मेरे माता-पिता का सपना कुछ और था और मैं बन कुछ और गया, लेकिन मैं अपने 12 साल के बच्चे को बैडमिंटन का पैशन होने के बावजूद अपने जैसा कभी नहीं बनाना चाहूंगा। मैं चाहूंगा कि वह खेले जरूर लेकिन साथ ही वह अच्छी शिक्षा भी ग्रहण करे ताकि अपना भविष्य संवार सके। यह बात दो बार के ओलंपियन और तीन बार के राष्ट्रीय चैम्पियन दीपांकर भट्‍टाचार्य ने 'वेबदुनिया' को दी एक विशेष मुलाकात में कही। 
44 साल के दीपांकर भट्‍टाचार्य इंडियन ऑयल की रीजनल स्पोर्ट्‍स मीट के सिलसिले में अभय प्रशाल में आए हुए हैं। वे मुंबई में इंडियन ऑयल पश्चिम जोन बांद्रा कुर्ला कॉम्पलेक्स (बीकेसी) में एडमिनेस्ट्रेशन, वेलफेयर और स्पोर्ट्‍स के मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। 1993 में खेल कोटे के तहत ही उनकी नियुक्ति हुई थी। उनका मानना है कि खिलाड़ी इंडियन ऑयल की तरफ इसलिए आकर्षित होते हैं क्योंकि उन्हें ऊंचा वेतन मिलता है। 
 
रियो ओलंपिक की बैडमिंटन रजत पदक विजेता पीवी सिंधु के कोच पुलेला गोपीचंद को 1996 में हराकर राष्ट्रीय विजेता बने दीपांकर ने बताया कि मेरा जन्म गुवाहाटी में हुआ। बचपन में मैं बहुत चंचल प्रवृत्ति का था। मेरे पिता ईश्वर भट्‍टाचार्य और मां आरती जी ने यह सोचकर मेरे हाथों में बैडमिंटन का रैकेट थमा दिया ताकि मेरी ऊर्जा का सही जगह सदुपयोग किया जा सके। तब मेरी उम्र केवल 5 बरस थी। घर के पास पिताजी ने बैडमिंटन का कोर्ट बना दिया और ऑफिस से आने के बाद वे मेरे साथ बैडमिंटन खेलते। 
 
जब पिताजी को मुझमें प्रतिभा दिखी, तब वे मुझे गुवाहाटी के नेहरू स्टेडियम (अब कालाजंगा स्टेडियम) ले जाने लगे। वहां पर 2 बैडमिंटन कोर्ट थे और 4 टेबल टेनिस की टेबलें लगी होती थीं। जब मैं बैडमिंटन खेला करता था, तब मोनालिसा बरुआ भी टेबल टेनिस खेला करती थीं। 7 साल की उम्र में मैंने प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबले खेलने शुरू कर दिए थे। मैंने 1983 में गुवाहाटी में सब जूनियर (अंडर 15) की राष्ट्रीय स्पर्धा में पहली बार हिस्सा लिया और एकल में उपविजेता तथा युगल में राष्ट्रीय चैम्पियन बना। 
 
1985 में जूनियर नेशनल में चौथा स्थान पाया जबकि 1987 में जूनियर राष्ट्रीय बैडमिंटन विजेता बना। 1988 से मैं जूनियर वर्ग की अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाएं खेलने लगा। जकार्ता के बाद रूस में आयोजित जूनियर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में मैंने भारत के लिए रजत पदक जीता। 1988 तक जूनियर खेलने के बाद सीनियर में आने के लिए मुझे कड़ा संघर्ष करना पड़ा। मैं भारतीय टीम के शिविरों में शामिल होता रहा और संभावितों में भी जगह बनाई, लेकिन सीने पर भारत की जर्सी नहीं पहन सका। 
 
1990 में मैंने ब्रेक लिया और गुवाहाटी में सालभर तक कड़ा अभ्यास किया। मैंने 1991 में हैदराबाद नेशनल खेला और राजीव बग्गा से क्वार्टर फाइनल में हार गया लेकिन वहां पर मैच देखने के लिए राष्ट्रीय चयनकर्ता प्रकाश पादुकोण भी मौजूद थे जो काफी प्रभावित हुए। इस तरह मुझे एशियन बैडमिंटन चैम्पियनशिप के लिए पहली बार भारतीय टीम में चुना गया। 
 
ब्रेक के बाद 1991 में पहला नेशनल हैदराबाद में खेला और क्वार्टर फाइनल तक पहुंचा, बेंगलुरु में सेमीफाइनल में हारा लेकिन गोवा में हैदराबाद के नेशनल चैम्पियन जॉर्ज थॉमस को फाइनल में हराया। इसके बाद 1991 में भारत में जितने भी रैंकिंग टूर्नामेंट हुए, मैं उन सभी में चैम्पियन बना। यही नहीं, मुझे देश में नंबर वन की रैंकिंग भी मिली। मैं 1991 से 1996 तक देश का नंबर एक पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी रहा। 
 
मैं सीनियर वर्ग में तीन साल 1994 से 1996 तक राष्ट्रीय विजेता बना रहा। 1994 में मैंने राजीव बग्गा को हराकर फाइनल में पहुंचने वाले सुशांत सक्सेना को, 1995 में राजीव बग्गा को और 1996 में गोपीचंद को हराकर नेशनल चैम्पियन बना। 1997 के नेशनल में गोपीचंद ने मुझे फाइनल में हराया और 1998 में भी गोपीचंद के हाथों ही मैं सीनियर नेशनल का फाइनल हारा। 
 
1998 के आते-आते मेरा पूरा शरीर इंजुरी से जूझ रहा था। पीठ दर्द, घुटने का दर्द और एड़ी के दर्द के कारण मुझे संन्यास लेने पर मजबूर होना पड़ा। मेरे वक्त देश में आज के जैसी न तो आधुनिक फिजियोथैरेपी की व्यवस्था थी और न ही स्पोर्ट्‍स मेडिसिन उपलब्ध थी। यही कारण है कि मुझे इंजुरी से मजबूर होकर मात्र 26 साल की उम्र में रैकेट खूंटी पर टांगने पर मजबूर होना पड़ा। आज चाहे पीवी सिंधु हों या फिर साइना नेहवाल, इन लोगों को आधुनिक तरीके से फिजियोथैरेपी मिल रही है, जिसके कारण वे इस उम्र में भी कोर्ट पर शानदार प्रदर्शन कर रहीं हैं।
 
मैं देश की तरफ से दो ओलंपिक भी खेला हूं। 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक के प्री क्वार्टर फाइनल में चीन के झाओ जियान हुआ (तब विश्व चैम्यिन और नंबर एक खिलाड़ी) से हारा जबकि 1998 के अटलांटा ओलंपिक में दूसरे राउंड में हरियंतो से हार गया। मुझे कम उम्र में संन्यास लेने का अफसोस जरूर है, लेकिन मेरे अलावा भी देश के अच्छे खिलाड़ी थे, जिन्हें इंजुरी के कारण खेल छोड़ना पड़ा। 
 
मैंने खेल को अलविदा कहने के बाद गुवाहाटी में 2005 में दो साल तक बैडमिंटन अकादमी भी चलाना चाही लेकिन यह बात जल्दी ही पता चल गई कि नौकरी करते हुए आप अकादमी नहीं चला सकते क्योंकि तब मैं रिटेल में आ गया था। इंडियन ऑयल की यह नीति है कि जब खिलाड़ी के रूप में आप खेलते रहते हैं, तब पूरी तरह आजाद होते हैं लेकिन संन्यास के बाद आपको फुल टाइम नौकरी करनी होती है। 
 
गुवाहाटी से मेरा तबादला दुर्गापुर हो गया था और वहां पर खेल की सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए मैंने पढ़ाई करने का निर्णय लिया। मैंने मुंबई के एसपी जैन इंस्टीट्‍यूट ऑफ मैनेजमेंट से एमबीए किया। बाद में मेरा तबादला भी मुंबई हो गया। रियो ओलंपिक के बाद देश में चर्चा चल पड़ी है कि पूर्व खिलाड़ियों का सदुपयोग किया जाना चाहिए। पुलेला गोपीचंद भी इंडियन ऑयल से जुड़े हैं और हैदराबाद में 300 खिलाड़ियों की अकादमी चला रहे हैं। इसी तरह की अकादमी नवीं मुंबई में भी खोली जाए तो मैं नए बच्चों को खेल के गुर सिखा सकता हूं। सात बार की चैम्पियन मंजूषा कवर भी इंडियन ऑइल में हैं, वे यह काम दिल्ली में कर सकती हैं। अपर्णा पोपट भी इंडियन ऑइल में थीं, लेकिन उन्होंने अब अकादमी की स्थापना कर ली है। 
 
रियो ओलंपिक में इंडियन ऑयल के के. श्रीकांत ने शानदार प्रदर्शन किया और आज वे दुनिया के श्रेष्ठ पांच खिलाड़ियों में हैं। उनके अलावा पारुपल्ली कश्यप, गुरु सांईदत्त, अपर्णा बालन भी विभाग के साथ ही देश के बैडमिंटन को आगे ले जाने में जुटे हुए हैं। मेरा यह मानना है कि हर खिलाड़ी का सपना होता है कि खेल छोड़ने के बाद वह खेल से जुड़ा रहे, ताकि जीवन में जो कुछ उसने अर्जित किया है, वह अगली पीढ़ी तक पहुंचा सके। हमारे विभाग को भी चाहिए कि वह अन्य खेलों के चैम्यियनों की सेवाएं ले, जिससे देश का भला होगा और नए खिलाड़ी भी आगे आएंगे... 

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