Publish Date: Sun, 12 Aug 2007 (14:04 IST)
Updated Date: Sun, 12 Aug 2007 (14:04 IST)
देश को ढेरों अन्तरराष्ट्रीय पहलवान दे चुके महाबली सतपाल द्रोणाचार्य पुरस्कारों के लिए अपनी उपेक्षा किए जाने से आहत और नाराज हैं।
वर्ष 1982 में दिल्ली एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले और राजधानी के छत्रसाल स्टेडियम में वर्षों से अन्तरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान तैयार कर रहे सतपाल को इस बात का गहरा अफसोस है कि अपना सब कुछ कुश्ती के लिए झोंक देने के बावजूद उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए योग्य नहीं समझा गया।
उन्होंने कहा कि मैंने अपना सब कुछ कुश्ती के लिए लगा दिया है। मैं सुबह चार बजे छत्रसाल स्टेडियम पहुंचकर पहलवानों को ट्रेनिंग देता हूँ, उन्हें दांव-पेंच सिखाता हूँ। मेरे शिष्य अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं जिनमें ओलंपियन सुशील और योगेश्वर दत्त शामिल हैं।
लेकिन मुझे इस बात का गहरा दुख है कि चयन समिति ने मेरा नाम खारिज कर दिया। वर्ष 2006 के द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए सतपाल के साथ-साथ उनके गुरु भाई जगमिंदर का नाम भी दौड़ में शामिल था, लेकिन 2006 के द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए आरडी सिंह (एथलेटिक्स), (पैरालम्पिक गेम्स), दामोदरन चन्द्रलाल (मुक्केबाजी) और कोनेर अशोक (शतरंज) को चुना गया।
सतपाल ने कहा कि जहाँ तक मुझे पता लगा है, उसके अनुसार लोगों को मेरे प्रशासनिक अधिकारी होने पर ऐतराज था। मैं दिल्ली सरकार में उप शिक्षा निदेशक (खेल) पद पर हूँ लेकिन क्या इसी बात से कुश्ती के प्रति मेरी निष्ठा पर सवाल उठाया जाए। यदि मुझे द्रोणाचार्य पुरस्कार से वंचित करने के लिए यही कारण है तो इस बात पर मुझे वाकई गहरा अफसोस है।
उन्होंने कहा कि उनसे पहले मास्टर चंदगीराम और कैप्टन चांदरुप का दावा बार-बार खारिज किया गया था जबकि वे द्रोणाचार्य पाने के हकदार थे। उन्होंने कहा कि इसके कारण चंदगीराम और चांदरुप का कुश्ती से काफी मोह भंग हुआ।
सतपाल ने सवाल उठाया कि मात्र एक खिलाड़ी तैयार करने वाले व्यक्ति को द्रोणाचार्य पुरस्कार दे दिया जाता है, मगर ढेरों पहलवान तैयार करने वाले व्यक्ति की उपेक्षा की जाती है।
सतपाल ने कहा मेरे शिष्य आज देश में सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं खुद कुश्ती के लिए पूरी तरह समर्पित हूँ, लेकिन द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए नजरअंदाज किए जाने का मुझे गहरा दु:ख है।