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5 सितंबर स्पेशल स्टोरी : शिक्षक दिवस पर पढ़ें, गुरु शिष्य की प्रेरक कहानी

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एक बार कि बात है, एक गुरू अपने कुछ शिष्यों के साथ पैदल ही यात्रा पर थे। वे चलते-चलते किसी गांव में पहुंच गए। ये गांव काफी बड़ा था, वहां घूमते हुए उन्हें काफी देर हो गयी थी। गुरू जी थक चुके थे और उन्हें बहुत प्यास लगी थी, तो उन्होनें अपने एक शिष्य से कहा कि हम इसी गांव में कुछ देर रूकते हैं, तुम मेरे लिए पानी ले आओ। जब शिष्य गांव के अंदर थोड़ा घुमा तो उसने देखा कि वहां एक नदी थी, जिसमें कई लोग कपड़े धो रहे थे, तो कई लोग नहा रहे थे और इसी वजह से नदी का पानी बहुत ही गंदा सा दिख रहा था।
 
शिष्य को लगा कि ऐसा गंदा पानी गुरू जी के स्वास्थ्य को खराब कर सकता है, उन्हें ये पानी नहीं पिलाया जा सकता। इसलिए शिष्य बिना पानी लिए ही वापस लौट आया और नदी के गंदे पानी की सारी बात गुरू जी को बता दी। इसके बाद गुरू जी ने किसी दूसरे शिष्य को पानी लाने के लिए भेजा। कुछ देर बाद वह शिष्य पानी साथ लेकर लौटा।
 
गुरू जी ने इस दूसरे शिष्य से पूछा कि नदी का पानी तो गंदा था फिर तुम ये पानी कैसे लाए? शिष्य बोला की गुरू जी, नदी का पानी वास्तव में बहुत ही गंदा था। लेकिन लोगों के नदी से चले जाने के बाद मैंने कुछ देर इंतजार किया और कुछ देर बाद नदी में मिट्टी नीचे बैठ गई और साफ पानी ऊपर आ गया। उसके बाद मैं उसी नदी से आपके लिए पानी भरकर ले आया।
 
गुरू जी, ये सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा जीवन भी इसी नदी के पानी की तरह है। जीवन में कई बार दुख और समस्याएं आती है तो जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है। लेकिन थोड़े इंतजार और सब्र के बाद ये सतही दुख और समस्याएं नीचे दब जाती है और अच्छा समय ऊपर आ जाता है।
 
कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह दुख और समस्याओं को देख कर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट आते हैं। ऐसे लोग जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते वहीं दूसरी ओर कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं, इंतजार करते है कि कुछ समय बाद गंदगी रूपी समस्याएं और दुख खत्म हो जाएंगे, वे ही सफल होते है।
 
 

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