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एमटीवी और बिंदास का युवा...

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एम टीवी
हमने जो इधर रोका है, वो उधर बह रहा है। एम टीवी, चैनल वी, बिंदास... इन चैनलों के कार्यक्रमों पर कभी आपका ध्यान गया है? इन सारे चैनलों के लगभग निन्यानवे प्रतिशत कार्यक्रम सेक्स और लड़का-लड़की के संबंधों पर हैं। चाहे "स्प्लिट्सविला" हो, चाहे "इमोशनल अत्याचार" हो, चाहे "एंडी सेज" हो। इस पर मुँह बिचकाया जा सकता है। यह कहा जा सकता है कि ऐसे कार्यक्रम बच्चों को बिगाड़ रहे हैं वगैरह-वगैरह। मगर इससे ये हकीकत नहीं बदलती कि इन कार्यक्रमों को किशोरों से लेकर युवा तक बहुत ध्यान से देखते हैं।

दरअसल एक सीमा रेखा है। शादी के इस पार और उस पार वाली। जिनकी शादी हो चुकी है, उनमें से लड़के तो काम-धंधे से लग जाते हैं और लड़कियाँ सास-बहू टाइप के कार्यक्रमों में खो जाती हैं, मगर एक दूसरा वर्ग है, जो अभी शादी से दूर है और अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीना चाहता है। ये वर्ग देखता है बिंदास के कार्यक्रम, चैनल वी और एमटीवी।

नैतिकता और संस्कार के नाम पर हमने अपने युवाओं को चूँकि एक-दूसरे से छेटी रखा है, सो इस तरह के कार्यक्रमों का पूरा जोर उन्हें मिलाने पर रहता है। फिर जब वे मिलते हैं तो कुदरत अपना खेल खेलती है। वही इस तरह के शो की यूएसपी होती है।

चैनल वी पर एक कार्यक्रम "एंडी सेज" है। इसमें शो वाले ब्लाइंड डेट का इंतजाम करते हैं। यानी एक-दूसरे से बिलकुल अनजान लड़का-लड़की को आपस में मिलाना। फिर उनकी प्रतिक्रियाएँ जानना।

इसी शो का एक वर्जन "प्यार और परिवार" भी है। यानी परिवार की इच्छा से लड़के-लड़की को आपस में मिलाना। दोनों की खूब बातें कराना। उन्हें ऐसा माहौल देना कि वे खुल सकें। एक लड़की पहली मुलाकात पर लड़के को भेंट में एक टी शर्ट देती है जिस पर लिखा है - यूज़ कंडोम।

यह पहली बार है जब इन चैनलों के माध्यम से हमें यह मालूम पड़ रहा है कि हमारे बेशतर युवाओं के लिए जीवन की सबसे बड़ी जरूरत क्या है। करियर नहीं बल्कि विपरीत लिंगियों से सहज-सरल और जिम्मेदारीमुक्त संबंध।

इससे पहले की पीढ़ियाँ अपने आपको कभी इस तरह अभिव्यक्त नहीं कर सकीं। उनकी शारीरिक ज़रूरतों पर कभी बहुत बात नहीं होती थी। अब भी नहीं होती। उन पर निगरानी रखी जाती थी, उन्हें अच्छे करियर के लिए तैयार किया जाता था और फिर उनकी शादी कर दी जाती थी।

यदि किसी लड़के या लड़की ने शादी से पहले किसी विपरीत लिंगी से दोस्ती करने की जुर्रत की, तो उसकी बदनामी एक बुरे आवारा लड़के या लड़की के रूप में हो जाया करती थी।

अब माहौल बदल रहा है। अब विवाह को लड़का और लड़की बहुत अंत में मन मारकर कबूल करते हैं। अगर किसी युवा से पूछा जाए तो शादी के बंधन में वो तब बँधना चाहेगा, जब खुले खेलने की उसकी संभावनाएँ समाप्त होती हों।

विज्ञान की खोजें अजीब होती हैं। ये जीवन पर ऐसे अनपेक्षित प्रभाव डालती हैं जिनकी अपेक्षा ही हम नहीं कर सकते। इसी टीवी और वीडियो कैमरे को लीजिए। क्या पता था कि मनोरंजन के लिए आई चीज जीवन में इतना बदलाव भी कर डालेगी।

बहरहाल इन चैनलों का शुक्रिया कि इन्होंने युवाओं की जरूरतों को हमारे सामने एकदम बिंदास तरीके से रख दिया है। अब ये हम पर निर्भर है कि हम इसे किस तरह लेते हैं। हम समझदारी भी दिखा सकते हैं, वरना पाखंड तो सदियों से कर ही रहे हैं।

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