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ऐसी रही सच (का सामना) की बिदाई

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सच का सामना
टीवी शो "सच का सामना" अंततः बंद हो गया। अभिनेत्री रूपा गांगुली इसकी अंतिम मेहमान रहीं। सवाल ये है कि ये कार्यक्रम बंद क्यों हो रहा है? घटिया-घटिया प्रोग्राम खिंचते जा रहे हैं, जैसे कोई बूढ़ा नब्बे के बाद भी जी रहा हो, इधर ये कार्यक्रम बंद हो रहा है मानो कोई भरी जवानी में चल बसे। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हम लोग सच को हजम करने की ताकत नहीं रखते। हमारी सबसे पवित्र कहलाने वाली विवाह संस्था ढेर होती जा रही है। उसमें कीड़े बिलबिला रहे हैं, उससे सड़ांध के भभके निकल रहे हैं, पर हम उन घावों को देखना नहीं चाहते।

इस टीवी शो को बंद कराने की कई कोशिशें हुईं। मुकदमे लगाए गए, कहा गया कि इससे हमारी संस्कृति का विनाश...। अदालत ने इस शो को बंद करने से इंकार कर दिया। मगर चैनल पर दबाव कितना तगड़ा था, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि पहले शो का टाइम बदला गया। रात ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे तक कौन जाग सकता है? जाहिर है इस कारण बहुत से दर्शकों का साथ छूट गया था। बाद में इसे पूरी तरह बंद करने का फैसला लिया गया।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौन से तत्वों ने चैनल पर दबाव डाला। इसके खिलाफ जो लोग तर्क करते हैं वे कहते हैं कि सच कहने के नाम पर क्या यही सब रह गया है? मगर सच तो सच है।

मुर्दे को श्मशान ले जाते हुए हम कहते हैं - राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत्य है। गत्य से मायने गति के हैं। मुराद आध्यात्मिक गति से है। झूठ बोलने वाले का आध्यात्मिक विकास रुक जाता है। मोक्ष प्राप्ति के रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन है झूठ। हम भारतीयों में से अधिकतम जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति को मानते हैं। इतना आध्यात्मिक देश और सच से ऐसा डर! सच से इतना डरने वाला समाज साहसी नहीं हो सकता।

हमारे यहाँ एक हुए सत्यकाम जाबाल, जिनके नाम से जबलपुर बसा है। सत्यकाम वेश्या के पुत्र थे। अध्यात्म में रुचि थी। गुरु के पास गए तो गुरु ने पूछा किसके बेटे हो। उन्होंने कहा जाबालि नामक गणिका का। गुरु खुश हुए और कहा कि इतनी हिम्मत से सच बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा। वो हमारा स्वर्णकाल था। जब हम विश्वगुरु थे, तब हम सच बोलते थे। अब हम सच बोलने वाले की जबान पकड़ लेते हैं और आवाज दबा देते हैं।

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