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काठ की हांडी

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- अनहद

अगर कोई पूछे कि एकता कपूर के ककारवादी टीवी धारावाहिकों ने समाज को क्या दिया तो जवाब होगा अपने जैसी बहुत सारी महिलाएँ, जो सिर्फ पैसा कमाने में ही उनकी बराबरी नहीं करतीं, वरन और हर मामले में वो उनके जैसी हैं।

एकता कपूर के धारावाहिकों का असर था कि भारतीय महिलाओं के समाज में खलनायिकाओं का महिमा मंडन हुआ कितनी ही महिलाओं ने कोमोलिका और रमोला सिकंद की तरह बिंदी लगाई, साड़ियाँ पहनीं, गहने लादे और ज़ाहिर है दूसरे कामों में भी नकल की।

धारावाहिकों की यह खलनायिकाएँ अपने ढेर सारे क्लोन समाज को दे गईं। बहरहाल हम बात "क्योंकि सास भी कभी बहू थी" की कर रहे हैं। इस सीरियल की टीआरपी शानदार थी और बरसों शानदार बनी रही। मध्यमवर्गीय घरों में जहाँ शादीशुदा महिलाओं का सबसे बड़ा और परंपरागत कल्चर इवेंट कलह, जलन और झगड़े हैं, ये सीरियल टेक्स्ट बुक की तरह लिया जाता था।

यह भी मजेदार है कि लगभग हर बहू जवानी में अपनी सास के साथ जो कुछ करती है, चाहती है उसकी अपनी बहू ऐसा कुछ न करे। सास बनने के बाद हर औरत अपनी बहू के साथ लगभग वही सब कुछ (चाहे अंदाज बदलकर) करती है, जो उसके साथ उसकी सास ने किया था। तो इस सीरियल से ज्यादातर महिलाओं ने तुलसी के त्याग की अपेक्षा दूसरी महिला रिश्तेदारों से की और खुद वो किया, जो खलनायिकाएँ करती दिखीं।

मुख्तसर में कहें तो एकता कपूर के धारावाहिकों ने समाज को गंदा किया और कर रहे हैं। शुक्र है कि एक सीरियल बंद होने जा रहा है। सवाल ये है कि क्या एकता कपूर को फिर ऐसी सफलता मिल पाएगी? वैसे भी काठ की हांडी बार-बार आग पर नहीं चढ़ती। (नईदुनिया)

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