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टीवी पर घिनौनेपन के दौर का उतार

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खतरों के खिलाड़ी
एक ही चीज बार-बार कोई क्यों देखेगा? फिर ये चीजें ऐसी भी नहीं कि बार-बार देखी जाएँ। आजकल बहुत से टीवी कार्यक्रम लगभग एक जैसे होने लगे हैं। इन्हें देख लगता है आप चंद दिनों पहले आए किसी सीरियल की कॉपी देख रहे हैं जिसमें थोड़ी अदला-बदली कर दी गई है।

"इस जंगल से मुझे बचाओ" के बाद "खतरों के खिलाड़ी - लेवल 2" आ गया है। लेकिन इसमें भी वही सब कुछ नजर आया जो लोग "इस जंगल से मुझे बचाओ" में देख चुके हैं। वही स्टंट, वही घिनौने काम।

रात नौ बजे आने वाला ये शो कई लोग खाना खाते हुए भी देख रहे थे। जब केंचुओं को मुँह में लेकर अपनी साथिन के सिर पर डालने वाली स्पर्धा हुई तो बहुत से लोग थाली लेकर दूसरे कमरों में भागे। बहुतों ने हाथ धो लिए और बहुतों ने चैनल बदल लिया। ऐसे में सवाल यही पैदा होता है कि मनोरंजन के लिए कुछ भला-सा नहीं किया जा सकता?

देखा जाए तो यह शो भी अन्य की तरह मसालों का घालमेल ही है। लड़कियाँ हैं और ये कम कपड़े पहनकर स्टंट करती हैं। टीवी पर स्टंट देखने वाले पुरुषों को शायद ही इससे मतलब रहता हो कि लड़की ने कितना खतरनाक काम किया है, वो तो यह देखते हैं कि लड़की ने क्या (नहीं) पहना है। महिलाएँ इसलिए देख लेंगी कि "च,च,च" कर सकें।

पहले एपिसोड में अक्षय कुमार ने सब लड़कियों को मंत्र उच्चारित कराया। वे खुद भी हर स्टंट से पहले इसे उच्चारते हैं। उनका विश्वास है कि ये संकट से बचाता है। हालाँकि इसके बावजूद एक पहलवान लड़की की ठोड़ी कट गई और आधा दर्जन टाँके आए। हाथों में छाले और खून तो कई लड़कियों के आया।

ग्लैमर की पुतलियाँ जब आँख बंद करके मंत्र उच्चारती हैं तो सारी आधुनिकता धुल जाती है। अब अक्षय कुमार मंत्र बाँच रहे हैं तो सबकी मजबूरी है, फिर चाहे यकीन हो, या न हो। केंचुओं को मुँह से उठाना और मंत्र बोलना! अजीब कॉम्बिनेशन है ना?

मगर हम फिर मूल सवाल पर लौटते हैं कि इसे कोई क्यों देखेगा जबकि अभी ही इस तरह का एक कार्यक्रम होकर हटा है। उसमें भी यही सब था, थोड़े-से साहसिक खेल और ढेर सारी घिनौनी चीजें... कीड़े खाना, कीड़े पीना, चूहे खाना...। क्या टीवी देखने वाले दर्शक दिमागी रूप से इतने दिवालिया हो गए हैं, जो इस तरह के शो में मनोरंजन तलाशते हैं?

खुशी की बात यह है कि इस तरह के पिछले कार्यक्रम की भी टीआरपी बहुत ज्यादा नहीं थी। टीवी पर ये समय अजीब से खालीपन का समय है। सास-बहू के धारावाहिकों का दम निकल गया है। इस तरह के घिनौने शो भी लोग नहीं देख रहे हैं। गरीब और गाँव की महिलाओं को केंद्र में रखकर तैयार किए गए धारावाहिकों की बाढ़-सी आने के बाद इस तरफ भी दौर उतार का है।

क्या फिर से सार्थक टीवी कार्यक्रमों का दौर आने वाला है? क्या कहीं "हम लोग", "तमस", "नुक्कड़", "मिर्जा गालिब", "कबीर" और "भारत एक खोज" जैसे सीरियल तैयार हो रहे हैं? शायद...।

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