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टीवी पर सेंसर!

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- अनहद

सवाल फिर यही है कि सेंसर होना चाहिए या नहीं? पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने टीवी कार्यक्रमों को लेकर नाराजगी दिखाई थी और आदेश दिया था कि कार्यक्रमों पर अंकुश होना चाहिए, इसके बाद इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन कुछ ऐसा करने जा रहा है, जिससे टीवी के कार्यक्रम दो हिस्सों में बँट जाएँगे। सुबह छः से रात दस तक कथित अच्छे कार्यक्रम और रात दस से सुबह छः तक वो कार्यक्रम, जिनसे बच्चों के बिगड़ने की आशंका हो। याद रहे दूरदर्शन भी रात दस बजे बाद वयस्क फिल्में दिखाया करता था। मगर सवाल फिर यही है कि क्या ऐसी कोई बंदिश होना चाहिए या आत्मानुशासन पर यकीन करना चाहिए?

कई फिल्मवाले तो अब सेंसर पर ही सवाल उठाने लगे हैं। उनका कहना है कि जब टीवी पर इतना कुछ बिना सेंसर के दिखाया जाता है, तो फिर हम ही पर रोक क्यों? दूसरी तरफ इंटरनेट है, जो वह सब बच्चों को दिखा सकता है, जो नहीं दिखाना चाहिए और बुरी बात तो यह कि बच्चे देख भी रहे हैं। नए मोबाइल फोन ऐसे हैं, जिन पर पूरी फिल्में देखी जा सकती हैं। इस पीढ़ी के पास जितनी पोर्न फिल्में हैं, जितना अश्लील मसाला है, वो दुनिया में किसी पीढ़ी के पास नहीं था।

वर्जनाएँ अपनी जगह पर कायम हैं और वर्जनाओं को पलीता लगाने वाला सामान जगह-जगह बिखरा पड़ा है। मगर फिर भी कहीं न कहीं हम सेंसर की ज़रूरत महसूस तो करते हैं। कोशिश होती है कि हम बच्चों की मासूमियत को जितना बचा सकें, बचा लें, वरना मासूमियत को आजकल बहुत जल्दी मार दिया जाता है। आज का कोई बच्चा उतना बच्चा नहीं है, जितना उसे समझा जाता है।

चलिए अश्लील कार्यक्रम तो फिर भी रुक जाएँगे, पर ऐसे कार्यक्रमों का क्या होगा, जो किसी और वजह से दिन में तो क्या रात में भी नहीं दिखाए जाने चाहिए। कुछ चैनल तो दिन-रात भूत-प्रेत के पीछे पड़े रहते हैं। तरह-तरह के अंधविश्वास चैनलों पर दिखाए जाते हैं। कुछ चैनलों पर रुद्राक्ष के विज्ञापन, श्रीयंत्र का महात्म्य, वास्तुदोष दूर करने की चीजें बेची जाती हैं।

इन चैनलों को देखकर पुराने वक्त की लुगदी पत्रिकाएँ याद आती हैं, जिनमें चमत्कारी अँगूठी, सिद्ध यंत्र और ऐसे ही ठगी के विज्ञापन होते थे। दरअसल टीवी हमारे यहाँ एक नया माध्यम है। इस माध्यम को हमने अपना लिया है, पर अभी बहुत सारी चीजों का तय होना बाकी है। शायद इस माध्यम को भी सेंसर की जरूरत है। पर सवाल ये है कि तीन घंटे की फिल्म को सेंसर से पास करने की प्रक्रिया इतनी लंबी है, तो चौबीस घंटे के पचासों चैनल को कैसे काबू में रखा जाएगा? फिर भ्रष्टाचार कहाँ नहीं है? यह उलझा हुआ मामला है और बहुत आसानी से इसके जवाब नहीं ढूँढे जा सकते। पर हाँ इतना है कि जिस तरह शरीफ लोगों के यहाँ लुगदी साहित्य नहीं पढ़ा जाता उसी तरह भले घरों में ऐसे चैनल भी नहीं देखे जाते जो अंधविश्वास को बढ़ावा देते हों, लाउड हों और गड़बड़ विचार पेश करते हों। यहाँ तक कि समाचार चैनल देखने वाले अब विश्वसनीयता को तरजीह देते हैं। एनडीटीवी इंडिया की टीआरपी इन दिनों आज तक से ज़्यादा है और रजत शर्मा के इंडिया टीवी की तो बच्चे भी हँसी उड़ाते हैं।

(नईदुनिया)


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