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मैच देखते हैं या विज्ञापन?

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टीवी
पहले ये होता था कि मैच घर पर देखो या मैदान में कोई फर्क नहीं पड़ता था। मगर अब फर्क पड़ता है। घर पर आप क्रिकेट कम और विज्ञापन अधिक देखते हैं। क्रिकेट जिस शाही अंदाज से खेला जाता है, उसमें विज्ञापन की बहुत गुंजाइश होती है।

एक गेंद फेंकी जाती है, फिर वो गेंद घिसकर, चमकाकर वापस गेंदबाज की तरफ उछाली जाती है। फिर गेंदबाज गेंद को फाइनल टच देता है, चूमते-चमकाते हुए रनअप मार्क की तरफ जाता है। फिर वहाँ से दौड़ना शुरू करता है। इस गेंद पर कोई घटना घटी... यानी चौका-छक्का लगा या विकेट गिरा तो ठीक वरना गेंद गई विकेकीपर के दस्ताने में और फिर वही गेंद का घिसना जारी रहता है।

क्रिकेट में असली "एक्शन मूमेंट" कम हैं। सो इसी का फायदा बाजार उठाता रहता है। पहले दो ओवर के बीच में विज्ञापन आते थे, अब एक-दो गेंदों के बीच में भी विज्ञापन आ रहा है।

"स्ट्रेटेजी टाइम आउट" की कोई जरूरत क्रिकेट में नहीं होती। टीम की रणनीति सोचने के लिए कप्तान और मुख्य खिलाड़ियों को पद्मासन लगाकर ध्यान में नहीं बैठना पड़ता। कोई भी अच्छा कप्तान हर समय, हर पल सोचता रहता है। क्रिकेट दरअसल मैदान में खेली जाने वाली शतरंज का नाम है। तो इसमें अलग से सोचने के लिए टाइम किसलिए? जाहिर है विज्ञापन के लिए।

मैच शुरू होने से पहले खूब सारे विज्ञापन। आधा खत्म होने के बाद खूब सारे विज्ञापन, पूरा खत्म होने के बाद एक बार फिर खूब सारे विज्ञापन, विकेट गिरने के बाद खूब सारे विज्ञापन...। कोई खिलाड़ी घायल हो जाए तो मरहम-पट्टी के बीच खूब सारे विज्ञापन...। इतने विज्ञापनों का समय भी कम पड़ रहा था सो ये ले आए स्ट्रेटेजी टाइम आउट...। कुछ बड़े विज्ञापन अंतराल और...।

टीवी से उठकर जाने की भी एक सीमा होती है। चैनल बदलने में भी थकान होने लगती है। एक समय ऐसा आता है कि आप हार मान लेते हैं और विज्ञापनों से लड़ना छोड़कर चुप बैठ जाते हैं। इसी लम्हे की खातिर तो विज्ञापन दिए जाते हैं। ये एक ऐसा चक्रव्यूह है जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं है।

आजकल तो यह होने लगा है कि एक उत्पाद का विज्ञापन सभी चैनलों पर लगभग एक ही समय पर दिया जाता है। आप चैनल बदलते हैं तो पाते हैं कि यहाँ भी वही विज्ञापन चल रहा है।

बात दरअसल ये चल रही थी कि अब ओवर के बीच में भी एक दो विज्ञापन दिखाने लगे हैं। धीरे से सभी छः गेंदों के बीच विज्ञापन दिखाए जाएँगे। ये मुफ्त मनोरंजन की कीमत है। अगर आप मैदान में मैच देखते हैं तो ये सब नहीं होता। खाली लम्हों का भी अपना रोमांच है। ओवर बदलने के बीच जो कुछ होता है, उससे बोरियत नहीं होती तारत्मय कायम होता है।

कहा जा रहा है कि मल्टीप्लेक्स में मैच देखने का मजा है, क्योंकि वहाँ विज्ञापन नहीं दिखाए जाते। अगर यह सच है तो बहुत मजेदार है। मगर एक मैच के लिए सौ-दो सौ रुपए खर्च करना बहुत अधिक है।

क्रिकेट को जमकर दुहा जा रहा है। डर है कि कहीं लोगों की दिलचस्पियाँ खत्म न होने लगे। अगले साल से दो टीम बढ़ जाएँगी और मैचों की संख्या भी...। तब क्या होगा? विज्ञापनों का जो अंबार लगा हुआ है उस पर कुछ विज्ञापन और आ गिरेंगे। ऐसे में याद आता है कि एक खेल फुटबॉल भी है, जिसमें खेल शुरू होने के बाद सिर्फ मध्यांतर में ही कुछ समय मिलता है। रोमांच का एक स्तर हमेशा बना रहता है। फुटबॉल देखते हुए आप कुछ और नहीं कर सकते। एक सेकंड के लिए भी आप हिले कि उतनी देर में गोल हो सकता है।

क्रिकेट की बनावट में ही खामी है...। विज्ञापन करने वालों के लिए क्रिकेट जैसी सुविधाजनक कोई और चीज नहीं।

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