नौ ग्यारह के बाद कितने ही टीवी कार्यक्रम अमेरिका में ऐसे बने हैं, जिसमें बहुत ही तथ्यपरक ढंग से बताया गया है कि सब कुछ कैसे हुआ। हमारे यहाँ अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ, बाद में मुंबई बम कांड हुआ, संसद पर हमला हुआ, अक्षरधाम हमला हुआ, गोधरा कांड हुआ, गुजरात में योजनाबद्ध नरसंहार हुआ, मुंबई में रेल बम विस्फोट हुए, एक बार फिर मुंबई में ही कसाब वाला आतंकी हमला हुआ। क्या हम इन सबको लेकर कोई टीवी शो बना सकते हैं, जिसमें हम विस्तार से घटनाओं को पूरी तरह समझ सकें?
क्या किसी के पास हिम्मत है कि सच को फिल्मा सके, सहन कर सके? हम इतिहास से कहीं इसीलिए तो नजरें नहीं चुराते कि हम इतिहास को सहन नहीं कर सकते? हकीकत यही है कि हम सच को पचा नहीं पाते। उदाहरण हैं वे फिल्में जो इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में बनीं। "परजानिया" को गुजरात में नहीं दिखाया जा सका, क्योंकि उसमें नरोदा पाटिया के दंगों का उल्लेख और चित्रण था।
हम इतिहास को भी धार्मिक ग्रंथों सरीखा बना लेते हैं। कई ऐतिहासिक चरित्र ऐसे हैं, जिन पर लोगों की श्रद्धा ने सिंदूर लेप दिया है। अब उनका असली रूप नहीं देखा जा सकता। किसी इतिहासकार ने शिवाजी पर कुछ लिख दिया तो बजाय उस पर बहस करने के, विचार-विमर्श करने के हम किताब जलाते हैं और सरकार उस किताब को बैन कर देती है। किसी फिल्म में जरा सा कुछ कहा जाए, तो कार्यकर्ता सिनेमाघर जलाने लगते हैं। बोलने की स्वतंत्रता तभी तक है, जब तक आप लोगों को पसंद आने वाली बातें कहें। मगर क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? इन दिनों कुछ ऐतिहासिक चरित्रों पर सीरियल आ रहे हैं। मगर इन सीरियलों में भी व्यक्ति पूजा का भाव है। किसी के भी बारे में तर्क से, इतिहास सम्मत बात नहीं कही जा सकती।
डिस्कवरी पर, नेशनल ज्यॉग्राफिक पर, फॉक्स हिस्ट्री चैनल पर बहुत-सी घटनाओं पर आधारित टीवी कार्यक्रम आते हैं। इन कार्यक्रमों के स्तर का अगर कोई एक कार्यक्रम हम गिना सकते हैं, तो वो है श्याम बेनेगल का "भारत एक खोज"। क्या वजह है कि हमारे प्रतिभावान लोग टीवी से छिटक गए हैं और टीवी पर निहायत ही फूहड़ और औसत दर्जे के कार्यक्रम आ रहे हैं? एनडीटीवी इंडिया के कुछ कार्यक्रमों और बहसों को छोड़ दिया जाए, तो हालत निराशाजनक है। तथ्यपरकता और ईमानदार संवाद सिरे से गायब हैं। अब न तो "मिर्जा गालिब" जैसा कोई धारावाहिक है और न ही "मालगुडी डेज़" जैसा।
इन दिनों भी हमारे कहानीकार बढ़िया लिख रहे हैं मगर किसी का ध्यान इस पर नहीं है कि समकालीन कहानीकारों की कहानियों पर धारावाहिक बनाएँ। हमारा टीवी हमारी मंदबुद्धिता का आईना है। अगर हम इतिहास से नहीं सीखते तो हम वही गलतियाँ दोहराएँगे। अमेरिका में ग्यारह सितंबर के बाद कोई आतंकी हमला नहीं हुआ, क्योंकि उन्होंने सीखा। हम इतिहास देखने की हिम्मत ही नहीं करते, तो सीखेंगे क्या खाक?