डॉली बिंद्रा और श्वेता तिवारी का झगड़ा देखने के लिए मंगलवार रात उन लोगों ने भी पलट-पलटकर बिग बॉस देखा, जो अमूमन बोरियत की वजह से यह कार्यक्रम देखना छोड़ चुके थे। लोगों को पुरानी दस्यु सुंदरी सीमा परिहार से उम्मीद थी कि वे पंगा करेंगी, मगर वे तो वाल्मीकि का महिला संस्करण हो गई हैं। झगड़ती ही नहीं, उलटा दूसरों को समझाती हैं। वे जेल में जिन परिस्थितियों में रही हैं, उसके मुकाबले तो बिग बॉस का घर उनके लिए जन्नत है। अगर इस घर में बने रहने और जीतने के लिए निर्लिप्त व शांत रहना जरूरी है, तो सीमा परिहार ही इस शो की विजेता हैं। मगर विजेता के कारण शो नहीं चलते। शो चलते हैं अपनी हरकतों के कारण, दो-चार एपिसोड में बाहर होने वालों के कारण। बिग बॉस की इस टीम से बंटी बाहर हो चुका है। बचे हुए तो बहुत समझदारी से भाईचारा-भाईचारा खेल रहे हैं। शो की टीआरपी गिर रही है, इसीलिए डॉली बिंद्रा को पहुँचाया गया है।
बिग बॉस के कर्ताधर्ताओं ने डॉली को मानो कहकर भेजा है कि फुल बदतमीजी करो। वही रूप दिखाओ जो फिल्मों में दिखाती हो। फिल्मों में डॉली ऐसी महिला का किरदार अकसर निभाती हैं, जो बदतमीज, अहंकारी और विलासी है। बिग बॉस के घर में आने से पहले ही वो अपने उसी किरदार में हैं। फिल्मों में जिन्हें बुरा दिखाया जाता है, वे असल जिंदगी में अक्सर भले आदमी होते हैं। उदाहरण के लिए प्राण, प्रेमनाथ, प्रेम चोपड़ा...। तमाम खलनायक और खलनायिकाएँ असली जीवन में बहुत ही अच्छे इंसान रहे हैं। डॉली बिंद्रा ही क्यों अपवाद हैं? वे तो लड़ने के लिए मानो सींग खुजाती रहती हैं। ऐसे मिजाज के साथ तो आदमी खड़ी दीवार से झगड़ा कर ले। कर्ताधर्ताओं ने उन्हें उनके खतरनाक चेहरे-मोहरे और फिल्मी छवि के लिए चुना है और वे अपने मकसद में सफल भी रहे हैं।
अफसोस बस यही है कि लोगों को ऐसे घटिया झगड़े देखने में मजा आता है। हम निंदा के लिए भले ही लड़ने वालों से कह दें कि इस जगह को मछली बाजार मत बनाओ, नल पर झगड़ने वाली औरतों की तरह मत झगड़ो, मगर हमारी खूब दिलचस्पी ऐसे ही झगड़ों में रहती है। अगर हम भीतर से भी उतने ही सभ्य हों, जितने ऊपर से दिखते और दिखाते हैं, तो ऐसे झगड़ों में हमें बिलकुल मजा न आए। मगर कल सब कान लगाकर सुन रहे थे और इस बात पर मन ही मन अफसोस कर रहे थे कि जब डॉली बिंद्रा श्वेता तिवारी के मर्द दोस्तों के नाम गिना रही थीं, तो बार-बार बीप क्यों बज रही थी। क्यों बिग बॉस ने श्वेता के चाहने वालों के नाम एडिट कर दिए? दूसरों को कीचड़ में लिथड़ा देखने का जो आदिम मजा है, वो हम चूकते ही नहीं। इसीलिए केबीसी पर लाखों की हार-जीत देखना छोड़कर हम सब झगड़ा देखने में जुटे हुए थे। किसी विद्वान ने कहा है कि जैसी जनता होती है, वैसी सरकार चुन लेती है। लगता है मनोरंजन के बारे में भी यही बात सही है।