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कश्मीर का आंखों देखा सच : हम सिर्फ गोलियों से ही नहीं मरे, हमारी जान सिस्टम ने भी ली है

डॉ. रीना कौल मट्टू की आपबीती

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स्मृति आदित्य

1990 में हम लोग आतंकवाद और नरसंहार से जान बचा कर आए थे लेकिन ऐसा नहीं है कि उससे पहले कश्मीर में सब ठीक था, 7 बार पहले भी इन्हीं दिक्कतों के चलते पलायन हो चुका था....जैसे जैसे धीमे धीमे इस्लामिक वर्चस्व बढ़ता रहा कश्मीरी वहां से निकलते ही रहें। 
 
कभी करियर के लिए, कभी पढ़ाई के लिए, कभी सुरक्षा के लिए निकल ही रहे थे....हमारी संख्या दिन पर दिन कम हो ही रही थी... 
 
19 जनवरी को ये हुआ कि रात को सभी मस्जिदों से एक साथ कश्मीरी भाषा में आवाज आई जिसका अनुवाद यह था कि या तो हम से मिल जाओ, मर जाओ या भाग जाओ....अपनी बहन-बेटियां हमें दे जाओ..हम यहां क्या चाहते हैं पाकिस्तान-पाकिस्तान जैसे नारे लगे....
 
बात जब यहां तक आ गई कि जान के साथ इज्जत पर भी खतरा मंडराने लगा तो लोग भागने लगे। हम कश्मीरी कोई बहुत हाई क्लास भी नहीं थे और बहुत लोअर क्लास भी नहीं थे। हम सब सर्विस क्लास लोग थे। पढ़े लिखे तबके वाले....अधिकांश प्रायवेट जॉब वाले क्योंकि सरकारी नौकरी तो हमको कम मिलती थी....
 
ऐसा नहीं है कि हम ग्रुप बना कर भागे सब अलग-अलग कोई टैक्सी में, कोई ट्रक में कोई पैदल....कई किस्से तो ऐसे हैं कि मां को नहीं पता बेटा किधर गया, भाई को नहीं पता भाई किधर गया, पति अपनी पत्नी से बिछड़ गया... ऐसे तो हजारों मामले मिल जाएंगे...मैं और मेरे पेरेंट्स, मेरा छोटा भाई इसी तरह भागे....हम लोग कुछ दूर तक पैदल गए तो स्वाभाविक है पैदल तो कुछ लेकर जा नहीं सकते थे...
 
मैं एमबीबीएस कर रही थी तो कुछ सर्टिफिकेट्स/ डॉक्यूमेंट्स उठा लिए वह भी इस उम्मीद में कि जहां जाऊंगी वहां अपनी पढ़ाई जारी रख सकूंगी... भाई उस वक्त 12 वीं में था, उसकी परीक्षा रोक दी गई थी...उसने भी अपनी सर्टिफिकेट्स  उठा ली...रास्ते के लिए हमने कुछ सामान भी नहीं लिया। हम जिन रास्तों से निकले कहीं खून है, कहीं लाशें हैं...
 
मेरे फादर एसआरटीसी(सड़क परिवहन) में थे, हम वहां तक पंहुचे तो हमने देखा हमारे जैसे हजारों लोग हैरान हो रहे थे, वह कंप्लीट फैल्योर ऑफ गवर्नमेंट था.. कहीं कोई व्यवस्था नहीं....कोई पुलिस नहीं कोई कुछ नहीं है....ना क्लर्क, ना ड्राइवर....लोग चारों तरफ बस रो रहे थे कैसे भी हमें यहां से जाना है वरना हम मार दिए जाएंगे चूंकि मेरे पिता एसआरटीसी में थे तो किसी तरह उन्होंने एक बस को निकलवाया,पुराने कश्मीरी ड्राइवर को कहा बस चलाने के लिए...उसमें जो भी जैसे चढ़ सका, जहां जैसे बैठ सकते थे बैठे, खड़े हुए और सीधा वहां से बस चली और जम्मू में रूकी और बीच में कहीं नहीं रूकी....
 
जम्मू में जब हम आए तो वहां एक गीता भवन नाम की जगह है वहां बड़ा सा हॉल था, जगह जगह लोग बैठे थे...वहां कुछ स्वयंसेवक थे, वे मदद कर रहे थे, कोई चावल दे रहा था, कोई पानी...किसी किसी के पास पैसे थे वे अपने लिए किराए की जगह देख रहे थे....कुछ लोग कैंप में चले गए...हम वुलन कपड़े में थे आपको शायद पता हो कि जनवरी में कश्मीर में कितनी ठंड होती है...आपको विश्वास नहीं होगा कि साल भर हम उन्हीं वुलन कपड़ों में रहें जबकि जम्मू बिलकुल अलग तापमान की जगह है वहां की गर्मी हमने अपने वही कपड़े पहन कर गुजारी.... हमारे पास चप्पले नहीं थी, कॉटन के कपड़े नहीं थे... वही फिरन, वूलन और जूते थे। 
 
हम उन्हीं कपड़ों में जगह जगह भटके वह भी इसलिए कि कहीं एडमिशन हो जाए, शिक्षा अधूरी न रहे... मुझे अच्छे से याद है मैं जब गवर्नर के पीए के पास गई तो उन्होंने हमें कहा कि आप हमारी प्राथमिकता नहीं हो, हमारी प्राथमिकता यह है कि हम उग्रवादियों से कैसे निपटें, मैंने उनसे कहा मेरा एक साल जाया हो जाएगा..मुझे जवाब मिला कि आसाम में तो स्टूडेंट्स के 5 साल बर्बाद हो गए हैं, तुम्हारा भी 1 साल हो गया तो कौन सी बड़ी बात है....
 
मेरा वाकई एक साल जाया हुआ, लेकिन हमारी किसी ने नहीं सुनी....हम सिर्फ आतंकवादियों को दोष नहीं दे सकते....सरकार, पुलिस प्रशासन, समाज, व्यवस्था सब दोषी हैं...जब हमने बहुत सारे आंदोलन किए तब कहीं जाकर हमें प्रवेश मिला..आपको एक बात बताऊं कि हमें तो कोई लेने को भी तैयार नहीं था...
 
हमने जो भी मुकाम बाद में हासिल किया वह खुद से किया है,खुद से फाइट किया है। 
 
अपने ही दम पर हमने अपने रोजगार भी तलाशे हैं और शिक्षा भी पूरी की है। 
 
आज भी मुझ पर हैवी लोन है अपने अस्पताल का,लेकिन कोई कहीं से उम्मीद भी नहीं, अपने ही दम पर सब कर रहे हैं। हमें तो धारा 370 की वजह से कहीं और एमडी की परीक्षाओं में बैठने की पात्रता भी नहीं होती थी....मैंने तब कानपुर में रहते हुए मुख्यमंत्री जी सरकार से बस अनुमति मांगी थी कि मेरे हालातों के चलते मुझे बस एग्जाम में बैठने की एलिजिबिलिटी दे दीजिए....लेकिन उन्होंने कहा कि हेल्थ का डिपार्टमेंट किसी और के पास है मैं कुछ नहीं कर सकता....ये उन दिनों की बात है जब साझा सरकार थी इनकी...उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में लड़ने के बाद 5 साल जाया करने के बाद मैं वापिस जम्मू गई एमडी करने के लिए...और फिर यहां आकर खुद को एम्प्लॉय किया और अपने साथ कुछ और लोगों को भी रोजगार देने का प्रयास किया। 
 
हमें चाहिए कुछ नहीं, हमें इस बात का कोई शिकवा नहीं है कि हमें कोई रिजर्वेशन नहीं मिला, कोई रिलीफ नहीं मिला, कोई फाइनेंशियल हेल्प नहीं मिली...
 
हमारी शिकायत सिर्फ यह है कि हमारा जो नरसंहार हुआ उसको किसी ने आधिकारिक रूप से रेक्गनॉइज नहीं किया।
 
हमारी मांग भी यही है भारत सरकार से कि वे माने कि हां, जेनोसाइड हुआ था....मॉस कीलिंग हुई थी...दोषियों को सजा मिलेगी...
 
आप सोचिए कि चावल के ड्रम में किसी महिला के पति को मार दिया जाता है क्या वह उस समय सबूत के लिए फोटो लेगी? आपको बताऊं कि यह मेरे ही मोहल्ले में हुआ था...क्या पीड़ित लोग पहले इस बात का सबूत जुटाएंगे या ऐसे खौफनाक मंजर से अपनी जान बचाकर भागेंगे? 
 
खुलेआम वारदात को अंजाम देने वाले घूम रहे हैं।
 
 कोर्ट ने कई केस इसलिए डिसमिस कर दिए कि बहुत देर हो चुकी है, यह बहुत पुराना मामला हो गया, सोचिए कि जब हम अपने रहने,खाने और कपड़ों की जुगाड़ कर रहे थे तब हम कोर्ट कैसे जाते, अब जब हम संभले हैं तो कोर्ट जाकर सुनते हैं कि बात पुरानी हो गई। हमें कहीं से कोई इंसाफ नहीं मिला। अब हमें सरकार से उम्मीद है कि जिन लोगों की संपत्ति छीनी गई जिनके लोग मारे गए उनके लिए कुछ करें।   
 
उत्पीड़न सिर्फ शारीरिक नहीं होता है मानसिक भी होता है। हमारे लोग सिर्फ आतंकवादियों द्वारा ही नहीं मारे गए टैंट में सांप, बिच्छु के काटने से भी मरे। तड़प-तड़प कर अपने घरों को याद कर के मरे। जाने कितनी बीमारियों से मरे। बताइए उनका डाटा कहां से आएगा? सिर्फ गोली से नहीं मरे हम, सेकड़ों कारणों से मरे।
 
मैं एक गायनेकॉलॉजिस्ट हूं मैं बताती हूं कि हमारी महिलाओं को बच्चे नहीं हुए क्योंकि एक ही जगह पर रहने से वह संभव नहीं था दूसरे हमारी जरूरतें ही तब दूसरी थी...हमारी महिलाओं में इंफिर्टिलिटी की समस्या बढ़ गई...कई लोगों ने बच्चे पैदा करने का रिस्क नहीं उठाया कि कैसे उनको पालेंगे? उम्र बढ़ने पर कई कश्मीरी पंडितों की शादी नहीं हुई... कहां-कहां तक हम अपने कष्ट गिनाएं? 
 
और एक फिल्म में वह सब कैसे समेटा जा सकता है,यह तो सीरियल, वेबसीरिज बनने पर भी नहीं समेटा जा सकेगा...फिर भी हम द कश्मीर फाइल्स के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री के बहुत बहुत शुक्रगुजार हैं। उन्होंने इन 3 घंटों में काफी कुछ दिखाने की कोशिश की है। जो दिखाया है वह सब 100 प्रतिशत सही है पर बस वही नहीं है और भी बहुत बहुत कुछ हुआ है जो सामने आएगा तो दहला देगा....एक आदमी ने इतनी हिम्मत की, जब कोई कुछ सोच भी नहीं रहा था।
 
बहरहाल, मैं आजतक वहां दोबारा नहीं गई. मैं नहीं जा सकती...ऐसा नहीं है कि वहां मुझे रहने की जगह नहीं मिल रही इसलिए नहीं जा रही...हम वहां जा सकते हैं तब जब हमें वहां मान सम्मान मिलेगा,हमारी संस्कृति को सहेजने का माहौल मिलेगा, हमें सुरक्षा मिलेगी, हम कश्मीरी पंडित के रूप में वहां रहेंगे न कि दबे हुए पीड़ित के रूप में...हम अपने पूरे गौरव, गरिमा और आत्मसम्मान के साथ रहना चाहते हैं। इस आश्वासन के साथ, इस आश्वस्ति के साथ कि फिर कभी ऐसा मंजर हमारे जीवन से नहीं जुड़ेगा...अब चाहे फ्री का मकान, फ्री की नौकरी दे दो पर उनके साथ नहीं रह सकते जिनके जुल्म हमारे लोगों ने झेले हैं। अब हमें चाहिए उस होमलैंड में हमारा हिस्सा..जहां हम अपनी सुंदर परंपरा, अपने मंदिर, अपनी इज्जत, अपनी पूजा पाठ और अपनी सहजता के साथ जी सके। 
 
भारत के पूरे कानून-कायदे के साथ...हम रहना चाहते हैं। 
 
आपको बताऊं कि हमें कहा जाता है आप बंदूक लेकर वहां रहने लग जाओ, अरे,अगर हमें बंदूक ही उठानी होती तो तब न उठा ली होती....हम बंदूक के साथ रहने लगे तो वह कौन सा जीना हुआ...आज के दौर में इसे जीना नहीं कहते हैं, यह तो किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं हुई कि जीने के लिए बंदूक के साये में रहना पड़े।
 
हम जेनोसाइड एक्ट चाहते हैं ताकि जो हमारे साथ हुआ वह किसी और कौम के साथ न हो और अगर हो तो जिन परेशानियों से हम गुजरे उनसे वे न गुजरें। चाहे केरल हो या बांग्लादेश या और कोई स्टेट... जेनोसाइड एक्ट सभी के लिए राहें सुरक्षित करें। 

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