Publish Date: Mon, 20 Feb 2017 (19:53 IST)
Updated Date: Mon, 20 Feb 2017 (19:58 IST)
शायद यह बात कहने व सुनने में थोड़ी अटपटी-सी लग रही होगी कि भला पुरे प्रदेश में तो 403 विधानसभा सीटें हैं जबकि पूर्वी 10 जिलों में केवल 61 सीटें तो ये कैसे प्रदेश की सत्ता की चाबी हो सकती है। यह बात हम नहीं कह रहे हैं। ये तो पिछले एक दशक में हुए दो बार के चुनावी आंकड़े बता रहे हैं।
वाराणसी, चंदौली, जौनपुर, गाजीपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर मऊ, बलिया, सोनभद्र व भदोही जिलों में 61 विधानसभा सीटें हैं। इन सभी विधानसभा सीटों में से जिस भी राजनीतिक दल को 50 प्रतिशत से ज्यादा सीटें मिलीं। उत्तरप्रदेश में सत्ता उसके हाथ में आई है। बीते दस वर्षों में दो विधानसभा चुनाव हुए उनके परिणाम के अनुसार 2007 के विधानसभा चुनाव में इन दस जिलों की 61 विधानसभा सीटों पर बहुजन समाज पार्टी को 36 सीटें मिली थीं। इसका प्रतिशत लगभग 60 था।
समाजवादी पार्टी को 16 सीटें हासिल हुईं। भाजपा को मात्र 5 सीटें ही मिलीं। कांग्रेस का तो खाता ही नहीं खुला। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी। मायावती मुख्यमंत्री बनीं। इनका कार्यकाल ख़त्म होने पर 2012 का दूसरा चुनाव हुआ।
इसमें वर्तमान में प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को 65 प्रतिशत का फायदा हुआ और उसे 39 सीटें मिली थीं, वहीं बहुजन समाज पार्टी को केवल 8 सीटें व भाजपा को मात्र 5 सीटें मिलीं। कांग्रेस को जरूर 4 सीटों का फायदा हुआ। इसके बाद प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार समाजवादी पार्टी की बनी। यह कहना गलत नहीं होगा कि पूरब के 10 जिलों की 61 सीटें ही सत्ता के भाग्य का फैसला करेंगी। इस चुनाव में भाग्य किसका साथ देता है, इसका पता तो 11 मार्च को ही चलेगा।
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संदीप श्रीवास्तव
संदीप श्रीवास्तव करीब 25 वर्ष से ज्यादा समय से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वेबदुनिया के लिए उत्तर प्रदेश में स्ट्रिंगर के रूप में कार्य करते हैं। ....
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