Urdu Literature Sahitya 30
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इक राह तका करते हैं
ऐसी एक राह पे, जिससे न वो गुज़रेंगे कभी यूँ ही बैठे हुए इक राह तका करते हैं - मजरूह सुल्तानपुरी
दरिया को अपनी मौज की
दरिया को अपनी मौज की तुग़यानियों से काम कश्ती किसी की पार हो या दरमियाँ रहे
हरीफ़ों ने रपट लिखवाई है
अरीफ़ों ने रपट लिखवाई है जा-जा के थाने में
इक मोअम्मा है समझने का
इक मोअम्मा है समझने का न समझाने का
जो ग़म हद से ज़्यादा हो
जो ग़म हद से ज़्यादा हो, ख़ुशी नज़दीक होती है
एक मुद्दत से तेरी याद भी
एक मुद्दत से तेरी याद भी आई नहीं हमें
बहुत मुश्किल है
बहुत मुश्किल है दुनिया का समझना
उनका जो काम है वो
उनका जो काम है वो एहले सियासत जानें मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
ऐ ग़मे-यार बता
ऐ ग़मे-यार बता कैसे जिया करते हैं, जिनकी तक़्दीर बिगड़ जाती है, क्या करते हैं - मजरूह सुल्तानपुरी
कम से कम दो दिल तो होते
कम से कम दो दिल तो होते इश्क़ में, एक रखते एक खोते इश्क़ में -----------मीर
ग़म कौन से ख़ाने में रखिए
ख़ुशी का रंग पैमाने में रखिए तो फिर ग़म कौन से ख़ाने में रखिए --- अख़्तर नज़मी
लेकिन ग़म जुदा होता नहीं
बच्चे उदास बैठे हैं
बच्चे उदास बैठे हैं पिंजरे के आसपास, जैसे समझ रहे हों परिन्दों की गुफ़्तगू ------- अख़्तर नज़मी
... तो फिर लहू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल, जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है - ग़ालिब
तुम्हें याद करने लगते हैं
तुम्हारी याद के जब ज़ख्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।
इक आदमी की बड़ी कद्र है
इक आदमी की बड़ी कद्र है मेरे दिल में, भला तो वह भी नहीं मगर बुरा कम है - अख़्तर नज़मी
हम कभी जिए ही नहीं ...
आँख के आँसू तो पी गए
चेहरे से हो सके तो उदासी भी पोंछ लो, नज़मी तुम अपनी आँख के आँसू तो पी गए --- अख़्तर नज़मी
न समझने की ये बातें हैं
न समझने की ये बातें हैं न समझाने की ज़िंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की - फिराक़
ख़ुदा ऎसे मुखड़े बनाता है कम
बहुत ख़ूबसूरत है मेरा सनम, ख़ुदा ऎसे मुखड़े बनाता है कम।
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