Urdu Literature Sahitya 33
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खुद आईना हो जाऊँगा
अपने हर लफ़्ज़ का खुद आईना हो जाऊँगा उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा - वसीम बरेलवी
ग़ालिब का ख़त-33
तुमने किया न याद कभी
तुमने किया न याद कभी भूलकर हमें , हमने तुम्हारी याद में सबकुछ भूला दिया - बहादुर शाह जफ़र
तुमसे मिले ज़माना हुआ
तुमसे मिले ज़माना हुआ फिर भी लगे , जैसे तुम मिलके गए अभी-अभी
इश्क़ मुझको नहीं
इश्क़ मुझको नहीं, वहशत ही सही मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही
दिल को सुकून रूह को आराम
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया मौत आ गई कि यार का पैग़ाम आ गया।
बात जो थी गौतम-ओ-मूसा में
फ़ासले इस कदर हैं रिश्तों में, घर ख़रीदा हो जैसे क़िश्तों में...
हमने क्या चाहा था इस दिन के लिए
तुमने बदले हमसे गिन-गिन के लिए, हमने क्या चाहा था इस दिन के लिए - दाग़ देहलवी
जिस्म की बात नहीं थी
जिस्म की बात नहीं थी, उनके दिल तक जाना था लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है - हस्तीमल 'हस्ती'
इश्क़ पे ज़ोर नहीं
इश्क़ पे ज़ोर नहीं है, ये वो आतिश 'ग़ालिब', कि लगाये न लगे और बुझाये न बने।
दिल के छालों को कोई शायरी कहे
दिल के छालों को कोई शायरी कहे तो दर्द नहीं होता, तकलीफ तो तब होती है जब लोग वाह-वाह करते हैं।
यही है बन्दगी अपनी
यही है ज़िन्दगी अपनी, यही है बन्दगी अपनी कि उनका नाम आया और गरदन झुक गई अपनी ---माहिरुल क़ादरी
मैं गुलदस्ता लेकर आया हूँ
ऐ काश वो भी ऐसे में आ जाए
ऐ काश वो भी ऐसे में आ जाए अचानक , मौसम बहुत दिनों में सुहाना हुआ तो है - अज़ीज़ अंसारी
तेरे कूंचे से हम निकले
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले - मिर्जा़ ग़ालिब
फ़लक देता है जिन को ऎश
फ़लक देता है जिन को ऎश उन को ग़म भी होते हैं, जहाँ बजते हैं नक़्क़ारे वहाँ मातम भी होते हैं।
मेरा खत उसने पढ़ा
मेरा खत उसने पढ़ा, पढ़ के नामाबर से कहा यही जवाब है इसका कि कुछ जवाब नहीं----अमीर मीनाई
याद रक्खो तो दिल के पास हैं हम
याद रक्खो तो दिल के पास हैं हम भूल जाओ तो फ़ासले हैं बहुत।
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है, तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा - बशीर बद्र
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी....
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