Urdu Literature Sahitya 35
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या तो दीवाना हँसे, या तू जिसे तौफीक दे
या तो दीवाना हँसे, या तू जिसे तौफीक दे , वरना इस दुनिया में रहकर मुस्करा सकता है कौन।
तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर ले
तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर ले, हम तो कल ख्वाब-ए-अदम* में शब-ए-हिजराँ* होंगे - मोमिन
किसका काबा, कैसा क़ैबला, कौन हरम है क्या ऎहराम
किसका काबा, कैसा क़ैबला, कौन हरम है क्या ऎहराम कूंचे के उसके बाशिन्दों ने, सबको यहीं से सलाम किया -
ग़ालिब का ख़त-18
इश्क़ कहते हैं जिसे काम निकम्मों का नहीं
इश्क़ कहते हैं जिसे काम निकम्मों का नहीं, वस्ल इक उम्र की महनत का सिला होता है - जोया
ज़िन्दगी लगती है इक प्यारी ग़ज़ल सी लेकिन,
ज़िन्दगी लगती है इक प्यारी ग़ज़ल सी लेकिन, इस का हर शे'र बड़ा दर्द भरा होता है।
तुम्हारी याद के जब ज़ख्म भरने लगते हैं
तुम्हारी याद के जब ज़ख्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।
रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे
रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे, कट गई उम्र रात बाक़ी है।
मौत का एक दिन मोअय्यन है
मौत का एक दिन मोअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती
मौत उसकी है करे जिसका ज़माना अफ़सोस
मौत उसकी है करे जिसका ज़माना अफ़सोस, यूँ तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए।
शबनम के सामने जो खड़ी हो गई है धूप
शबनम के सामने जो खड़ी हो गई है धूप, लगता है मोतियों की लड़ी हो गई है धूप।
मैं अक्सर चाँद पर जाता हूँ
मैं अक्सर चाँद पर जाता हूँ शाइर आदमी हूँ, पलट कर फिर यहीं आता हूँ आख़िर आदमी हूँ।
होगा कोई ऐसा भी जो ग़ालिब
होगा कोई ऐसा भी जो ग़ालिब को न जाने , शाइर तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है।
ग़ालिब बुरा न मान जो
ग़ालिब बुरा न मान जो ज़ाहिद बुरा कहे, ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे।
तुझे न माने कोई इससे तुझको क्या मजरूह
तुझे न माने कोई इससे तुझको क्या मजरूह चल अपनी राह भटकने दे नुकता चीनों को।
कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब
कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब, और कहाँ वाइज़ पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले
हक़ीक़त खुल गई हसरत तेरे तर्क-ए-मोहब्बत की
हक़ीक़त खुल गई हसरत तेरे तर्क-ए-मोहब्बत की तुझेतो अबवो पहले से भी बढ़ कर याद आते हैं ---हसरत मोहानी
दिल गया रोनक़-ए-हयात गई
दिल गया रोनक़-ए-हयात गई, ग़म गया सारी कायनात गई---------जिगर मुरादाबादी
अफ़सोस तो ये है कि मेरे मद्दे मुक़ाबिल
ये तज्रबे सफर के किसी और को सुना
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