Urdu Literature Sahitya 37
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नया है लीजिए जब नाम उसका
नया है लीजिए जब नाम उसका बड़ी वुसअत है मेरी दास्तां में।
चल साथ कि हसरत दिले महरूम से निकले
चल साथ कि हसरत दिले महरूम से निकले। आशिक का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले
हम भी कुछ खुश नहीं वफा करके
हम भी कुछ खुश नहीं वफा करके तुमने अच्छा किया निबाह न की।
तेरी निगाह भी इस दौर की ज़कात हुई
तेरी निगाह भी इस दौर की ज़कात हुई जो मुस्तहिक़ है उसी तक नहीं पहुँचती है ।
हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर...
हँसी ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू 'फ़राज़' तूने उसे मुश्किलों मे...
हाथ मलते हैं खुदा ओ अहरमन
हाथ मलते हैं खुदा ओ अहरमन तेरा आशिक दीनो दुनिया का नहीं।
हज़ारों मुश्किलें हैं दोस्तों से दूर रहने में
हज़ारों मुश्किलें हैं दोस्तों से दूर रहने में, मग़र इक फ़ायदा है पीठ पर ख़ंजर नहीं लगता।
उसके करम की बात न पूछो, साथ वो सब के होले है
उसके करम की बात न पूछो, साथ वो सब के होले है इक दरवाज़ा बन्द अगर हो, सौ दरवाज़े खोले है।
ग़ालिब का ख़त-37
ऎ मेरी जान मुझे हैरत-ओ-हसरत से न देख
ऎ मेरी जान मुझे हैरत-ओ-हसरत से न देख हम में कोई भी जहाँनूर-ओ-जहाँगीर नहीं तू मुझे छोड़, के ठुकरा के ...
अशआर : (मजरूह सुलतानपुरी)
जला के मिशअले-जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे सात चले
नज़्म---'निसार करूँ'
गालिब का ख़त-36
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
होगा कोई ऐसा भी जो ग़ालिब को न जाने शाइर तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
ग़ालिब पर नाटक का मंचन
ग़ालिब की सालगिरह पर होने वाले इस नाटक में जाने-माने अभिनेता टॉम अल्टर ग़ालिब की भूमिका में दिखाई पड...
ग़ज़ल : मीर तक़ी मीर
उलटी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारि-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
रेहबर इन्दौरी
कभी यक़ीन का यूँ रास्ता नहीं बदला बदल गए हैं ज़माने ख़ुदा नहीं बदला
मोमिन की ग़ज़लें
क्यों बुरा कहते हो भला नासेह मैंने हज़रत से क्या बुराई की
ग़ालिब की ग़ज़ल (अशआर के मतलब के साथ)
रुपायन इन्दौरी के क़तआत
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