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नज्म : हज़ल फ़िराक

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नज्म हज़ल फ़िराक
यारब मेरे नसीब में अकलेहलाल हो
खाने को क़ोरमा हो, खिलाने को दाल हो

लेकर बरात कौन सुपर हाइवेपे जाए
ऎसी भी क्या खुशी कि सड़क पर विसाल हो

जल्दी में मेरे मुँह से जमालो निकल गया
कहना ये चाहता था कि तुम मेहजमाल हो

औरत को चाहिए कि अदालत का रुख करे
जब आदमी को सिर्फ़ खुदा का ख्याल हो

इक बार हम भी राहनुमा बन के देखलें
फिर उसके बाद क़ौम का जो कुछ भी हाल हो

हम तो किसी से भीख नहीं माँगते फ़िराक़
लेकिन अगर फ़क़ीर की सूरत सवाल हो

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