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जब कल्याण सिंह ने दिखाए सियासत के उच्च मानदंड

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अवनीश कुमार

रविवार, 22 अगस्त 2021 (10:29 IST)
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आज का दिन हर एक राजनेता व पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से जुड़े हुए पत्रकार व अन्य सभी लोगों के लिए बेहद दुख का दिन है जो बेहद अच्छे तरीके से पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को जानते हो पहचानते थे।
 
ऐसे ही लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर रहे व दैनिक सरिता प्रवाह में प्रधान संपादक के पद पर कार्यरत राजेश श्रीवास्तव ने वेबदुनिया से पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से जुड़ी हुई कुछ यादें साझा की।
 
उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जैसे राजनेताओं का जाना प्रदेश के लिए किसी बड़ी क्षति से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि राम मनोहर लोहिया से लेकर दीन दयाल तक के आदर्शों पर चलने वाले पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व राज्यपाल कल्याण सिह जब आज अपना शरीर छोड़ गए हैं। तो ऐसे में आज बात उनके जीवन के जुड़े आदर्शों से होना लाजिमी है।
 
कल्याण सिंह के जीवन के आदर्शों के उच्च मानदंडों से आज के नेताओं को सीख लेने की जरूरत दिखायी पड़ती है। किस तरह उन्होंने मंडल, कमंडल की राजनीति के बीच भी अपने सियासी जीवन में उच्च आदर्शों, शुचिता, सियासी मूल्यों, ईमानदारी, कर्मठता व त्याग को बनाये रखना।
 
पहली बार मुख्यमंत्री बनाए गए कल्याण सिंह ने पूरी कैबिनेट के साथ अयोध्या जाकर राममंदिर बनाने का वायदा किया। उनका वायदा सियासी नहीं था उन्होंने राम मंदिर के लिय अपना मुख्यमंत्री का पद भी गंवा दिया। लेकिन राम मंदिर के लिए उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद गंवाना जरा सा भी नहीं अखरा।
 
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1992 के वह दिन : मुझे अच्छी तरह याद है जब 1992 की ढांचा विध्वंस की घटना हुई,उस समय मैं राष्ट्रीय सहारा अखबार में था। उस समय प्रदेश के क्या हालात थे,अयोध्या भी जाने का अवसर मिला था। जो हालात थे और प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के लिए जो सम्मान था कि कल्याण सिंह जिस जगह से गुजरते थे तो महिलाएं उनकी चरण रज लेकर माथों पर लगाया करती थीं।
 
उन्हें हिंदू लोग अपना पुरोधा मानते थे। राम मंदिर आंदोलन का अगर कोई भी जिक्र होगा तो ऐसा नहीं कि कल्याण सिंह का जिक्र न हो। यह दुर्भाग्य ही है कि कल्याण सिंह राम मंदिर को पूरा होते नहीं देख सके। जिस राम मंदिर के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया, वह उसके शिलान्यास में भी नहीं पहुंच सके थे।
 
कोरोना काल के चलते जब बीते दिनों प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के लिए भूमि पूजन किया तो भी वह नहीं शामिल हो सके। और अभी जब पिछले दिनों उन्हें देखने उमा भारती गयीं थी तो भी उन्होंने इशारे से बताया कि राम मंदिर पूरा होते हैं देखूंगा। लेकिन उनकी यह इच्छा भी अधूरी रह गई। 
 
ठुकराया जिला प्रशासन का अनुरोध : 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों के उग्र तेवर को देखते हुए फैजाबाद जिला प्रशासन की ओर से फायरिंग की अनुमति मांगी गई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिह ने जिला प्रशासन का यह अनुरोध ठुकरा दिया था।
 
राम मंदिर के शिलान्यास के मौके पर कल्याण सिंह ने कहा था कि कारसेवकों पर गोली चलाना मुझे कतई मंजूर नहीं था। मुझे अपने उस फैसले पर गर्व है क्योंकि मैंने कारसेवकों को पुलिस की गोलियों का निशाना नहीं बनने दिया।
 
ढांचा टूटने से ही निकला समाधान का रास्ता : अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से अयोध्या विवाद का निपटारा किया जा चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों अयोध्या में भव्य राम मंदिर के लिए भूमि पूजन के बाद निर्माण का काम भी शुरू हो चुका है।
 
भूमि पूजन के मौके पर भी कल्याण सिह ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि अब सभी को यह बात मान लेनी चाहिए कि यदि अयोध्या में विवादित ढांचा मौजूद रहता तो इस विवाद के समाधान का रास्ता कभी भी नहीं निकल पाता।
 
कल्याण सिह के मुताबिक अयोध्या में विवादित ढांचा ढह जाने से ही मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सका है। यदि ढांचा बना रहता तो हमेशा विवाद भी बना रहता और अदालत के लिए भी शायद कोई रास्ता निकाल पाना संभव नहीं हो पाता। 
 
सच्चाई तो यह है कि गुलामी की निशानी, जनता को नहीं भाई - जब कारसेवकों ने 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे को तोड़ डाला तो कल्याण सिह ने कहा था कि सच्चाई तो यह है कि गुलामी की निशानी, जनता को नहीं भाई।
 
आने वाला इतिहास ही इस बात का फैसला करेगा कि यह सही हुआ या गलत। उन्होंने यह भी कहा था कि मैं कौन होता हूं इस कदम को सही या गलत बताने वाला। इस बात का फैसला तो इतिहास ही करेगा।
 
पिछले साल भूमि पूजन के मौके पर कल्याण सिंह ने कहा था कि यदि कारसेवकों ने 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे को न तोड़ा होता तो शायद कभी भी इस विवाद को सुलझाने की कोशिशों में तेजी न आ पाती।
 
उन्होंने कहा कि अब सबको यह बात मान लेनी चाहिए कि विवादित ढांचे को तोड़े जाने से ही मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सका। यदि विवादित ढांचे का वजूद बना रहता तो कभी भी इस विवाद का निपटारा नहीं हो पाता।
 
कल्याण अपने जीवनकाल में हमेशा इस बात को कहते रहे कि उन्हें 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों पर गोली न चलाने के फैसले पर गर्व है। बाद के दिनों में कल्याण सिह हमेशा यही बात कहते रहे कि उन्हें अपने फैसले पर गर्व है क्योंकि कोई राम भक्त दूसरे राम भक्तों के खून से अपना हाथ नहीं रंग सकता।

अब कल्याण तो वापस नहीं लौटेंगे लेकिन आज के नेताओं को जरूरत है कि वह कल्याण सिंह के जीवन से कुछ सीखों, कुछ सियासत आदर्शों वाली हो अनुकरणीय भी हो सकती है। कम से कम कल्याण सिंह के जीवन से तो ऐसी ही उम्मीद दिखती है।

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