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मां एवं नवजात स्वास्थ्य के लिहाज से यूपी बन रहा मॉडल राज्य

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Maternal Health Uttar Pradesh
Maternal Health Uttar Pradesh: स्वास्थ्य किसी भी समाज की प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। विशेष रूप से मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य किसी राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक जागरूकता और प्रशासनिक क्षमता का महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। लंबे समय तक उत्तर प्रदेश मातृ मृत्यु दर (MMR), शिशु मृत्यु दर (IMR) और कुपोषण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझता रहा।

पिछली सरकारों ने चुनौतियों ने स्थिति को बनाया जटिल

उत्तर प्रदेश लंबे समय तक देश के उन राज्यों में शामिल रहा, जहां प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजातों की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही। ग्रामीण और पिछड़े जिलों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण थी।
 
घरों में असुरक्षित प्रसव, गर्भवती महिलाओं में एनीमिया, समय पर अस्पताल न पहुंच पाना, नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (NICU) और स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) जैसी सुविधाओं की कमी तथा प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों का अभाव प्रमुख समस्याएं थीं। गंभीर मामलों में उपचार का शुरुआती “गोल्डन ऑवर” निकल जाने से स्थिति और खराब हो जाती थी।
 
विशाल आबादी, ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकता, स्वास्थ्य सेवाओं की असमान उपलब्धता और जागरूकता की कमी के कारण यह समस्या समय के साथ और जटिल होती गई। पिछली सरकारों की अनदेखी के कारण यह समस्या और जटिल होती गई।

योगी सरकार की पहल

योगी आदित्यनाथ सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र, विशेषकर पूर्वांचल और ग्रामीण इलाकों की चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार को प्राथमिकता दी है। गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ परिसर में वर्षों से संचालित चिकित्सीय सेवाएं और महायोगी गुरु गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय जैसी पहलें भी इस दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
 
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए कई स्तरों पर काम शुरू किया। मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सुधार को भी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल किया गया। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने, गर्भवती महिलाओं को समय रहते स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस सेवाओं के विस्तार, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने, आशा कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को सक्रिय बनाने तथा डिजिटल स्वास्थ्य निगरानी जैसी पहलों ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव की नई आधारभूमि तैयार की।

संस्थागत प्रसव पर विशेष जोर

राज्य सरकार ने सुरक्षित मातृत्व के लिए संस्थागत प्रसव को सबसे महत्वपूर्ण आधार बनाया। जननी सुरक्षा योजना तथा प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसी योजनाओं के जरिए गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए प्रोत्साहित किया गया। गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान और समय से उपचार की व्यवस्था ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक संगठित बनाने में मदद की है।

एम्बुलेंस नेटवर्क बना बड़ी ताकत

102 और 108 एम्बुलेंस सेवाओं के विस्तार ने प्रसूति माताओं और नवजातों के लिए राहत का बड़ा माध्यम तैयार किया। दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाली गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक मुफ्त पहुंच उपलब्ध कराने से संस्थागत प्रसव में वृद्धि हुई। गंभीर स्थिति में नवजातों को रेफरल अस्पतालों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत होने से उपचार की संभावना भी बढ़ी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, प्रसव और नवजात देखभाल में समय पर चिकित्सा सहायता सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है।

मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना तथा जिला अस्पतालों के उन्नयन पर विशेष जोर दिया गया। सरकार का लक्ष्य स्वास्थ्य सुविधाओं को जिला स्तर तक मजबूत करना है। इसके अलावा बड़े शहरों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP मॉडल) के तहत सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल विकसित किए जा रहे हैं। सरकार की मंशा हर मंडल में एक सुपर स्पेशियल्टी चिकित्सालय खोलने की है।
 
स्वाभाविक है इस सबसे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य इकाइयों, SNCU और NICU जैसी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। इसका लाभ प्रसव के दौरान जटिल परिस्थितियों से जूझ रही माताओं और गंभीर स्थिति वाले नवजातों को मिल रहा  है और मिलेगा। विशेष रूप से समयपूर्व जन्मे (Premature Delivery) या गंभीर स्थिति वाले नवजातों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिली है। पहले जिन मरीजों को बड़े शहरों के मेडिकल कॉलेजों या रेफरल संस्थानों में भेजना पड़ता था, उनमें से कई मामलों का उपचार अब जिला स्तर पर संभव होने लगा है।

आशा और एएनएम नेटवर्क की महत्वपूर्ण भूमिका

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में आशा  ( Accredited Social Health Activist) और एएनएम ( Auxiliary Nurse Midwife) कार्यकर्ताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। इन कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण, टीकाकरण जागरूकता, पोषण संबंधी सलाह तथा संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरित करने का काम किया। प्रसूति माताओं और नवजातों के नियमित फॉलो-अप में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

पोषण और जागरूकता पर भी फोकस

मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य केवल अस्पतालों तक सीमित विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध पोषण, स्वच्छता और जागरूकता से भी जुड़ता है। राज्य सरकार ने पोषण अभियान, एनीमिया नियंत्रण कार्यक्रम तथा टीकाकरण अभियानों पर भी विशेष जोर दिया। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के पोषण स्तर में सुधार के प्रयासों ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापक आधार दिया है।

डिजिटल निगरानी से बेहतर प्रबंधन

डिजिटल हेल्थ मॉनिटरिंग और स्वास्थ्य डेटा ट्रैकिंग ने भी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में मदद की है। हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान, टीकाकरण डेटा की निगरानी तथा मरीजों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण से स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी मजबूत हुई है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) और विभिन्न स्वास्थ्य पोर्टलों के माध्यम से भविष्य में मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक एकीकृत एवं पारदर्शी बनाने की दिशा में काम हो रहा है।

चुनौतियां अब भी मौजूद

हालांकि सुधार के बावजूद चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी बनी हुई है। एनीमिया और कुपोषण जैसी समस्याएं भी पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी हैं। कई क्षेत्रों में रेफरल सिस्टम, डिजिटल कनेक्टिविटी और स्वास्थ्य जागरूकता को और मजबूत करने की जरूरत बनी हुई है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और निगरानी को लगातार बेहतर बनाए रखना आवश्यक होगा।

आगे की राह

तमाम चुनौतियों के बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा केंद्र सरकार की योजनाओं और राज्य स्तर की पहलों के सहारे उत्तर प्रदेश को मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सुधार के क्षेत्र में एक प्रभावी मॉडल राज्य के रूप में स्थापित करने की दिखाई देती है।
 
यदि जमीनी स्तर पर संसाधनों, प्रशिक्षण और निगरानी को लगातार मजबूत किया गया तो उत्तर प्रदेश आने वाले वर्षों में मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सुधार के क्षेत्र में देश के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यही मंशा भी है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

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