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वसंत पंचमी कविता : वसंत विरह

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वसंत पंचमी
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- श्रीकृष्‍ण जोशी 'नक्शे नवीस'

ठाट-बाट साज-बाज धारिलीन द्रुम राज,

फूले फले ठारे आज सबको सुहाए है।
तरुवल्ली को निहोर मोर पिकचारो ओर,
करत पपीहा शोर अति हरखायो है॥

शीतल सुगंध मन वायु करे दंद फंद,
कजकी कली मिलिंद खोलि सचुपाये हैं।
साजी सुख को समाज अंग ले अनंग आज,
आए हैं वसंत राज तोहे क्यों न भाये हैं॥

बसे कौन गाम पिया पति यान पायो तिया,
धीर नहिं धार जिया हिया विकसत है।
कूकि कूकि कोयलिया छेदि दियो मोर हिया,
मोपे यह सोतनिया रोज ही खिजत है॥

पूछे खग प्रिय कहां जाए बसे जाने कहां
लाज को बसेरो यहां नित बिलखत है।
चकनीती निसि हन्त कढी रही मोर तंत,
ओरन की है वसंत मोरो बस अंत है।।

फूलत आम अनार पलास,
चहूं दिसि गुंजत मंद मिलिंद है,
कोकिल टूक कर हिय को इन,
पापी पपीहा को नाहिन अंत है।
रैन न बासर चैन रहे,
दुखदायक दर्जे, दुष्ट अनंग है,
'कृष्ण' बिन घनश्याम मिले,
सखि अंत कहूं निकस‍त है।।

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