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सुधा मूर्ति
अपने कॉलेज के दिनों में राधा और रोहिणी मेरी छात्राएँ थीं। वे दोनों अभिन्न मित्र थीं और उन दोनों ने पहली कक्षा से ही साथ में पढ़ाई की थी। उतनी गहरी दोस्ती मैंने शायद ही देखी थी। वे दोनों साथ में कक्षाएँ अटैंड करतीं और लैब में भी एक-दूसरे के साथ ही जातीं। जब मैंने उन्हें लैब में अलग-अलग साथियों के साथ जाने का सुझाव दिया तो वे भयभीत हो गईं। मैं अपने विद्यार्थियों को हर सत्र में अलग-अलग साथियों के साथ लैब में जाने को कहती थी, ताकि वे विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ काम करना सीखें।
उन दोनों में रोहिणी शांत स्वभाव की थी। वह बहुत प्रतिभाशाली थी, पेंटिंग और कढ़ाई का काम सुंदर तरीके से करती थी। अक्सर वह अपने और राधा के लिए एक जैसे कपड़े सिलती, जिससे लोग उन दोनों को बहन समझ लेते। उन दोनों के बीच इतना बढ़िया तालमेल था कि उन्हें कभी किसी और को दोस्त बनाने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई।
मैं उन दोनों को देखती और मुझे आश्चर्य होता कि बाद में इनकी दोस्ती का क्या होगा, खासतौर पर इनकी शादी के बाद। और ऐसा ही हुआ, पहले राधा की शादी हुई, उसका पति रमेश एक सिविल इंजीनियर था और वे दिल्ली चले गए। रोहिणी की शादी एक मैकेनिकल इंजीनियर सुरेश से हुई और वे बेंगलूर में बस गए। वह मुझे कभी-कभी मिलती और मैं उससे राधा के बारे में पूछती। समय बीतता गया और वे दोनों माँ बन गईं।
इस बीच मैं अपने काम में कुछ ज्यादा व्यस्त हो गई। मैं शहर के बाहरी इलाके में एक अनाथालय बनाना चाहती थी। एक दिन चालीस के आसपास का एक व्यक्ति मुझसे मिलने आया। उसने मेरे काम के लिए मुझे बहुत अच्छी दरें बताईं। उसके पास एक विस्तृत प्रस्ताव था, जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैंने उससे पूछा- 'तुम इतनी कम दर पर इतना सारा काम कैसे करोगे, क्या तुम्हें घाटा नहीं होगा।'
वह मुस्करा कर बोला- 'मैं ऐसा ही करना चाहता हूँ। ये कोई व्यापारिक प्रस्ताव नहीं है और न ही मैं इससे कोई लाभ कमाने जा रहा हूँ।' उसका उत्तर सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई और मैंने कहा- 'तो तुम एक समाजसेवक हो, युवा लोगों को सामाजिक कार्यों में रुचि लेते देखकर हमेशा अच्छा लगता है।'
वह बोला- दरअसल मेरा कोई बहुत नजदीकी चाहता है कि मैं इस काम को करूँ। मुझे नहीं पता आप उसे याद कर पाएँगी या नहीं, लेकिन वो अक्सर आपके बारे में बातें करती है। उसका नाम राधा है और वो मेरी पत्नी है। अब सब कुछ मेरी समझ में आ गया था, उसकी कंपनी का नाम भी 'राधा कंस्ट्रक्शंस था।'
मैंने कहा- 'बिलकुल, मुझे राधा अच्छी तरह याद है, लेकिन मैं सोचती थी कि तुम लोग दिल्ली में हो, क्या तुम लोग यहाँ आ गए हो?'
'दिल्ली में मैंने अपना काम छोड़ दिया और खुद की कंस्ट्रक्शन कंपनी शुरू कर दी। वो अच्छी चल रही है और अपना काम फैलाने के लिए मैं बेंगलूर आ गया। चूँकि राधा बेंगलूर आ रही है, अतः वह भी कुछ वर्ष यहाँ बिताना चाहती थी। यहाँ आने के तुरंत बाद उसने आपके काम और इस अनाथालय के बारे में पढ़ा, जो आप बनाना चाहती थीं। उसने ही मुझसे जल्दी एक मसौदा बनाकर आपसे मिलने को कहा। मैं राधा को मना कर ही नहीं सकता। मुझे आगे बढ़ाने में पत्नी का सदा संबल रहा।'
मैं उसकी कहानी सुनकर गदगद थी, क्योंकि वह अपनी सफलता का श्रेय मेरी एक पूर्व छात्रा को दे रहा था। मैंने उससे कहा- 'क्या तुम उससे कहोगे कि वह आकर मुझसे मिले।'
मैं मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही थी कि उसने अपने पति को यह काम बिना लाभ के करने को कहा। अगले दिन राधा मुझसे मिलने आई। वह कुछ उम्रदराज लग रही थी, लेकिन मुझे उसके चेहरे पर खुशी देखकर अच्छा लगा। किसी शिक्षक के लिए इससे बड़ा सुख कोई नहीं होता कि उसे अपना कोई पुराना छात्र जीवन में सफल और संतुष्ट मिले। इसी तरह बातचीत के बीच रोहिणी का नाम आया।
'तो क्या अब भी तुम लोग एक-सी साड़ियाँ पहनती हो। क्या तुम्हारे बच्चे भी इतने ही गहरे दोस्त हैं, जितने कि इस उम्र में तुम दोनों थी।' मैंने पूछा।
राधा एकदम शांत थी। यह मेरे लिए आश्चर्यजनक था।
उसने कहा- 'मैं नहीं जानती क्यों, मगर रोहिणी बदल गई है। मैं उसकी वजह से भी बेंगलूर वापस आने के लिए उत्सुक थी। वह मेरे लिए बिलकुल बहन जैसी थी और मैं जानती हूँ वह भी मेरे बारे में ऐसा ही सोचती थी। लेकिन पता नहीं कैसे चीजें बदल गई हैं, हमारी दोस्ती अब पहले जैसी नहीं रही।
रोहिणी बहुत बदल गई है। जब भी मैं उससे मिलने जाती हूँ वह बहुत विनम्रता से बातें करती है, लेकिन हमारे संबंधों की गर्माहट खो गई है। वह मुझसे अजनबी की तरह बात करती है, पुरानी दोस्त की तरह नहीं। मैंने कारण जानने की कोशिश भी की मगर कुछ नहीं हुआ।'
थोड़ी देर बात करके राधा चली गई। मुझे लगा कि मुझे रोहिणी से बात करनी चाहिए। उनकी शिक्षक होने के नाते मैं अब भी उन्हें अपनी छात्राएँ ही समझती थी। शिक्षक हमेशा इस भ्रम में रहते हैं कि उनके बच्चे उनकी बात मानेंगे। मैंने रोहिणी को बुलवाया। वह मेरे ऑफिस आई। उसे देखकर मैं चौंक गई। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ आ रही थीं और वह थकी हुई लग रही थी। मैंने उससे प्रसन्नातापूर्वक बात करनी चाही। 'अच्छा तो रोहिणी तुमने नया क्या पेंट किया है, क्या तुम्हें याद है- कैसे तुम हमेशा मुझे परेशान करती थी। मैं तुम्हें कढ़ाई करने के लिए अपनी साड़ी दूँ। कल राधा ने मुझे एक साड़ी दी है। क्या तुम उस पर कुछ बनाओगी?
'नहीं मैडम, मैंने वो सब कुछ बंद कर दिया है।' वह शांति से बोली।
क्या बात है रोहिणी, तुम कुछ तनाव में दिख रही हो। मुझे राधा से पता चला कि तुम लोगों की दोस्ती भी पहले जैसी नहीं है। क्या उसने किसी तरह तुम्हें दुःखी किया है।
नहीं, लेकिन अब मेरी और उसकी आर्थिक स्थिति में बहुत अंतर है। उसका पति अच्छा कमा रहा है, जबकि हमारे साथ अनेक आर्थिक कठिनाइयाँ हैं। मुझे नहीं लगता कि असमान स्तर के लोग दोस्त हो सकते हैं। चूँकि अब राधा अमीर है, वह मुझ पर दया दिखाती है।
'तुम ऐसा क्यों कह रही हो, क्या उसने कुछ कहा।'
'जब भी वह आती है मेरी बच्ची के लिए महँगे खिलौने लाती है और मुझे बहाने से सिल्क की साड़ियाँ देती है। वह जानती है मैं इसका बदला नहीं चुका सकती। शायद वह मुझे हेय समझती है। इसलिए मैंने दूरी बनानी शुरू कर दी है।'
मैं समझ चुकी थी, जबकि राधा को इसका अंदाजा भी नहीं था। मैंने रोहिणी को समझाया।
तुम्हें समझना चाहिए, सच्ची दोस्ती में स्टेटस आड़े नहीं आता। अगर राधा तुम्हारी बच्ची को सस्ते खिलौने देती तो तुम्हें लगता कि वो ऐसा तुम्हारे गरीब होने की वजह से कर रही है। यह समस्या राधा के करने से नहीं हुई है, बल्कि तुम चीजों को सोचती इस तरह हो।
तुमने कृष्ण और सुदामा की दोस्ती के बारे में तो सुना होगा। उनमें एक गरीब था तो दूसरा राजा। फिर भी उनकी दोस्ती चलती रही। राधा तुम्हें वो देती है जो वह दे सकती है, तुम भी उसे अपनी क्षमताओं के अनुसार कुछ दे सकती हो। जरूरी नहीं कि वह महँगा हो। तुमइतनी प्रतिभावान हो। तुम उसे पेंटिंग दे सकती हो या उसके बच्चों के लिए कपड़े सिल सकती हो। किसी भी उपहार के पीछे उसकी कीमत नहीं, देने वाले की भावना का महत्व होता है। इतनी पुरानी दोस्ती को हीनभावना में आकर नष्ट मत करो, राधा को एक मौका दो।
मैं तुम्हें बरसों पहले पढ़ी एक पंक्ति सुनाती हूँ, 'मैं रिश्तेदारों के साथ पैदा हुआ पर कम से कम अपने दोस्त तो चुन सकता हूँ।' और हम दोनों ठठाकर हँसे। रोहिणी खुश होकर घर गई। कुछ दिनों बाद मुझे धागे के खूबसूरत काम की साड़ी मिली। कार्ड पर लिखा था- 'राधा और रोहिणी की ओर से।'