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सुधा मूर्ति
सम्मान प्रायः उन्हीं लोगों को ही प्रदान किया जाता है जो सत्ता में होते हैं। वो इस सम्मान के लायक हैं या नहीं, इससे कोई सरोकार नहीं होता। सिर्फ उनकी ताकत की अहमियत होती है। जो सम्मान करते हैं वो सम्मानित होने वाले से कुछ अपेक्षाएँ भी रखते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि सम्मान होने ही नहीं चाहिए, क्योंकि हर शॉल और माला के नीचे एक प्रार्थना पत्र होता है।
इंफोसिस फाउंडेशन ने एक सरकारी अस्पताल के उपभवन का निर्माण किया। हॉस्पिटल एक छोटे शहर में था। गरीबों की मदद करने के अलावा हमारी फाउंडेशन की वहाँ कोई रुचि नहीं थी। वह बहुत पिछड़ा हुआ इलाका था। उद्घाटन समारोह अस्पताल परिसर में रखा गया था। मुख्यअतिथि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री थे। मैंने कार्यक्रम संयोजक से निवेदन किया कि कार्यक्रम सुबह रखा जाए, क्योंकि यदि देर हो जाती है, तब भी मैं गाड़ी चलाकर सुरक्षित लौट सकती हूँ। सुबह का कार्यक्रम मुख्य अतिथि के लिए सुविधाजनक नहीं था, इसलिए शाम 7 बजे का समयनिर्धारित किया गया।
मंच पर बहुत-सी कुर्सियाँ लगी थीं। वहाँ चमेली, गेंदा और चंदन की एक दर्जन से भी ज्यादा मालाएँ थीं। कई तरह की शॉलें और फलों की टोकरियाँ, जिनका वितरण किया जाना था, मंच पर रखी थीं। वहाँ एक डिब्बे में सिल्क की एक महँगी साड़ी भी रखी थी। यह स्पष्ट था किइन सारे इंतजामों पर उन लोगों ने बहुत धन खर्च किया था। जिस तरह के उत्थान कार्य में मैं लगी हूँ हम इस तरह की बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं रखते। जब वे हमारे काम के बारे में कुछ अच्छे शब्द कहते हैं, तो वही हमें संतुष्टि का एक एहसास देता है। यही शब्द हमें अगले काम के लिए प्रेरित करते हैं। इसका यह अर्थ भी है कि वे हमारे दान की कद्र कर रहे हैं। मैं बैठे-बैठे इसी बारे में सोच रही थी कि ये लोग कितने कृतज्ञ हैं। किस तरह वे हमारा सम्मान कर रहे हैं, क्योंकि हमने उनके लिए एक अस्पताल बनवाया। उनकी संस्कृति कितनी उदात्त है।
हवा ठंडी थी और भीड़ बढ़ रही थी। मंत्री एक घंटा देर से आए और लोग उनके पैर छूने के लिए जमा हो गए। कुछ लोग अर्जियों के साथ दौड़कर आ गए। जल्द ही वहाँ एक छोटा-मोटा दरबार-सा बन गया।
आखिरकार कार्यक्रम शुरू हुआ। मुझे मंच पर एक कोने वाली कुर्सी दी गई। वहाँ ऐसे अनेक भाषण चल रहे थे, जो ये बता रहे थे कि मंत्री कितने दक्ष हैं, उनका नेतृत्व कितना महान है, वे अपने से नीचे के लोगों का कितना ध्यान रखते हैं। उन सभी भाषणों में दान देनेवालों की पहचान या अस्पताल के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला गया। सब कुछ केवल मंत्री और सरकार के बारे में था।
इसके बाद मंत्री महोदय भवन के उद्घाटन के लिए उठे। उन्होंने बोलना शुरू किया, लोकतंत्र में उनका बहुत भरोसा है और वे अपने लोगों की बहुत चिंता करते हैं। वे अस्पताल में यह उपभवन चाहते थे क्योंकि वे लोगों के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि वे अभी भी खुश नहीं हैं, क्योंकि अस्पताल में और अधिक सुविधाओं की आवश्यकता है। इसके बाद उन्होंने मुड़कर मेरी ओर देखते हुए कहा 'मैडम हम पंखे, पलंग, आलमारी, बिछौने और पीने के पानी की सुविधा भी पूरे अस्पताल के लिए चाहते हैं। निश्चय ही आप लोग यह प्रदान करने में समर्थ हैं। मुझे भरोसा है कि हमारे लोग इनका सही-सही इस्तेमाल करेंगे।'
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया।
इसके बाद कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण चरण आया। उन लोगों का सम्मान, जिन्होंने भवन निर्माण में सहयोग किया था। इसके बाद राष्ट्रगान हुआ। कार्यक्रम समाप्त हो गया। मंत्री अपनी कार की ओर बढ़े। हर कोई उनके पीछे दौड़ने लगा। जल्द ही पूरा स्थान वीरान हो गया। कुचले हुए फूल मंच के आसपास फैले थे। पांडाल को छोड़कर, बाहर गहरा अँधेरा था। मैं एक मुरझाई हुई माला और पर्स लिए खड़ी थी। मैं बिलकुल अकेली थी, जैसे फुटबॉल मैच के बाद गोलपोस्ट।
मेरे सामने हमारे फाउंडेशन द्वारा बनाई गई रोशन इमारत खड़ी थी। मैं अकेली नहीं थी, जिसने इसके लिए मेहनत की थी। इसमें आर्किटेक्ट, ट्रस्टी और कई अन्य लोग भी शामिल थे, जिनमें से एक का भी नाम उस दिन नहीं लिया गया था। वहाँ उनके लिए या हमारी फाउंडेशन के लिएकोई समय नहीं था। मैं एक अनचाहा मेहमान थी, जिसे औपचारिकता निभाने के लिए बुलाया गया था।
उस पूरी शाम मैं एक अजीब-सी निराशा महसूस करती रही। मुझे आश्चर्य था कि क्यों उनमें एक औरत के प्रति साधारण सौजन्य भी नहीं था। खासतौर से उस औरत के लिए, जो बहुत दूर की एक चैरिटेबल संस्था की प्रतिनिधि थी। 'इन्हें देखो जरा', मैंने अपने आप से कहा। स्वास्थ्य मंत्री ने समय, धन या स्रोत किसी तरह का योगदान उपभवन को बनाने में नहीं दिया था। वे भवन निर्माण के बारे में जानते तक नहीं थे। लेकिन उस समारोह में किसी नायक की तरह उनका सम्मान और गुणगान किया गया था। सबसे ज्यादा मालाएँ उन्हें ही पहनाई गई थीं॥ यह केवल राजनीति थी या नैतिक भ्रष्टाचार?
मैंने खुद को याद दिलाया कि हमारे काम का मुख्य उद्देश्य मंत्रियों, राजनीतिज्ञों, अमीरों या ताकतवर लोगों को खुश करना नहीं है। हमारा हर प्रयास दुःख झेल रहे अनेक लोगों की स्थिति में सुधार की ओर केंद्रित था। मंत्री नहीं, बल्कि निर्धन, असहाय लोग हमारे लिए ज्यादा मायने रखते हैं।
मेरी निराशा बहुत देर तक टिकी नहीं रही। एक बूढ़ी औरत तार-तार हो रहे कपड़ों में मुझ तक आई और बोली, 'अम्मा, किसी ने मुझसे कहा है कि आपकी कंपनी ने यह भवन बनवाया है। हम आपके बहुत एहसानमंद हैं। हम जैसे बहुत लोग जगह न होने की वजह से बड़े अस्पतालों में दाखिल ही नहीं हो पाते थे। लेकिन आपने हमें एक सामान्य जगह दे दी है। विशेष कक्ष तो ऊँची साख वाले लोगों को ही मिल पाते हैं। हम जैसे लोगों के लिए तो सामान्य हॉल ही अच्छे हैं।'
यह कहकर उसने एक कदम आगे बढ़ाया और मेरे नजदीक आ गई, और बोली, 'मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। मैं फूल बेचने वाली हूँ। मैं शॉल या साड़ी नहीं खरीद सकती। लेकिन, मैं आपको चमेली का यह गजरा दे सकती हूँ। मैं भगवान से प्रार्थना करूँगी किआप जैसे बहुत से लोग हमारे देश में पैदा हों।'
चमेली का वह गजरा मेरे लिए सारी शॉलों और फलों की टोकरियों से कहीं ज्यादा मूल्यवान था।