सुधा मूर्ति
मेरी दीदी सरकारी अस्पताल में एक डॉक्टर थीं। वे घंटों काम करती रहती थीं। कभी-कभी रात के समय भी उन्हें काम करना पड़ता था। सरकारी अस्पताल में विभिन्न प्रकार का इलाज मरीजों के लिए मुफ्त में उपलब्ध है। एक बार रात्रि के समय अस्पताल में उन्होंने विभिन्न मरीजों के ऑपरेशन किए और थककर देर से घर लौटीं। जब वे घर पहुँची तब अस्पताल से फोन आया कि एक और मरीज आपात स्थिति में है। ऑपरेशन करना पड़ेगा।
इस खबर को सुनते ही वे तुरंत अस्पताल जाने की तैयारी करने लगी। अचानक मेरी नजर उनके थके-माँदे चेहरे पर पड़ी। मैंने कहा, मैं मानती हूँ कि मरीज डॉक्टरों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। आखिरी चौबीस घंटे तुमने अस्पताल में मरीजों का इलाज किया है। तुम भी इंसान हो, तुम्हें भी आराम की सख्त जरूरत है। क्या तुम किसी और को इस ऑपरेशन के लिए नहीं कह सकती। थोड़ी देर के लिए तुम आराम कर लो।
वह मुस्कुराकर बोली, मैं इस हालत में नहीं हूँ। मेरे साथ अन्य चिकित्सक हैं, जो मेरी ही तरह काम करते हैं, उन्हें भी आराम की जरूरत होती है। मैं अस्पताल में सबसे वरिष्ठ चिकित्सक हूँ, इसलिए मुझे अपने चिकित्सक दल का मार्गदर्शन करना होगा। लोगों की भलाई के लिएअपने निजी दर्द को त्यागकर मरीजों का इलाज करना पड़ेगा। क्या तुम वह 'संवेदनहीन' की कहानी भूल गई हो? यह कहकर वह चली गई। उसने कहा- तब मुझे वह कहानी याद आई। कुछ साल पहले दीदी ने ही मुझे यह कहानी सुनाई थी। यह एक अनोखी कहानी है। पिता और पुत्र दोनों चिकित्सक थे। पिता बहुत ही आधुनिक विचारों वाले प्रसिद्ध चिकित्सक थे।
उन दिनों किसी मरीज की शल्य चिकित्सा करना पड़े तो उसे बेहोश करने के लिए क्लोरोफार्म सुँघाया जाता था। इस विधा के वरिष्ठ चिकित्सक ने कई प्रयोग किए एवं दवाइयों का निर्माण किया। परिणामस्वरूप वे इस नतीजे पर पहुँचे कि विभिन्न रासायनिक मिश्रण से एक उपयोगी दवा बन सकती है। इंसान पर प्रयोग किए बिना और सरकारी अनुमति के बिना यह दवा बाजार में नहीं लाई जा सकती थी। उस दवा से मरीज को बेहोश किए बिना शल्यक्रिया की जा सकती थी।
वरिष्ठ चिकित्सक के पुत्र के हाथ में 6 उँगलियाँ थीं। एक दिन उसने अपने पिता से कहा कि पिताजी मैं जानता हूँ कि आपकी नई दवाई बहुत अच्छी है। शल्य चिकित्सा के माध्यम से इस छठी उँगली को अलग कर दीजिए। वैसे भी मैं इस उँगली से मुक्त होना चाहता हूँ, परंतु यह चिकित्सा अन्य चिकित्सक के सामने होगी। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इस शल्य चिकित्सा का दर्द सहन नहीं कर पाता है। जब शल्यक्रिया के दौरान लोग मेरा चेहरा देखेंगे तब उन्हें पता चलेगा कि सिर्फ शल्य चिकित्सा वाले स्थान पर हाथ सुन्ना हो गया है एवं शल्यक्रिया के दौरान हाथ में कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा है। पुत्र का सुझाव सही था।
पिता ने यह संदेशा अकादमी ऑफ मेडिकल साइंस को भेजा।
शल्य चिकित्सा की तारीख नजदीक थी। उस दिन प्रतिष्ठित चिकित्सक, वैज्ञानिक तथा अन्य प्रमुख लोग इस जादुई दवा का असर देखने के लिए एकत्रित हुए। प्रक्रिया के प्रारंभ में पिता ने पुत्र की छोटी उँगली को प्रदर्शित किया तथा निश्चित स्थान पर सुई से चमत्कारी दवा डाल दी थी।
पिता ने कहा- मैं शल्यक्रिया प्रारंभ करूँगा। आप मरीज के चेहरे का अवलोकन कर सकते हैं। शल्यक्रिया के दौरान उसके चेहरे पर मुस्कान छाई रही। उपस्थित सभी व्यक्ति उसकी सफल शल्यक्रिया को देखकर दंग रह गए। प्रशासक उन्हें बधाई दे रहे थे। सभी के चले जाने के बाद पुत्र अपने घाव को पट्टी से ढँककर सुरक्षित कर रहा था। उसके पिता की आँखों में आँसू झलक रहे थे।
उन्होंने अपने बेटे को गले से लगा लिया था। पिता ने कहा कि बेटा मुझे माफ कर दो। शल्यक्रिया के दौरान मुझे पता चल गया था कि तुम किस पीड़ा से गुजर रहे हो। मेरा परिश्रम विफल न जाए इसलिए तुमने अपनी पीड़ा को अपने चेहरे पर प्रकट नहीं होने दिया। उस दवाई में चार रासायनिक पदार्थ मिलाना भूल गया था।
शल्यक्रिया के दौरान पुत्र अत्यंत पीड़ा से गुजर रहा था। पुत्र को समझ में आ गया था कि उसके पिता दवा में कुछ रासायनिक पदार्थ मिलाना भूल गए हैं, लेकिन अगर पुत्र अपनी वेदना मुख पर प्रकट करता तो उसके पिता का प्रयोग निरर्थक हो जाता। वह यह भी जानता था कि दवाई को विकसित करने के लिए उसके पिता ने कठिन परिश्रम किया था। वह यह भी जानता था कि वह दवाई अत्यधिक प्रभावशाली है। दुर्भाग्यवश किसी कारण से वह दवाई असर नहीं कर पा रही है।
शल्य चिकित्सा के दौरान पिता को ज्ञात हुआ कि उसका बेटा अत्यंत पीड़ा से गुजर रहा था। उन्हें पता चला कि दवाई में चौथा रासायनिक पदार्थ नहीं मिलाया गया था। इसी कारण वह दवाई काम नहीं कर रही थी। वह आम जनता के सामने कुछ भी नहीं कह पा रहे थे। पिता समझ गए कि पुत्र किस वेदना से गुजर रहा, जबकि उसके चेहरे पर मुस्कुराहट छाई हुई थी। इसलिए जब सब लोग चले गए तो वे रोने लगे।
पुत्र ने अपने पिता से कहा कि पिताजी आप मेरी चिंता मत कीजिए। मैंने यह पीड़ा दूसरों के लिए ही सहन की थी। मैं जानता हूँ कि यह बात वाकई सच है। दीदी एवं उनके सहयोगियों को अपने कार्य के प्रति समर्पित देखकर मुझे लगा कि मेडिकल क्षेत्र में कितने ऐसे लोग हैं, जो स्वयं की परवाह नहीं करते और अपने हितों की कुर्बानी दे देते हैं?