Woman Special %e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80 %e0%a4%95%e0%a4%be %e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%aa 107101500077_1.htm

Festival Posters

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

धरती का अभिशाप

Advertiesment
हमें फॉलो करें लैप्रसी पीड़ित व्यक्ति समाज बहिष्कृत
-सुधा मूर्ति

webdunia
NDND
लैप्रसी यानी कुष्ठ। यह शब्द ही बहुत से लोगों को डराता है। एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में लेपर' शब्द से जुड़े भयावह संकेतों की वजह से इस शब्द के उपयोग को कम करने का निर्णय लिया गया। जब हम कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति के बारे में सोचते हैं तो हमें हाथ-पैर की कुछ गलियाँ गँवा चुके भिक्षुक का ख्याल आता है।

लैप्रसी से पीड़ित लोगों को अक्सर ही समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिया जाता है। इस भयावह बीमारी को लेकर कई भ्रम हैं। जैसे कि यह एक छूत की बीमारी है, यह आनुवंशिक होता है या और भी बहुत कुछ। यह सब केवल भ्रम है। वास्तव में हर तरह की लैप्रसी संक्रामक नहीं होती है। यदि प्रारंभिक अवस्था में ही ठीक-ठीक इलाज किया जाए तो इसका पूरी तरह उपचार किया जा सकता है। बीमारी का कोई भी निशान शरीर पर छोड़े बगैर यह पूरी तरह ठीक हो सकता है। आमतौर पर इसके उपचार में बहुत अधिक समय लगता है। इसके लिए धैर्य और परिवार के सहयोग की आवश्यकता होती है। अज्ञानता की वजह से लोग शुरुआत में इसके लक्षणों की ओर ध्यान नहीं देते। इस वजह से प्रारंभ में ही इसकी पहचान नहीं हो पाती। यद्यपि मीडिया में इस बीमारी के लक्षणों को पहचानने से संबंधित बहुत से विज्ञापन आ रहे हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इसकी तनिक भी परवाह नहीं करते। हम हमेशा सोचते हैं कि लैप्रसी ऐसी समस्या है, जो दूसरों को प्रभावित करती है, हमें नहीं। हम भूल जाते हैं कि बीमारी ऊँच-नीच नहीं जानती। यह अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष किसी में भी फर्क नहीं करती। लैप्रसी एक ऐसी बीमारी है, जो सदियों से मानव सभ्यता में व्याप्त है। जिस संस्था से मैं जुड़ी हूँ, उसके कार्यक्रमों में से एक लैप्रसी से पीड़ित लोगों की मदद करना है। इस क्षेत्र में अलग-अलग सिद्धांत हैं। कुछ लोग मानते हैं कि ऐसे रोगी को परिवार के साथ रहना चाहिए तो कुछ का मानना है कि इन्हें अलग स्थान पर रखना चाहिए।

मैं एक पिछड़े हुए क्षेत्र में काम कर रही थी, जहाँ लैप्रसी से पीड़ित लोगों के लिए अलग कॉलोनी थी। भीषण गर्मी के दिन थे, और तापमान को सहन करना मुश्किल हो रहा था। कॉलोनी का दृश्य बेहद निराशाजनक था। अंदर रहने वाले लोग बीमारी और दुःख से बुरी तरह त्रस्त थे। वे सभी गरीब और असहाय थे। उन्हें भावनात्मक और भौतिक सहयोग की आवश्यकता थी। यहाँ तक कि सहानुभूति प्रकट करने वाले शब्दों, चिंता मत करो, तुम्हारी मदद के लिए हम हैं, की भी। इतना भर कहना भी उनके लिए बहुत मायने रखता था।

हमारे प्रोजेक्ट का उद्देश्य दया दिखाकर धन देना नहीं था। हम उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। यदि वे कुछ सीमित कार्य कर अपनी आजीविका अर्जित कर सकें तो हम उनकी आर्थिक सहायता करने के लिए तैयार थे। उनके अंदर आत्मविश्वास जगाने के लिए हमें यही तरीका उचित लगा था। जब किसी व्यक्ति में आत्मविश्वास होता है तो वह समाज का सामना कर सकता है। समाज की स्वीकार्यता और आर्थिक स्वतंत्रता इन लोगों की जिंदगी बदल सकती है।

कॉलोनी में बहुत-सी झोपड़ियाँ थीं। हर झोपड़ी में एक परिवार रहता था। हर परिवार में कम- से-कम एक व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित था। मौसम बहुत खराब था, लेकिन मुझे हर झोपड़ी में जाकर अपना काम करना था। औरतें मुझे अपनी परेशानियाँ बता रही थीं। काम पाने में असमर्थता उनके लिए सबसे दुखदायक बात थी। इस बीमारी के चलते घरेलू नौकर का काम भी उन्हें नहीं मिल रहा था। उनमें से बहुत तो खुद को भाग्य के सहारे छोड़ चुके थे। दोपहर होने के बावजूद युवक सो रहे थे। बच्चे धूल में खेल रहे थे। बुजुर्ग बहुत दयनीय अवस्था में थे। जब उम्र के तकाजे के साथ लैप्रसी जैसी बीमारी की परेशानी और सामाजिक बहिष्कार का दुःख शामिल हो तो लोग आत्महत्या की ओर भी प्रवृत्त हो सकते हैं।

वहाँ टूटी हुई छत की एक झोपड़ी थी, जिस पर नाममात्र का बाँबू का बना दरवाजा था। उस कॉलोनी की सबसे बुजुर्ग औरत वहाँ रहती थी। उसका नाम वीरम्मा था। मैंने उसे पुकारा और बाहर आने के लिए कहा। वह नहीं आई। मैंने सोचा, हो सकता है वह थोड़ा ऊँचा सुनती हो, इसलिए मैंने सोचा कि अंदर जाकर उसके साथ बात करना बेहतर होगा। मैंने बहुत सावधानी से दरवाजे पर दस्तक दी कि कहीं मेरी दस्तक से वह नाममात्र का दरवाजा नीचे न गिर पड़े। वह अब भी नहीं आई, न ही कोई प्रतिक्रिया ही दी। मैंने धक्का देकर दरवाजा खोला और अंदर चली गई।

छत पर बने सुराखों में से हवा और प्रकाश अंदर आ रहे थे। वहाँ मिट्टी के दो-तीन मटके और एक मिट्टी की थाली रखी थी। तीन पत्थरों से
मैंने अपने काम के दौरान कई गरीब और अभावग्रस्त क्षेत्रों को देखा और मैं बहुत से गरीब लोगों से मिली थी, लेकिन आज पहली बार किसी औरत को इस तरह देखा। यह उस अमानवीय गरीबी का चित्र था, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ सालों के बाद भी हमारे देश में व्याप्त है
webdunia
बना चूल्हा और एक फटी हुई दरी, जमीन पर दो-तीन प्याज और एक पानी का पात्र था। अभी तक मैं झोपड़ी के अंदर वीरम्मा को नहीं देख सकी थी, लेकिन उसकी साँसों की आवाज सुनाई पड़ रही थी। मैं तेज धूप से झोपड़ी के अंदर घुसी थी। इसलिए अंदर के अँधेरे के साथ सामंजस्य बिठाने में मेरी आँखों को थोड़ा समय लगा।

मैंने एक बार उसे प्रेम से पुकारा, 'वीरम्मा, मैं तुमसे बात करना चाहती हूँ। कहाँ हो तुम? उसने उत्तर दिया, 'अम्मा, मैं यहाँ हूँ। मेरे नजदीक मत आना।'

तब मैंने कमरे के एक कोने में एक कमजोर-सी औरत को देखा। उसकी पूरी त्वचा सिकुड़ गई थी। शरीर पर तनिक भी मांस नहीं था। वह त्वचा से ढँका हुआ कंकाल मात्र रह गई थी। वह एक कोने में अपने दोनों हाथ छाती पर रखकर बैठी थी। उसके पैर भी उसकी छातियों को ढँके हुए थे।

'अम्मा', वह बुदबुदाई, 'मुझे पता है, आपने मुझे कई बार पुकारा, लेकिन मैं बाहर आकर आपसे बात नहीं कर सकती थी। मैं एक औरत हूँ। भले ही मेरी उम्र कुछ भी हो, मैं दूसरों के सामने निर्वस्त्र कैसे आ सकती हूँ?'

इसके बाद ही मैं समझ सकी कि वह लगभग पूरी तरह निर्वस्त्र थी। मैंने अपने काम के दौरान कई गरीब और अभावग्रस्त क्षेत्रों को देखा और मैं बहुत से गरीब लोगों से मिली थी, लेकिन आज पहली बार किसी औरत को इस तरह देखा। यह उस अमानवीय गरीबी का चित्र था, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ सालों के बाद भी हमारे देश में व्याप्त है। एक बूढ़ी औरत अपने शरीर तक को ढँक नहीं सकती है। फिर भी उसे किसी बात की कोई शिकायत नहीं है। मैं छः गज की साड़ी पहनने पर मन ही मन अपराधबोध महसूस कर रही थी।

एक मिनट तक मुझे उससे बात करने में भी शर्म आ रही थी। मैंने जो देखा उस आघात ने मुझे यह तक भुला दिया कि हमारी नीति पैसा या सामग्री दान करने की नहीं है। इस स्थिति का तत्काल निदान जरूरी था। मैंने इस कॉलोनी की सभी औरतों को बाँटने के लिए अपने ड्राइवर को सौ साड़ियाँ खरीदने के लिए भेजा। चाहे उनका पुनर्स्थापन न हो सके, लेकिन एक औरत के लिए तन ढँकने लायक न्यूनतम कपड़े की आवश्यकता को पूरा करने के लिए इंतजार नहीं किया जा सकता था। इस तरह के प्रयास उन लोगों की जिंदगी में बहुत बड़ा फर्क तो नहीं ला सकते हैं, लेकिन उस दुःखद बदकिस्मती को देखने के बाद हमें तत्काल यह कदम उठाना ही पड़ा।

हम लोगों को जिन पर भगवान की बहुत कृपा है, गरीब से गरीब व्यक्ति की जितनी हो सके, उतनी मदद करनी ही चाहिए। जो बिना किसी गलती के अभिशाप भुगत रहे हैं।

भारत का अर्थ केवल तकनीक, फैशन, फिल्म या सौंदर्य प्रतियोगिताएँ ही नहीं है। असली भारत अँधेरे और उपेक्षा में देश के अंदरूनी हिस्सों में स्थित है। असहाय और बदकिस्मत गरीब लोग किसी भी सरकारी विभाग की पहुँच से बहुत दूर हैं। देशसेवा करने का मतलब है ऐसे गरीबों की सेवा करना।

कुष्ठ रोगियों की उस कॉलोनी को देखने के बाद मैंने अपने हर प्रवास पर कम-से-कम दस साड़ियाँ अपने साथ रखने का फैसला किया।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi