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परोपकार का व्यापार

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सुधा मूर्ति
- सुधा मूर्ति

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श्री हीरालाल जैन एक सफल दवा निर्माता और व्यापारी थे। एक दिन वे मुझसे मिलने आए। कुछ देर तक हमने अपनी कई परियोजनाओं और उनकी शुरुआत के बारे में बात की। उसके बाद उन्होंने अपने बारे में बात करना शुरू कर दी। 'मिसेज मूर्ति, ईश्वर मेरे प्रति दयालु रहा है।

हमारी कंपनी का काम अच्छा चल रहा है और हम लगातार नए उत्पाद बाजार में उतारने की स्थिति में हैं। परिणामस्वरूप हमारे पास एक विशाल श्रृंखला है। मेरा एक ही बेटा है, जो विदेश में पढ़ाई कर रहा है। मुझे यकीन है कि अपनी पढ़ाई पूरी करके वह मेरे काम में हाथ बँटाएगा। एक बात है, मुझे लगता है मैंने समाज को उस व्यापक पैमाने पर वापस कुछ नहीं दिया। यही वजह है कि आज मैं आपके पास एक अनुरोध के साथ आया हूँ।'

'मैं आपको कुछ सामान्य जरूरत की दवाइयाँ देना चाहता हूँ ताकि आप उन्हें गरीब लोगों में बाँट सकें। आप उन गंदी बस्तियों में सहायता के लिए एक डॉक्टर भी नियुक्त कर सकती हैं। मैं उसकी तनख्वाह भी दूँगा और मुफ्त दवाएँ भी उपलब्ध कराऊँगा।'
  श्री हीरालाल जैन एक सफल दवा निर्माता और व्यापारी थे। एक दिन वे मुझसे मिलने आए। कुछ देर तक हमने अपनी कई परियोजनाओं और उनकी शुरुआत के बारे में बात की। उसके बाद उन्होंने अपने बारे में बात करना शुरू कर दी। 'मिसेज मूर्ति, ईश्वर मेरे प्रति दयालु रहा है।      


मैं उनकी बातों से प्रभावित हुई। मैंने कहा, 'आपका प्रस्ताव तो कमाल का है, लेकिन हमारे पास पहले से ही कुछ डॉक्टर हैं, जो हमारे प्रोजेक्ट पर अंशकालिक रूप से काम कर रहे हैं। मैं उनसे बात करूँगी और कहूँगी कि वे उन दवाओं की सूची तैयार करें जिनकी जरूरत है। मैं हर माह आपको वह सूची भिजवा दूँगी और नियत समय पर आपके ऑफिस आकर दवाएँ ले लूँगी।'

'नहीं-नहीं, आपको आने की जरूरत नहीं है, मैं उन्हें आप तक भिजवा दूँगा। लेकिन मेरी एक शर्त है।' मैं चिंतित हुई, मुझे जानना चाहिए था। मुफ्त में कोई कुछ नहीं देता। हीरालाल जैन ने कहा- 'किसी को यह पता नहीं चलना चाहिए कि मैं इस काम से जुड़ा हूँ। मैं नहीं चाहता कि कहीं भी मेरा या मेरी कंपनी का नाम सामने आए। मैं बिना प्रचार के कुछ देने का आनंद उठाना चाहता हूँ। मैं एक अनजान दानकर्ता बना रहूँ।'
यह एकदम अप्रत्याशित अनुरोध था। आमतौर पर दान देने के लिए आने वाले लोग पहले से ही मीडिया वक्तव्य तैयार रखते हैं। वे सबसे कम राशि देते हैं, लेकिन उन्हें सुनकर ऐसा लगता है मानो उन्होंने ही सारा खर्च उठाया हो।

मैं उनके प्रस्ताव पर तुरंत तैयार हो गई। यह तय हुआ कि हर महीने उनका हेडक्लर्क करीम जरूरी दवाओं के बक्से के साथ आएगा। उनकी डिलीवरी वैन हमारे ऑफिस के पास कुछ फुटकर दुकानों तक आती और हमारी जरूरत की आपूर्ति की जाती। शुरुआत में हीरालाल ने 10 हजार रु. कीमत की दवाएँ दान में दीं, जो धीरे-धीरे 50 हजार तक पहुँच गईं

उन्होंने हमें अपनी पुरानी फिएट कार दे दी थी ताकि चिकित्सक आसानी से मलिन बस्तियों की यात्रा कर सकें, लेकिन हमारी मुलाकात बहुत मुश्किल से हो पाती। जब भी मैं उन्हें धन्यवाद देने के लिए बुलाती, वे मुझे मेरा समय न बरबाद करने को कहते। जब मैं उन्हें अपने मेडिकल कैम्पों की तस्वीरें भेजतीं तो वे कहते कि उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। उन्हें हम पर भरोसा था। बरसों बीत गए।

एक सुबह मुझे खबर मिली कि सोते हुए ही उनका देहांत हो गया। उन्हें अंतिम सम्मान देने मैं ऑफिस गई। सहसा मुझे महसूस हुआ कि इतने वर्षों में मैं पहली बार उनके ऑफिस आई हूँ। यह सुंदर और सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ था। मैंने सफेद कपड़ों में एक सुंदर युवक को देखा। उसकी आँखें लाल और सूजी हुई थीं। हेडक्लर्क करीम ने फुसफुसाकर कहा- 'ये साकेत साहब हैं, अभी-अभी अमेरिका से लौटे हैं।'

मुझे पता चला कि साकेत ने अमेरिका में एमबीए किया है और कुछ वर्षों से वहीं काम कर रहा था। अब वह लौट आएगा और व्यापार संभालेगा। दिन बीतते गए और दो महीने तक हीरालाल की कंपनी के साथ हमारा काम ठीक चलता रहा। दवाओं के पार्सल हम तक समय से पहुँचते रहे, लेकिन तीसरे महीने ऐसा नहीं हुआ। मैंने सोचा कि बात करने से पहले मैं थोड़ा इंतजार कर लूँ। फिर भी कोई लक्षण नजर नहीं आने पर मैंने हीरालाल के ऑफिस फोन लगाया। मुझे कुछ देर लाइन पर रहने के बाद कहा गया कि साकेत अगले दिन सुबह नौ बजे अपने ऑफिस में मिलकर मुझसे प्रसन्ना होंगे।

मैं 8.45 पर ही वहाँ पहुँच गई और परिवर्तनों को देखकर मुझे झटका लगा। पुराना सादा स्वरूप गायब था। एक युवती मुझे बैठक में ले गई और चाय-कॉफी के लिए पूछा। हॉल में हीरालाल जैन का एक बहुत बड़ा-सा चित्र लगा था। जल्द ही 9 बज गए और मैं साकेत के ऑफिस की ओर चल पड़ी, लेकिन रिसेप्शनिस्ट ने मुझे रोक दिया- 'माफ कीजिए, साकेत सर एक बिजनेस कार्यकारी के साथ बात कर रहे हैं और इसमें 10 मिनट का समय और लग सकता है। कृपया इंतजार कर लीजिए।' मैंने इंतजार किया।

जब 9.45 हो गए तो मुझे लगा कि अब बहुत हो गया। मैंने उससे कहा कि मैं जा रही हूँ। उसने इंटरकॉम पर बात की और अंततः मुझे भीतर भेज दिया। जब मैं अंदर गई तो मैंने देखा वह बिजनेस कार्यकारी अब भी वहाँ था। साकेत ने उससे आँखों-आँखों में क्षमा-याचना की और 5 मिनट के लिए मुक्त हुआ। वह मेरी ओर मुड़ा और सीधे मतलब की बात की।

मैं पुराने रिकॉर्ड देख रहा था। मेरे पिता ने गुप्त रूप से आपको ढेर सारा धन दिया है। मुझे लगता है वह गलती थी और धन की बरबादी हुई है। मैं अपना संबंध बनाए रखना चाहता हूँ, लेकिन कुछ नई शर्तों पर। जब भी आप कोई कैम्प आयोजित करती हैं तो हमारी कंपनी और मेरा नाम प्रमुखता से आना चाहिए। हर माह आपको दवाइयाँ ले जाने के लिए किसी को भेजना होगा। मैं आपको सिर्फ वही दवाएँ दे सकता हूँ, जो हमारे संग्रह से अधिक हों, वे नहीं जो आप चाहती हैं। साल में कम से कम एक बार आप हमारे कर्मचारियों को संबोधित करेंगी और हमारे दान के बारे में बताएँगी। आखिर परोपकार व्यापार में उन्नति की कुंजी है।इस बीच 5 मिनट खत्म हो गए थे और मैं खड़ी हो गई।

नम्रता से मैंने कहा- 'धन्यवाद, लेकिन मैं सहमत नहीं हूँ। मैं आपकी अतिरिक्त दवाओं के लिए अतिरिक्त बीमारियाँ नहीं पैदा कर सकती हूँ। सालों तक आपके पिता ने हमारा जो सहयोग किया, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूँ। शर्तें उनकी पसंद की थीं और हमने उनका सम्मान किया। अब जबकि हमारा संबंध समाप्त हो रहा है, मैं कहना चाहती हूँ कि व्यापार और परोपकार को मत मिलाइए। वरना आप दोनों में से किसी के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे। आपके पिता इसे समझते थे। शायद किसी दिन आप भी समझेंगे।'

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