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मैं भी इंसान हूँ

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जन्मदिवस समारोह भव्यता फुटपाथ
-सुधा मूर्ति

NDND
हाल ही में मुझे सालभर के बच्चे के जन्मदिवस समारोह में जाना था। समारोह बहुत भव्यता से एक पाँच सितारा होटल में आयोजित किया गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इतने छोटे बच्चे को उपहार में क्या देना चाहिए। मैं अपनी सहेली के साथ गई। आजकल तोहफे लेना और देना एक बहुत बड़ा काम हो गया है। एक नया समीकरण ईजाद हो गया है। आपका तोहफा, आपकी समृद्धि के अनुसार होना चाहिए। उपहार का असली अर्थ जो प्यार और स्नेह का प्रतीक होता है, वह बदल गया है।

एक साल के बच्चे के लिए, मेरे मन में एक ही उपहार देने योग्य वस्तु थी, एक कटोरी और चम्मच जिसमें वह खाना खा सके। जब मैंने स्टोर से इन्हें खरीदा, मेरी सहेली हँसने लगी और बोली- 'तुम मुश्किल में पड़ जाओगी। लोग तुमसे एक बड़े तोहफे की उम्मीद रखते हैं।खरीदने से पहले इस बारे में सोचो।'

हम होटल गए। हर वह व्यक्ति जो शहर में थोड़ी भी पहचान रखता था, उस समारोह में आमंत्रित था। वहाँ बच्चे, बड़े और बुजुर्ग सभी थे। वहाँ सोसायटी की औरतें और व्यापारी थे। काँचीपुरम, पटोला और शिफॉन के साथ मैचिंग हीरे हर तरफ दिख रहे थे। जिस बच्चे का जन्मदिन था, वह रो रहा था। उसने जो कपड़े पहने थे वह उन कपड़ों में असहज महसूस कर रहा था और उसे पहनाए गए सोने के आभूषण उसे चुभ रहे थे। चमकीली, अपरिचित रोशनियाँ उसे डरा रही थीं। मैंने बच्चे को दिए गए तोहफे देखे। उनमें चाँदी का सामान, सोने की चेन, नकद और यहाँ तक कि एक लैपटॉप कम्प्यूटर भी था। बहुत से लोग, जिन्हें मैं नहीं जानती, मेरे पास आकर अपनी 'संस्थाओं से संबंधित परेशानियाँ बता रहे थे। हर किसी का एक ही सवाल था; 'आपके पास कब समय है, क्या मैं आपसे आकर मिल सकता हूँ? हम पैसा नहीं चाहते, हम सिर्फ आपका मार्गदर्शन चाहते हैं। अनुभव ने मुझे सिखा दिया है कि कोई भी पहली मुलाकात में धन पाने की इच्छा नहीं जताता। पहली मुलाकात में अधिकतर लोग मुझसे अलग-अलग विषयों पर मार्गदर्शन माँगते हैं, जिनका मुझसे कोई संबंध नहीं होता। जैसे अपनी बेटी के लिए उचित वर या बेटे के लिए नौकरी।

वे विभिन्न तरह की सहायता चाहते हैं। उनकी संस्था के लिए नकद राशि या किसी और रूप में। यदि और कुछ नहीं तो मुझे किसी समारोह को संबोधित करने के लिए बुलाना चाहते हैं। ऐसे समय मुझे जोर से चिल्लाने की इच्छा होती है,'मुझसे मशीन की तरह व्यवहार मत करो, जिसका उपयोग तुम अपने लाभ के लिए कर सकते हो। मुझसे इंसानों की तरह व्यवहार करो।' कुछ समय बाद किसी काम के सिलसिले में मैं अहमदाबाद में थी। वहाँ की लॉ गार्डन रोड, लव गार्डन क्षेत्र के रूप में जानी जाती है। वहाँ की दुकानें छोटी, मगर बहुत रंगीन हैं।वे गुजरात की हस्तकला से बनी वस्तुएँ बेचते हैं। एक शाम मैं अपनी सहेली के साथ उसी क्षेत्र में घूमने के लिए गई। जब मैं सड़क पर जा रही थी, काँच का काम किया हुआ एक सुंदर-सा पर्स मेरी आँखों को भा गया। मैंने उसे पसंद किया और दुकानदार से उसकी कीमत पूछी। वह दुकान एक नौजवान दंपति की थी, जिनकी शादी शायद दो या तीन साल पहले हुई हो। वह युवती सुंदर, स्वस्थ थी और उसकी मुस्कान भी खूबसूरत थी। उसने एक साधारण-सी सूती साड़ी पहन रखी थी। एक काले मोतियों की माला और काँच की चूड़ियों के अलावा उसने कोई आभूषण नहीं पहना था। अगर एक औरत स्वस्थ और हँसमुख हो तो वह बिना गहनों के भी खूबसूरत लगती है। उसका पति थोड़ा बड़ा था। पच्चीस के आसपास की उम्र का, दुबला और लंबा था। उसने पर्स की कीमत सौ रुपए बताई थी।

मेरी सहेली, जो अहमदाबाद की थी, उसे वह बहुत महँगा लगा। वह मोलभाव करना चाहती थी। तभी मैंने एक बच्चे को देखा। वह शायद एक साल का होगा। वह एक पालने में था, जो दुकान के करीब फुटपाथ के पास रखा था। उसने साधारण से सूती कपड़े पहने थे और लकड़ी के खिलौने से खेल रहा था। बच्चा स्वस्थ और प्रसन्न था। मुझे उसके आसपास उसके माता-पिता नहीं दिखे। इसलिए मैंने उस युवती से बच्चे के बारे में पूछा। उसने गर्व से कहा- 'वो हमारा बच्चा है।' उसकी सुंदर मुस्कान देखकर मुझे उसके साथ और बात करने का मन हुआ।

'तुम बच्चे को बाजार में क्यों लेकर आई हो? क्या तुम इसे घर पर किसी के साथ या पड़ोसी के पास नहीं छोड़ सकती थीं?'

उसने संकोच के साथ जवाब दिया, 'मेरे घर में कोई नहीं है और सारे पड़ोसी यहीं पर अलग-अलग दुकानों में इसी व्यवसाय में लगे हैं।'

'तुम अपने बच्चे और काम को कैसे संभालती हो?'

'मैं सुबह जल्दी उठती हूँ और घर का सारा काम और कढ़ाई का काम करती हूँ। मेरे पति बच्चे का ध्यान रखते हैं। दोपहर में वे कढ़ाई का काम करते हैं और मैं बच्चे का ध्यान रखती हूँ। शाम को हम दोनों दुकान और बच्चे को साथ-साथ संभालते हैं।

'क्या तुम अखबार पढ़ती हो? या टीवी देखती हो?' इन प्रश्नों का कोई संबंध नहीं था, फिर भी मैं जानना चाहती थी।

'हमारे पास टीवी नहीं है। कभी-कभी हम अपने पड़ोस के घर जाकर टीवी देख लेते हैं। हमारी बस्ती में केवल एक गुजराती अखबार आता है, जिसे मेरे पति पढ़कर मुझे खबरें बता देते हैं।

'क्या तुम पढ़ सकती हो? क्या तुम स्कूल गई हो?'

'नहीं। मैं कभी स्कूल नहीं गई। मेरी सौतेली माँ थी, जिसने हमें कभी स्कूल नहीं भेजा। मेरे पति ने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की है, जो एक गुजराती अखबार पढ़ने के लिए पर्याप्त है।'

'तुम्हारा बच्चा कितना बड़ा है?'

'एक साल का। आज उसका पहला जन्मदिन है। हमने तय किया है कि हम एक ही बच्चे को पालेंगे। भले ही हम न पढ़े हों, पर उसे हम पढ़ाएँगे। हम उसके लिए बहुत मेहनत करेंगे।'

इस समय तक मोल-भाव पूरा हो गया था। दुकानदार ने दाम घटाने से मना कर दिया। मेरी सहेली ने पर्स नहीं खरीदा और हम चलने लगे। मैंने बच्चे की ओर एक बार फिर देखा- एक स्वस्थ, प्रसन्न बच्चा। उसका जन्मदिन था इसलिए अचानक वह पाँच सितारा होटल का जन्मदिन याद आ गया। एक संपन्न परिवार में जन्म लेना केवल संयोग की बात होती है। यह बच्चा यहाँ पैदा हुआ। मुझे उसे तोहफा देने का ख्याल आया। मैंने एक सौ का नोट निकालकर उसके हाथ की मुट्ठी में रख दिया और चलने लगी।

तुरंत ही उसकी माँ मेरे पीछे दौड़ती हुई आई। 'कृपया अपने पैसे वापस ले लीजिए। हम भिखारी नहीं हैं। हम आपको नहीं जानते। आपको हमें किस बात के पैसे देने चाहिए।'

मैं उसके चेहरे पर नाराजगी देख सकती थी। मैंने कहा, 'यह तुम्हारे लिए नहीं है। आज उसका जन्मदिन है और हमारे यहाँ रिवाज है, जब कोई बच्चा एक साल का हो जाता है, हम उसे छोटा-सा तोहफा देते हैं। मैंने तुमसे पाँच मिनट तक बात की, इसलिए मैं तुम्हें थोड़ा-बहुत जानती हूँ। मैं यह पैसे तुम्हारे बच्चे को आशीर्वाद के रूप में दे रही हूँ। मना मत करो।' तब तक उसका गुस्सा ठंडा हो गया। उसकी आँखें चमक रही थीं और उसकी हँसी लौट आई। मैं मुड़कर वापस चलने को हुई। उसने मेरा दाहिना हाथ पकड़कर पर्स थमा दिया। मैं हैरान थी। मैंने उसे स्वीकारने से मना किया।

'क्या तुम मुझे वह लौटा रही हो, जो मैंने बच्चे को तोहफे के रूप में दिया?'

'नहीं। बेन, मैं वाकई इन सबको लेकर बहुत खुश हूँ। बहुत से ग्राहक हमारी दुकान पर आते हैं, पर हमेशा केवल काम की बात करते हैं। वे पहले कीमत पूछते हैं, फिर मोल-भाव करते हैं। वे पैसे देकर अपना पैकेट लेकर, मुड़कर भी नहीं देखते और चले जाते हैं। कभी कोई हमसे इंसानों की तरह बात नहीं करता है। वे हमेशा व्यापारियों जैसा व्यवहार करते हैं। कोई नहीं पूछता- हम कैसे रहते हैं, क्या करते हैं। आप ऐसी पहली इंसान हैं, जिसने हमसे केवल एक इंसान की तरह व्यवहार किया। यह बहुत अच्छा अनुभव था। आप इसलिए नाराज हैं कि यह मैं आपको दे रही हूँ। मेरा बच्चा आपको ये दे रहा है। यह एक अद्भुत अहसास है कि कोई जो हमारी जगह का नहीं है, जो हमारी भाषा नहीं जानता है, जो हमारे लिए अनजान है, वह हमारे बच्चे को उसके पहले जन्मदिन पर आशीर्वाद दे रहा है। क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है कि ऐसी औरत का हम अपनी हैसियत से सम्मान करें? भगवान ने मुझे इस खाली पर्स को भरने लायक पैसा नहीं दिया, पर मैं भगवान से प्रार्थना करूँगी कि वह हमेशा आप पर इतनी कृपा बरसाए कि आपके पास इस तरह के अनेक पर्स भरे रहें।' मैं उसकी स्वयं के लिए भावहीन मशीन के स्थान पर इंसानों की तरह व्यवहार की इच्छा को समझ पा रही थी। मैंने उसका तोहफा खुशी से स्वीकारा किया। वह बच्चा अभी भी हँस रहा था और अपने खिलौने से खेल रहा था।

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