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सुधा मूर्ति
जीवन में कई तरह के लोगों का सामना करना पड़ता है। मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है, जो हमेशा दूसरों के बारे में बुरी बातें करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं लोगों के एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया देने के खिलाफ हूँ। लेकिन ये प्रतिक्रियाएँ ऐसी होनी चाहिए, जो व्यक्ति को स्वयं को सुधारने में मदद करे। दुर्भाग्यवश लोग उस समय बहुत असंवेदनशील हो जाते हैं, जब वे किसी की आलोचना करने पर उतरते हैं। हाल ही में एक सामाजिक कार्यकर्ता को पद्मश्री पुरस्कार मिला। वह एक समर्पित व्यक्ति है, जो निःस्वार्थ भाव से काम करता है और वाकई इस पुरस्कार के काबिल है। लेकिन उस पर जो टिप्पणी मेरी सहेली पार्वती ने की, वह भयंकर थी : 'ओह! वह एक अमीर आदमी है। उसने इस पुरस्कार को खरीदने के लिए बहुत पैसा खर्च किया होगा। इसके अलावा वह उसके इतने सारे रुपयों से कर भी क्या सकता था?उसने कुछ पैसा दान किया और पद्मश्री मिल गया। अगर मेरे पास इतना पैसा होता, तो मुझे यह बहुत पहले मिल गया होता। वैसे भी पद्मश्री में कुछ खासनहीं है। किसी को याद है, पिछले वर्ष किसे मिला था? हर साल सैकड़ों लोगों को मिलता है, इस साल उसे मिल गया।' |
| जीवन में कई तरह के लोगों का सामना करना पड़ता है। मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है, जो हमेशा दूसरों के बारे में बुरी बातें करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं लोगों के एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया देने के खिलाफ हूँ। |
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मैं पार्वती को पिछले कई सालों से जानती हूँ। जब कभी किसी को कुछ उपलब्धि मिलती है, उसकी पहली प्रतिक्रिया नकारात्मक होती है। इसका कारण है, जलन। वह इतनी स्व-केंद्रित और असंवेदनशील है कि इस बात की चिंता भी नहीं करती कि दूसरे क्या सोचेंगे?
मनीष, मेरी दूसरी सहेली का बेटा, ने डिग्री परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। स्वाभाविक रूप से उसकी माँ रोमांचित हो गई। पार्टी में उदास चेहरा बनाकर पार्वती मुझे एक तरफ ले गई और बोली, 'मनीष उतना अच्छा छात्र नहीं है जितनी कि मेरी बेटी माला।' जरूर प्रश्नपत्रों के मूल्यांकन में कुछ गलत हुआ है। एक शिक्षक के तौर पर तुम्हें क्या लगता है?'
मैंने कहा, 'तुम गलत हो। मनीष और माला दोनों अच्छे विद्यार्थी हैं। मूल्यांकन में कुछ गलत नहीं हुआ है। मनीष ने माला से ज्यादा मेहनत की है।'
हाल ही मैं उससे बाजार में मिली।
'तुम्हारा छुपा हुआ लेखक कौन है?' उसने पूछा।
मैं चकित रह गई। 'मेरे लिए कोई क्यों लिखेगा?' मैं खुद लिख सकती हूँ।
'नहीं, तुम्हें मुश्किल से समय मिलता होगा, इसलिए मैंने सोचा कि तुमने कोई लेखक रख लिया है, जैसे तुमने बावर्ची रखा है', उसने कहा।
मैं दुःखी थी। कोई इस तरह कैसे सोच सकता है?
वह अपने मन में यह सब कैसे सोच लेती है? मुझे दुःखी करने पर जरा भी बुरा न महसूस करते हुए उसने अपना आखिरी वार किया, 'अक्सर लोग ऐसा करते हैं, इसलिए मैंने तुमसे पूछा।'
पार्वती उन लोगों का उदाहरण है, जो पढ़े-लिखे होने के बावजूद हमेशा दूसरों पर ताने कसते हैं। उनकी ताकत दूसरों की बुराई करने में ही खर्च होती है। वे हमेशा सोचते हैं कि हर चीज में बेईमानी हो रही है। हम जीवन में बहुत-सी चीजों का सपना देखते हैं, लेकिन उन सबको यथार्थ में पाने में समर्थ नहीं होते। सफलता कई कारकों का उत्पाद है, अकेले परिश्रम का नहीं। सफलता के लिए सही अवसर, साथ काम करने के लिए सही लोग और सही समय की जरूरत होती है। हो सकता है कि इसमें भाग्य का भी कुछ हाथ हो।
एक विजेता को कड़ी मेहनत और अपने काम में यकीन करना पड़ता है। अक्सर लोग मेहनत करने के बावजूद ज्यादा हासिल नहीं कर पाते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि वे उन लोगों से कुछ कम हैं, जो ज्यादा सफल हैं। अगर मैं अपने सपने को सच करने में असक्षम हूँ और कोई और ऐसा कर रहा है तो उसके प्रति अच्छा महसूस करना मेरे लिए बेहतर होगा, बजाए कि अपने प्रति बुरा महसूस करने के। सबसे अच्छी संस्कृति वह है जिसमें हम एक-दूसरे की सफलता पर खुशी मनाएँ।
आज कोई पार्वती को पसंद नहीं करता। उसका शायद ही कोई मित्र हो। वह चाहती है कि अच्छी बातें केवल उसके साथ हो, सबसे अच्छी चीजों के लिए वही काबिल है। उसकी दुनिया केवल उसके परिवार- उसकी बेटी, उसके बेटे और उसके पति तक सीमित है। किसी और का उसके लिए अस्तित्व नहीं है।
ऐसे लोग जिंदगी में क्या हासिल कर सकते हैं? न सच्ची दोस्ती, न प्यार, न किसी की भागीदारी। क्या इस तरह की जलन के साथ जिंदगी जीने लायक रहती है?'